ममता बनर्जी और गांधी परिवार: राजीव की 'छोटी बहन' से सोनिया की सखी तक, फिर बढ़ती गई दूरी

ममता बनर्जी और गांधी परिवार के संबंध हमेशा उतार-चढ़ाव से भरे रहे हैं—कभी राजीव गांधी की भरोसेमंद युवा नेता और सोनिया की करीबी रहीं ममता ने बाद में अलग राह चुनी, और आज परिस्थितियां फिर दोनों को पास ला रही हैं।

भारतीय राजनीति में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो न तो पूरी तरह टूटते हैं और न ही पूरी तरह जुड़ पाते हैं। कांग्रेस और ममता बनर्जी का संबंध भी ठीक इसी तरह का रहा है। एक समय था जब ममता को कांग्रेस का सबसे चमकता हुआ युवा चेहरा कहा जाता था। राजीव गांधी उन्हें अपनी राजनीतिक खोज मानते थे, वहीं सोनिया गांधी के साथ उनके पारिवारिक और भावनात्मक जुड़ाव की चर्चा वर्षों तक होती रही। मगर यही ममता आगे चलकर कांग्रेस से अलग होकर ऐसी दिशा में बढ़ीं, जिसने बंगाल में कांग्रेस का आधार लगभग खत्म कर दिया। आज जब हालात फिर बदल रहे हैं और दोनों एक-दूसरे के करीब आते दिख रहे हैं, तब इस रिश्ते के पूरे सफर को समझना जरूरी हो जाता है।

जब कांग्रेस ने पहचाना बंगाल का नया चेहरा

1970 के दशक में छात्र राजनीति से उभरीं ममता बनर्जी ने राष्ट्रीय स्तर पर पहली बड़ी पहचान 1984 में हासिल की। कांग्रेस ने उन्हें जादवपुर लोकसभा सीट से दिग्गज वामपंथी नेता और बाद में लोकसभा अध्यक्ष बने सोमनाथ चटर्जी के सामने उतारा। यह एक बड़ा राजनीतिक जोखिम था, लेकिन ममता ने सबको चौंकाते हुए जीत हासिल कर ली।

उस समय इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देशभर में सहानुभूति की लहर थी। पूरे देश में लोकसभा की कुल 514 सीटों के लिए मतदान हुआ और उस चुनाव में कांग्रेस को अपने दम पर 404 सीटें मिलीं। इस जीत के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का ममता पर भरोसा और गहरा हुआ। उन्हें अखिल भारतीय युवा कांग्रेस में अहम जिम्मेदारियां सौंपी गईं और बाद में पश्चिम बंगाल युवा कांग्रेस का नेतृत्व भी दिया गया। इस तरह ममता बंगाल में कांग्रेस की सबसे बड़ी युवा नेता बनकर सामने आईं।

हाजरा मोड़ का हमला और राजीव गांधी का साथ

16 अगस्त 1990 का दिन ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का सबसे निर्णायक दिन माना जाता है। कोलकाता के हाजरा मोड़ पर एक विरोध प्रदर्शन के दौरान उन पर हमला हुआ। उनके सिर पर गंभीर चोट आई और खोपड़ी में फ्रैक्चर हो गया। उस घटना की तस्वीरें पूरे देश में सुर्खियां बनीं।

राजनीतिक हलकों में लंबे समय तक यह चर्चा रही कि राजीव गांधी ने उनके इलाज में विशेष रुचि दिखाई थी और उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधा दिलाने के लिए हरसंभव कोशिश की गई। इस घटना के बाद ममता की छवि एक संघर्षशील और जुझारू नेता के रूप में और मजबूत हो गई।

राजीव के बाद बदलने लगे समीकरण

1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस की राजनीति में बड़ा मोड़ आया। उसी चुनाव में ममता दक्षिण कोलकाता सीट से सांसद चुनी गईं और पीवी नरसिम्हा राव की केंद्र सरकार में मंत्री भी बनीं। उन्होंने मानव संसाधन विकास, युवा मामले, खेल तथा महिला एवं बाल विकास जैसे विभागों की जिम्मेदारी संभाली।

लेकिन इसी दौर में कांग्रेस और ममता के बीच मतभेद भी गहराने लगे। ममता का आरोप था कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस नेतृत्व वामदलों के प्रति बहुत नरम रवैया अपना रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस नेतृत्व को लगता था कि ममता की राजनीति जरूरत से ज्यादा टकराववादी होती जा रही है। राजीव की हत्या के बाद पार्टी में गांधी परिवार की भूमिका भी काफी सिमट गई थी। फिर 1996 में कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हो गई।

धीरे-धीरे सोनिया गांधी कांग्रेस की राजनीति के केंद्र में आने लगीं। उस समय पार्टी अध्यक्ष पद पर सीताराम केसरी काबिज थे। उन्हें हटाकर मार्च 1998 में सीडब्ल्यूसी ने सोनिया गांधी को अध्यक्ष पद की कमान सौंप दी। यह वह दौर था जब सोनिया को अपनी काबिलियत साबित करनी थी और पार्टी को एकजुट भी रखना था—मुश्किलों से भरा यह वक्त उनके लिए चुनौतीपूर्ण था। मगर ठीक इसी मौके पर ममता बनर्जी ने उनका साथ छोड़ दिया।

हालांकि राजीव गांधी के निधन के बाद ममता लगातार सोनिया के संपर्क में रहीं। दिल्ली में रहते हुए वह अक्सर सोनिया से मिलने जाती थीं और इस दौरान दोनों के बीच गहरी आत्मीयता भी बनी। लेकिन राजनीति की मजबूरियों ने दोनों की राहें अलग कर दीं।

जब कांग्रेस छोड़कर बनी तृणमूल कांग्रेस

आखिरकार 1997-98 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से नाता तोड़कर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की नींव रखी। एक जनवरी 1998 को उन्होंने विधिवत पार्टी का गठन किया। इसका मुख्य उद्देश्य पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के खिलाफ संघर्ष को और तेज करना था।

पार्टी बनाने के बाद ममता ने भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ राजनीतिक साझेदारी की और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री बनीं। यही वह मोड़ था जिसने कांग्रेस और ममता के रिश्तों में सबसे बड़ी दरार पैदा कर दी।

दोस्ती, दुश्मनी और फिर दोस्ती

इसके बाद करीब दो दशक तक कांग्रेस और ममता के संबंध लगातार बदलते रहे—कभी दोनों साथ आए तो कभी अलग हुए। 2009 में वामपंथ के खिलाफ दोनों ने गठबंधन किया और 2011 में पश्चिम बंगाल में 34 साल पुराने वाम शासन का अंत हुआ। लेकिन सत्ता में आने के बाद ममता और कांग्रेस के बीच फिर दूरी बढ़ने लगी।

2024 के लोकसभा चुनाव में भी पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और टीएमसी के बीच सीट समझौता नहीं हो सका। कई मौकों पर ममता बनर्जी ने कांग्रेस नेतृत्व पर निशाना साधा, जबकि कांग्रेस के प्रदेश नेताओं ने टीएमसी को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बताया।

फिर उसी मोड़ पर लौटती राजनीति

भारतीय राजनीति की खासियत यही है कि यहां न कोई स्थायी दोस्त होता है और न स्थायी दुश्मन। पश्चिम बंगाल की सत्ता से ममता के हटने और टीएमसी के भीतर उभरे मतभेदों ने एक बार फिर कांग्रेस और ममता बनर्जी को संवाद की मेज पर ला खड़ा किया है। सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की मुलाकात तथा राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी की बातचीत ने इस संभावना को नई हवा दे दी है।

ममता बनर्जी और कांग्रेस की यह कहानी केवल दो राजनीतिक दलों की नहीं है। यह भरोसे, महत्वाकांक्षा, संघर्ष, अलगाव और फिर बदलती परिस्थितियों से बनते नए समीकरणों की कहानी है। कहा जाता है कि राजीव गांधी ममता को अपनी छोटी बहन मानते थे और सोनिया गांधी से भी उनके रिश्ते बेहद अच्छे थे, लेकिन समय के साथ ममता ने अपनी अलग राह चुन ली। अब वक्त का पहिया फिर घूम चुका है और ममता एक बार फिर सोनिया के करीब आती दिखाई दे रही हैं।

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