हममें से ज़्यादातर लोगों ने शायद ही कभी प्रोफेसर अशोक सेन का नाम सुना हो। इसकी वजह भी साफ है—वे इतना सादगी भरा जीवन जीते हैं कि आज भी सफर के लिए साइकिल का ही इस्तेमाल करते हैं। स्ट्रिंग थ्योरी जैसी गूढ़ खोज में उनका योगदान बेमिसाल है, फिर भी वे किसी सोशल मीडिया मंच पर मौजूद नहीं हैं। भारत सरकार उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित कर चुकी है और उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा विज्ञान पुरस्कार भी मिल चुका है, इसके बावजूद उनके विचारों और रहन-सहन में सादगी झलकती है।
अब तक यही धारणा रही है कि यह सृष्टि परमाणुओं से बनी है, जिनके भीतर इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जैसे कण होते हैं। इन कणों को एक तरह से बिंदु माना जाता रहा है, लेकिन स्ट्रिंग थ्योरी ने इस मान्यता को चुनौती दी है। अब यह लगभग स्थापित होने लगा है कि ये कण असल में कंपन करते हुए धागों का समूह हैं। इस थ्योरी को धार देने वाले वैज्ञानिक और कोई नहीं, बल्कि भारत के ही महान वैज्ञानिक अशोक सेन हैं।
उनके काम का स्तर इतना ऊँचा है कि उन्हें दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पुरस्कार—फंडामेंटल फिजिक्स प्राइज—मिल चुका है। इसके लिए उन्हें करीब साढ़े 27 करोड़ रुपये की राशि दी गई थी, जो नोबेल पुरस्कार की राशि की तुलना में 3 गुना ज़्यादा है। लेकिन उनकी सादगी देखिए—वे आज भी प्रयागराज स्थित अपने संस्थान में साइकिल से ही आते-जाते हैं।
कौन हैं ये महान वैज्ञानिक
अशोक सेन का जन्म कोलकाता में 1956 में हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि उनके पिता भी भौतिकी के शिक्षक थे और स्कॉटिश चर्च कॉलेज में पढ़ाते थे। उनकी जीवनी से पता चलता है कि वे कोई असाधारण बालक नहीं थे, लेकिन हर चीज़ को लेकर उनके मन में जिज्ञासा बनी रहती थी। बचपन से लेकर 11वीं तक उनकी पढ़ाई बंगाली माध्यम में हुई और अंग्रेज़ी उन्हें बचपन में लगभग न के बराबर आती थी।
11वीं में उन्हें पता चला कि आईआईटी नाम का कोई संस्थान भी होता है, तभी से उन्होंने अंग्रेज़ी पर ध्यान देना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज से बीएससी की और फिर आईआईटी कानपुर से मास्टर की पढ़ाई की। यहीं से उनकी पूरी जिंदगी बदल गई। आईआईटी में उनकी बौद्धिक क्षमता को नई धार मिली और वे शोध में अपनी छाप छोड़ते चले गए।
अमेरिका से पीएचडी और देश वापसी
आईआईटी के बाद अशोक सेन स्कॉलरशिप पर उच्च शिक्षा के लिए विदेश चले गए। सबसे पहले उन्होंने अमेरिका की स्टोनी ब्रुक यूनिवर्सिटी से PhD की। इसके बाद उन्होंने फर्मिलैब और स्टैनफोर्ड जैसी दुनिया की शीर्ष प्रयोगशालाओं में शोध किया। उनके पास बेहतरीन अवसर मौजूद थे—चाहते तो वे अमेरिका में ही शानदार वेतन वाली नौकरी और सुविधाजनक जीवन चुन सकते थे।
लेकिन अपने देश की याद उन्हें खींचती रही और वे भारत लौट आए। 1980 के दशक के अंत में वे मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च से जुड़े। बाद में, 1995 में वे प्रयागराज के हरीश-चंद्र अनुसंधान संस्थान में अध्यापन करने लगे। तब से आज तक वे इसी संस्थान में अपनी सेवाएँ देते हुए बड़े स्तर के शोध में लगे हुए हैं।
सादगी की मिसाल
प्रयागराज के कैंपस में प्रोफेसर अशोक सेन बेहद सादा जीवन जीते हैं। वे हमेशा कैंपस में साइकिल से ही चलते हैं। किसी भी सोशल मीडिया मंच पर उनकी मौजूदगी नहीं है और मीडिया में चर्चित होने में भी उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। उनका पहनावा भी बेहद साधारण रहता है।
2012 में एक फोन कॉल के ज़रिए प्रोफेसर सेन को दुनिया के पहले ब्रेकथ्रू प्राइज इन फंडामेंटल फिजिक्स से नवाज़े जाने की सूचना मिली थी। यह राशि नोबेल पुरस्कार की राशि से तीन गुना थी और उस समय यह 16 करोड़ की थी। सबको लगा कि अब प्रोफेसर सेन की जीवनशैली बदल जाएगी, लेकिन वे आज भी साइकिल से ही सफर करते हैं। उन्हें कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों के साथ-साथ भारत सरकार की ओर से पद्म भूषण सम्मान भी मिल चुका है।
सेन ने किस चीज़ की खोज की
अशोक सेन की खोज समझने से पहले यह जान लेना ज़रूरी है कि ब्रह्मांड को समझने के लिए अब तक दो प्रमुख सिद्धांत रहे हैं। पहला सापेक्षता का सिद्धांत, जिसमें गुरुत्वाकर्षण को समझा जाता है, और दूसरा क्वांटम मैकेनिक्स, जिसमें परमाणु स्तर के नन्हे कणों को समझा जाता है। अब इनमें एक नया सिद्धांत जुड़ गया है, जिसे स्ट्रिंग थ्योरी कहा जाता है। यह थ्योरी इन दोनों को एक ही गणितीय ढाँचे में लाने की कोशिश करती है, इसीलिए इसे ‘Theory of Everything’ भी कहा जाता है।
अब समझिए कि स्ट्रिंग थ्योरी आखिर है क्या। पारंपरिक भौतिकी हमें बताती है कि दुनिया इलेक्ट्रॉन और क्वार्क जैसे नन्हे कणों से बनी है। लेकिन स्ट्रिंग थ्योरी कहती है कि अगर इन कणों को और गहराई से देखें, तो वे बिंदु नहीं हैं, बल्कि ऊर्जा के नन्हे कंपन करते हुए धागे हैं। सीधे शब्दों में कहें तो सब कुछ धागों में लिपटा हुआ है। अशोक सेन न सिर्फ़ भारत, बल्कि दुनिया के सबसे सम्मानित स्ट्रिंग थ्योरी वैज्ञानिकों में से एक हैं और इस सिद्धांत को आज के मुकाम तक पहुँचाने में उनका योगदान क्रांतिकारी माना जाता है।
एस-ड्युलिटी और सेन कंजक्चर की खोज
1990 के दशक की शुरुआत में स्ट्रिंग थ्योरी के पाँच अलग-अलग संस्करण मौजूद थे और वैज्ञानिक इस उलझन में थे कि इनमें से सही कौन सा है। अशोक सेन ने S-Duality का सिद्धांत दिया, जिसने यह साबित करने में मदद की कि अलग-अलग दिखने वाली ये थ्योरीज़ असल में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उनके इसी काम ने आगे चलकर एम थ्योरी का रास्ता साफ़ किया। उन्होंने यह समझाने में भी अहम भूमिका निभाई कि स्ट्रिंग थ्योरी के ज़रिए ब्लैक होल की एन्ट्रॉपी की गणना कैसे की जा सकती है।
इसके अलावा अशोक सेन ने टैचियोन कंडेनसेशन पर काम किया, जिसे भौतिकी की दुनिया में सेन कंजक्चर के नाम से जाना जाता है। यह सिद्धांत बताता है कि जब ब्रह्मांड में कुछ अस्थिर ऊर्जा क्षेत्र समाप्त होते हैं, तो वे किस तरह स्थिर हो जाते हैं। ब्रह्मांड की उत्पत्ति और अंत को समझने के लिए यह सिद्धांत बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
https://hindi.news18.com/news/lifestyle/trends-greatest-scientist-ashoke-sen-who-won-prize-3-times-bigger-than-nobel-prize-but-simple-lifestyle-still-rides-from-bicycle-10262827.html