दिल्ली के अमर कॉलोनी फायरिंग मामले में पुलिस एक नाबालिग आरोपी पर बालिग की तरह मुकदमा चलाने की तैयारी कर रही है। इस मामले में गिरफ्तार किशोर की उम्र 16 साल से अधिक बताई जा रही है, जिसके आधार पर पुलिस ने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजेबी) के समक्ष आवेदन दायर किया है। पुलिस के इस कदम के बाद बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या भारत में किसी नाबालिग के खिलाफ भी वयस्क की तरह केस चलाया जा सकता है।
इसका जवाब है—हां, लेकिन इसके लिए कानून में कुछ कड़ी शर्तें और एक तय प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। कानून के मुताबिक हर नाबालिग पर बालिग की तरह मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इसके लिए आरोपी की उम्र, अपराध की गंभीरता और किशोर की मानसिक समझ जैसे कई पहलुओं की बारीकी से जांच की जाती है।
निर्भया कांड के बाद बदला कानून
भारत में लंबे समय तक सभी नाबालिग आरोपियों के मामलों की सुनवाई सिर्फ किशोर न्याय प्रणाली के तहत ही होती थी। अपराध चाहे जितना भी संगीन क्यों न हो, नाबालिग को सामान्य आपराधिक अदालत में नहीं भेजा जाता था। साल 2012 के निर्भया कांड के बाद पूरे देश में कानून बदलने की मांग जोर पकड़ने लगी, क्योंकि उस मामले का एक आरोपी नाबालिग था और उसकी उम्र 18 साल से कम थी।
घटना की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने कानून में संशोधन कर किशोर न्याय अधिनियम 2015 बनाया। इस अधिनियम में नाबालिग पर बालिग की तरह केस चलाने की सशर्त इजाजत दी गई।
नाबालिग पर बालिग की तरह केस कब चल सकता है?
किसी भी नाबालिग पर सीधे बालिग की तरह मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इसके लिए दो सबसे अहम शर्तों का पूरा होना जरूरी है।
उम्र 16 से 18 साल के बीच हो: अगर अपराध के समय आरोपी की उम्र 16 साल से कम है, तो किसी भी हाल में उसके खिलाफ बालिग की तरह ट्रायल नहीं चलाया जा सकता। लेकिन यदि उम्र 16 से 18 वर्ष के बीच है, तो कानून आगे की जांच और मूल्यांकन की अनुमति देता है।
अपराध जघन्य श्रेणी का हो: सिर्फ उम्र अधिक होना ही पर्याप्त नहीं है। आरोपी पर ऐसा अपराध दर्ज होना चाहिए जिसे कानून ‘जघन्य अपराध’ की श्रेणी में रखता हो। जघन्य अपराध वे होते हैं जिनमें न्यूनतम सजा 7 वर्ष या उससे अधिक तय की गई हो। हत्या, बलात्कार, अपहरण और गंभीर हिंसक अपराध इसी श्रेणी में गिने जाते हैं।
यह फैसला कौन करता है?
यह निर्णय न तो पुलिस और न ही सामान्य अदालत सीधे ले सकती है। सबसे पहले मामला किशोर न्याय बोर्ड के पास जाता है। जेजेबी एक विशेष बोर्ड है जो नाबालिग आरोपियों से जुड़े मामलों को देखता है। जब पुलिस को लगता है कि आरोपी 16 से 18 वर्ष की उम्र का है और उस पर जघन्य अपराध का आरोप है, तब वह बोर्ड के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकती है। इसके बाद अंतिम फैसला बोर्ड ही लेता है।
जेजेबी किन बिंदुओं की जांच करता है?
किशोर न्याय बोर्ड आरोपी किशोर का प्रारंभिक मूल्यांकन करता है। इस प्रक्रिया में केवल अपराध की गंभीरता नहीं, बल्कि आरोपी की मानसिक स्थिति और समझ का भी आकलन किया जाता है। बोर्ड मुख्य रूप से तीन सवालों के जवाब तलाशता है:
- क्या आरोपी में अपराध करने की मानसिक और शारीरिक क्षमता थी?
- क्या वह अपने कृत्य के परिणामों को समझता था?
- अपराध किन परिस्थितियों में किया गया?
जरूरत पड़ने पर मनोवैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य विशेषज्ञों की राय भी ली जाती है। यदि बोर्ड इस नतीजे पर पहुंचता है कि आरोपी ने पूरी समझ और परिपक्वता के साथ अपराध किया है, तो मामला चिल्ड्रन्स कोर्ट या सत्र न्यायालय भेजा जा सकता है, जहां उस पर बालिग की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है।
क्या है अमर कॉलोनी फायरिंग का पूरा मामला?
अमर कॉलोनी थाना क्षेत्र से जुड़े इस फायरिंग मामले में दिल्ली पुलिस ने एक किशोर समेत तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। अन्य आरोपियों की पहचान यश बिधूड़ी और जय कुमार के रूप में हुई है। जांच के दौरान एक टैक्सी चालक अहम गवाह के रूप में सामने आया है। चालक के मुताबिक घटना के बाद उसने किशोर आरोपी को अपनी कैब में बैठाकर दूसरी जगह पहुंचाया था। उसका बयान बीएनएसएस की धारा 183 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराया गया है।
पुलिस जांच में सामने आया कि गिरफ्तार किशोर की उम्र 16 वर्ष से अधिक है और उसकी संलिप्तता एक अन्य आपराधिक मामले में भी बताई जा रही है। इसी आधार पर पुलिस ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 की धारा 15 के तहत किशोर न्याय बोर्ड में आवेदन देकर आरोपी का ट्रायल वयस्क की तरह चलाने की मांग की है। अब अंतिम निर्णय जेजेबी के मूल्यांकन के बाद लिया जाएगा।
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