पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में इन दिनों जो हालात हैं, उन पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है। वहां के लोग अपनी ही जमीन से लेकर विदेशों तक पाकिस्तान से अलग होने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। आखिर वे खुद को पाकिस्तान का हिस्सा क्यों नहीं मानते और इसके पीछे का इतिहास क्या है, यही समझने की कोशिश करते हैं।
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर इस समय अपने हालिया इतिहास के सबसे अशांत दौर से गुजर रहा है। संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में बड़े स्तर पर प्रदर्शन चल रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पाकिस्तानी सेना और स्थापना राजनीतिक मामलों में दखल देती है, इलाके की आर्थिक अनदेखी करती है और स्थानीय आवाजों को कुचलती है। इन प्रदर्शनों में अब तक दर्जनों लोगों की जान जा चुकी है। इसी बीच एक बुनियादी सवाल फिर से सामने आ रहा है- अगर POK पाकिस्तान के नियंत्रण में है, तो वहां अलग प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, विधानसभा और अपना झंडा क्यों है?
आखिर क्यों है POK में अलग झंडा और पीएम?
पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर POK को आजाद जम्मू और कश्मीर कहता है। यहां अपना राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विधानसभा, अदालतें और संवैधानिक ढांचा मौजूद है। ऊपरी तौर पर यह एक स्वशासित इकाई जैसा दिखता है, मगर हकीकत इससे अलग है।
साल 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों पर कब्जा जमा लिया था। हालांकि उसने इसे कभी अपना पूर्ण प्रांत नहीं बनाया, क्योंकि ऐसा करने पर कश्मीर मुद्दे पर उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति कमजोर पड़ जाती। इसी वजह से उसने एक अलग प्रशासनिक ढांचा खड़ा किया, ताकि दुनिया के सामने यह जता सके कि POK एक स्वायत्त क्षेत्र है। साल 1974 में इंटरिम संविधान एक्ट लाया गया, जिसने POK को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विधानसभा देने को औपचारिक रूप दिया, लेकिन असल में सारे फैसले पाकिस्तान की केंद्र सरकार और सेना ही नियंत्रित करती है। हाल ही में POK में विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई में 12 लोगों की मौत हो गई।
भारत के अनुच्छेद 370 से तुलना
POK के इस ढांचे की तुलना अक्सर भारत के पूर्व अनुच्छेद 370 से की जाती है। दोनों ही जगहों पर अलग संविधान, झंडा और चुनी हुई सरकार थी, फिर भी इनमें बड़ा फर्क है। अनुच्छेद 370 भारत के संविधान के भीतर मौजूद था और जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की शर्तों पर आधारित था। इसके उलट, POK की पूरी व्यवस्था पाकिस्तान की अपनी सुविधा के लिए तैयार की गई थी। पाकिस्तान यहां की ताकत खुद अपने पास रखता है, खासकर रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा और सुरक्षा से जुड़े मामलों में।
असली सत्ता आखिर किसके हाथ में?
POK में चुनाव होते हैं और सरकार भी बनती है, पर असली ताकत पाकिस्तानी सेना और इस्लामाबाद के पास ही रहती है। कश्मीर काउंसिल नाम की संस्था पाकिस्तान को POK के मामलों में सीधे दखल देने का अधिकार देती है। एक और विवादित व्यवस्था यह है कि POK की विधानसभा में कुछ सीटें उन कश्मीरियों के लिए आरक्षित हैं जो पाकिस्तान में रहते हैं। ये सीटें POK के निवासी नहीं, बल्कि पाकिस्तान में रहने वाले लोग भरते हैं, जिससे इस्लामाबाद को चुनावी नतीजों पर अतिरिक्त असर डालने का मौका मिल जाता है।
सबसे विवादास्पद पहलू क्या है?
POK के राजनीतिक नेताओं, न्यायाधीशों और संवैधानिक पदाधिकारियों को यह शपथ लेनी पड़ती है कि वे कश्मीर के पाकिस्तान में विलय का समर्थन करेंगे। इसका नतीजा यह होता है कि जो लोग पाकिस्तान के पक्ष में नहीं हैं, उन्हें राजनीति में आने का मौका ही नहीं मिलता। आलोचक इसे लोकतंत्र की हत्या करार देते हैं। हाल के प्रदर्शनों में लोग पाकिस्तान पर आर्थिक शोषण, बिजली, पानी और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी तथा राजनीतिक दमन का आरोप लगा रहे हैं। इन प्रदर्शनों को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना सख्त कार्रवाई कर रही है।
उबल रही है POK की घुटन
POK के लोग लंबे समय से महसूस करते आ रहे हैं कि वे न तो पूरी तरह पाकिस्तान के हैं और न ही स्वतंत्र। वे पाकिस्तान की छाया में फंसे हुए हैं, जहां उन्हें न तो असली आजादी है और न ही पूरे अधिकार। POK का यह अनोखा राजनीतिक मॉडल पाकिस्तान की कश्मीर नीति की दोहरी चाल को उजागर करता है- एक ओर वह दुनिया को बताता है कि POK आजाद है, तो दूसरी ओर वहां की हर अहम ताकत अपने पास रखे हुए है। जब तक पाकिस्तान POK को असली स्वायत्तता नहीं देता, वहां अशांति और असंतोष बना रहेगा। अब POK के लोग तेजी से अपने अधिकारों की मांग उठा रहे हैं।
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