बिना इंटरनेट और मौसम ऐप के भी सही बता देते हैं बारिश का दिन, सरगुजा के किसानों की सदियों पुरानी देसी पहचान

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में किसान आज भी चींटियों की हलचल, जंगलों की गहरी हरियाली और सांप-बिच्छुओं की सक्रियता जैसे प्राकृतिक संकेतों से मानसून के आगमन का अनुमान लगाते हैं और इन्हीं के आधार पर खेती की शुरुआत करते हैं।

आधुनिक तकनीक और मौसम पूर्वानुमान के इस दौर में भी छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में प्रकृति के इशारों पर भरोसा आज भी कायम है। चींटियों की हलचल, जंगलों की गहराती हरियाली और दूसरे प्राकृतिक बदलावों को किसान मानसून के आने का भरोसेमंद संकेत मानते हैं और इन्हीं को देखकर खेती की तैयारी में जुट जाते हैं।

सरगुजा के गांवों में चली आ रही परंपरा

सरगुजा जिले में किसान बरसात के मौसम में बड़े पैमाने पर खेती करते हैं। यहां के गांवों में एक ऐसी परंपरा है जिसे हर किसान मानता है। इस परंपरा के अनुसार प्राकृतिक संकेत ही किसानों को बता देते हैं कि मानसून आने वाला है। जैसे ही चींटियां हलचल करने लगती हैं और हरियाली गहरी व काली दिखने लगती है, किसान अंदाजा लगा लेते हैं कि दो से तीन दिन में बारिश शुरू हो जाएगी, और अक्सर ऐसा ही होता है। इसके साथ ही सांप और बिच्छुओं की गतिविधियां भी तेज हो जाती हैं।

चींटियों का बाहर निकलना देता है पहला इशारा

स्थानीय जानकार सिकंदर प्रजापति ने बताया कि मानसून आने से पहले गांव और खेतों के आसपास बड़ी संख्या में चींटियां निकलने लगती हैं। खासकर छोटे आकार की और काटने वाली चींटियां जमीन की दरारों, घरों और आंगनों से बाहर दिखाई देने लगती हैं। ग्रामीणों का मानना है कि चींटियों के निकलने के दो से तीन दिनों के भीतर बारिश शुरू हो जाती है।

जंगलों का बदलता रंग भी देता है संदेश

सिकंदर प्रजापति के अनुसार बारिश से पहले जंगलों के पेड़-पौधे बेहद हरे और गहरे रंग के दिखाई देने लगते हैं। ग्रामीण इसे भी मानसून के आगमन का संकेत मानते हैं। उनका कहना है कि जब जंगलों की हरियाली गहरी और काली सी नजर आने लगती है तो समझ लिया जाता है कि जल्द ही अच्छी बारिश होने वाली है।

सांप-बिच्छुओं की सक्रियता भी बढ़ जाती है

ग्रामीणों का कहना है कि मानसून से पहले सांप और बिच्छू जैसे जीव अपने बिलों से बाहर निकलने लगते हैं। इसे भी मौसम में बदलाव और वर्षा के आगमन का प्राकृतिक संकेत माना जाता है। गांवों में जैसे ही चींटियों और दूसरे प्राकृतिक संकेतों की हलचल दिखती है, किसान खेतों की जुताई, नागर चलाने और बुवाई की तैयारियां शुरू कर देते हैं। कई किसान इन्हीं संकेतों के आधार पर फसल बोने का समय तय करते हैं।

पूर्वजों से मिली है यह परंपरागत जानकारी

सिकंदर प्रजापति ने बताया कि यह जानकारी उन्हें अपने पिता और दादा से मिली है। गांव के बुजुर्ग पीढ़ी दर पीढ़ी यही बताते आए हैं कि बारिश आने से पहले चींटियां बाहर निकलती हैं। यही वजह है कि आज भी ग्रामीण समाज इन प्राकृतिक संकेतों को गंभीरता से लेता है और खेती-किसानी के अहम फैसले इन्हीं के आधार पर करता है।

बारिश से पहले होती है पूजा-अर्चना

ग्रामीण क्षेत्रों में मानसून के स्वागत और अच्छी फसल की कामना को लेकर विशेष पूजा-पाठ की परंपरा भी है। गांवों में खैर-पयेर जैसी पारंपरिक पूजाएं आयोजित की जाती हैं। पूजा के बाद किसान सामूहिक रूप से खेती के कार्यों की शुरुआत करते हैं और अच्छी बारिश की प्रार्थना करते हैं।

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