मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव के एक फैसले ने राज्य की सियासत का पारा चढ़ा दिया है। नए आदेश के अनुसार अब एमपी में दो से ज्यादा बच्चे होने पर भी सरकारी नौकरी हासिल की जा सकेगी। साल 2001 से लागू दिग्विजय सरकार का वह प्रावधान, जिसके कारण दो से अधिक संतान होने पर सरकारी सेवा पर रोक थी, अब इतिहास बनने जा रहा है। यह खबर सामने आते ही राजनीति गरमा गई और बहस में जनसंख्या विस्फोट से लेकर हिंदू-मुस्लिम और यूसीसी तक के मुद्दे शामिल हो गए।
दिग्विजय सिंह का नियम निरस्त
मुख्यमंत्री के एक आदेश ने प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है। इस आदेश के बाद सरकारी नौकरी के लिए प्रस्तावित दो बच्चों की अधिकतम सीमा वाला प्रावधान लागू नहीं रहेगा। मोहन यादव ने सामान्य प्रशासन विभाग के उस ड्राफ्ट को निरस्त करने के निर्देश दिए हैं, जिसमें दो से अधिक जीवित संतान वाले उम्मीदवारों को सरकारी सेवा के लिए अपात्र घोषित करने का प्रावधान रखा गया था। सरकार इसे जनहित में उठाया गया कदम बता रही है।
बीजेपी नेता का दिग्विजय सिंह पर हमला
दरअसल, साल 2001 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने यह नियम लागू किया था। इसके मुताबिक, 26 जनवरी 2001 के बाद जिन सरकारी कर्मचारियों या उम्मीदवारों के दो से अधिक बच्चे होंगे, वे सरकारी सेवा के लिए पात्र नहीं माने जाएंगे। 25 साल पुराने इस नियम के निरस्त होते ही बीजेपी के फायरब्रांड विधायक रामेश्वर शर्मा सक्रिय हो गए और उन्होंने कांग्रेस पर ऐसा हमला बोला जिसने पूरी बहस का रुख ही बदल दिया। शर्मा ने सीधे आरोप लगाया कि यह दिग्विजय सिंह का हिंदू विरोधी षड्यंत्र था।
कांग्रेस का पलटवार
दिग्विजय सिंह का यह फैसला जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर लिया गया था। भाजपा का कहना है कि इसका खामियाजा प्रदेश के युवा और कर्मचारी भुगत रहे थे। दूसरी ओर, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और कांग्रेस का सीधा आरोप है कि यह बीजेपी नहीं, बल्कि आरएसएस का एजेंडा है। कांग्रेस सवाल उठा रही है कि रोजगार पोर्टल पर रजिस्टर्ड 22 लाख युवाओं को नौकरी कब मिलेगी और देश में हर साल 2 करोड़ नौकरियों का वादा कहां गया। विपक्ष का आरोप है कि असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेला जा रहा है।
हजारों परिवारों को राहत
इस सियासी टकराव के बीच फैसले का स्वागत भी हो रहा है। मध्य प्रदेश के कर्मचारी संगठनों ने इसे दिग्विजय सिंह का काला कानून करार दिया है। संगठनों के अनुसार सरकार के 58 विभागों में से 38 विभाग ऐसे थे, जहां हजारों कर्मचारियों की नौकरी पर तलवार लटकी हुई थी और कई मामले वर्षों से अदालत में लंबित पड़े थे। इस आदेश से उन हजारों परिवारों को बड़ी राहत मिली है।
हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया और नई मांग
हालांकि बात सिर्फ नौकरी में राहत तक नहीं रुकी। इस फैसले के बाद हिंदू संगठन भी सामने आ गए हैं। उन्होंने फैसले का स्वागत करते हुए एक नया और विवादित मोर्चा खोल दिया है। उनका कहना है कि दिग्विजय सिंह का यह कानून सिर्फ हिंदुओं की आबादी घटाने की साजिश था, क्योंकि दूसरी ओर 5 बीवी और 25 बच्चे रखने वाले लोग इस नियम के दायरे से बाहर थे। हिंदू संगठनों की मांग है कि अब सरकार को 4 बच्चों की छूट देने वाला नया जनसंख्या नियंत्रण कानून लाना चाहिए।
कुल मिलाकर, मध्य प्रदेश की राजनीति में अब बच्चों की संख्या भी एक नया मुद्दा बन गई है। 25 साल पहले जनसंख्या पर अंकुश लगाने के लिए बना नियम आज हिंदू-मुस्लिम और संघ के एजेंडे के आरोपों के बीच घिर गया है। बड़ा सवाल यह है कि मोहन यादव का यह कदम प्रदेश के युवाओं को रोजगार देगा या सूबे की सियासत को नए ध्रुवीकरण की ओर ले जाएगा।
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