अंबाला जिले के बराड़ा क्षेत्र में इन दिनों यमुनानगर से आए कई मधुमक्खी पालक खेतों और बागों के बीच अपना डेरा जमाए हुए हैं। ये लोग एक ही जगह टिककर नहीं रहते, बल्कि फूलों की उपलब्धता के अनुसार लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बढ़ते रहते हैं।
फूलों के पीछे-पीछे चलता है यह कारोबार
जहां भी सरसों, सूरजमुखी या किसी अन्य प्रकार के फूलों की खेती होती है, ये मधुमक्खी पालक अपने लकड़ी के बक्सों को लेकर ठीक वहीं पहुंच जाते हैं। फूल ही इनके पूरे काम की धुरी हैं, इसलिए मौसम और फसल के हिसाब से इनका ठिकाना बदलता रहता है।
तीन पीढ़ियों से जुड़ा है परिवार
मधुमक्खी पालक रजत कल्याण बताते हैं कि उनका परिवार तीन पीढ़ियों से इसी काम से जुड़ा हुआ है। यानी यह व्यवसाय उनके लिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता आया एक पारिवारिक पेशा बन चुका है।
30 साल का तजुर्बा
इसी कड़ी में रामेश्वर कुमार पिछले 30 वर्षों से इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। लंबे अनुभव के साथ वे भी इस पारंपरिक काम को आगे बढ़ा रहे हैं।
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