एनडीए की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जिस सुस्त विकास दर को दशकों तक 'हिंदू ग्रोथ रेट' कहकर पुकारा गया, उसे असल में 'कांग्रेस ग्रोथ रेट' कहा जाना चाहिए था। उनके मुताबिक उस दौर की नीतियों, शासन के तौर-तरीकों और आर्थिक फैसलों की जिम्मेदारी कांग्रेस की थी, न कि देश की संस्कृति या बहुसंख्यक समाज की।
राजनीतिक नजरिए से देखा जाए तो प्रधानमंत्री की ये बातें कांग्रेस के लिए परेशानी का बीज साबित हो सकती हैं, क्योंकि अब बीजेपी इस शब्द को जनता के बीच ले जाकर यह समझाने की कोशिश करेगी कि कांग्रेस के शासनकाल में किस तरह हिंदुओं के माथे पर कलंक मढ़ने का काम किया गया।
'कांग्रेस के कुचक्र' पर पीएम का हमला
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि एनडीए के 12 वर्षों की एक बड़ी उपलब्धि यह भी है कि देश कांग्रेस के कुचक्र से मुक्त हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने देश को लाचारगी, बेचारगी और हीन भावना के गर्त में धकेल दिया था।
उनके अनुसार लोगों के मन में यही धारणा बैठाई जाती रही कि भारत में विकास धीरे-धीरे ही होता है और यहां तेज रफ्तार वाली तरक्की मुमकिन ही नहीं है। पीएम मोदी ने कहा कि बड़ी चतुराई के साथ इस धीमी विकास दर को 'हिंदू ग्रोथ रेट' का नाम दे दिया गया, यानी कार्यशैली कांग्रेस की, दायित्व कांग्रेस का और विफलता भी कांग्रेस की, लेकिन कलंक देश की बड़ी हिंदू आबादी के नाम पर थोप दिया गया। उन्होंने जोर देकर कहा कि असल में इस कुसंस्कृति का नाम 'कांग्रेस ग्रोथ रेट' होना चाहिए था।
'कांग्रेस ग्रोथ रेट' और 'NDA ग्रोथ रेट' का फर्क
प्रधानमंत्री ने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर 12 साल में इतना कुछ संभव हो सका, तो आखिर दशकों तक ऐसा क्यों नहीं हुआ। उन्होंने इसी को 'कांग्रेस ग्रोथ रेट' और 'NDA ग्रोथ रेट' के बीच का अंतर बताया।
उनके शब्दों में, एक व्यवस्था लोगों को इंतजार कराती थी, जबकि आज की व्यवस्था परिणाम दिखाती है। उन्होंने कहा कि पहले की व्यवस्था काम को अटकाती और भटकाती थी, जबकि मौजूदा व्यवस्था का भरोसा है कि काम अभी होगा, समय पर होगा और बड़े पैमाने पर होगा। पीएम मोदी के मुताबिक 2014 से 2026 तक की कहानी केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भारत की कहानी है जिसने पहली बार अपनी पूरी क्षमता के साथ दौड़ने का फैसला किया है।
कहां से आया 'हिंदू ग्रोथ रेट' शब्द
'हिंदू ग्रोथ रेट' शब्द मुख्य रूप से 1950 से 1980 के दशक के बीच भारत की औसत आर्थिक विकास दर के लिए इस्तेमाल किया जाता था। उस दौर में भारत की जीडीपी वृद्धि दर करीब 3 से 3.5 प्रतिशत के आसपास रहती थी, जबकि आबादी तेजी से बढ़ रही थी। इसका नतीजा यह हुआ कि प्रति व्यक्ति आय में बहुत सीमित बढ़ोतरी ही हो पाई।
माना जाता है कि इस शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल भारतीय अर्थशास्त्री राज कृष्णा ने किया था। उनका मकसद धीमी आर्थिक वृद्धि को व्यंग्यात्मक अंदाज में पेश करना था। बाद में नेताओं ने इसका प्रयोग शुरू कर दिया, जिसका जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में किया।
पीएम मोदी ने इसे 'कांग्रेस ग्रोथ रेट' क्यों कहा
प्रधानमंत्री मोदी का तर्क है कि धीमी विकास दर के लिए भारत की सभ्यता, संस्कृति या समाज को जिम्मेदार ठहराना सरासर गलत था। उनके मुताबिक उस समय देश में जो आर्थिक नीतियां लागू थीं, वे कांग्रेस सरकारों की बनाई हुई थीं।
उन्होंने याद दिलाया कि स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक भारत में लाइसेंस-परमिट राज, सरकारी नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था और सीमित निजी निवेश का मॉडल चलता रहा। उद्योग लगाने से लेकर उत्पादन बढ़ाने तक लगभग हर काम के लिए सरकारी अनुमति जरूरी होती थी। पीएम मोदी का कहना है कि विकास की रफ्तार धीमी रहने की असली वजह यही नीतियां थीं, इसलिए उस दौर को 'हिंदू ग्रोथ रेट' कहने के बजाय 'कांग्रेस ग्रोथ रेट' कहना ज्यादा सही होगा।
अटल सरकार का जिक्र क्यों
अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा कि देश ने तेज विकास की पहली झलक तब देखी जब अटल जी की सरकार बनी। उन्होंने बताया कि अटल सरकार के दौर में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना, ग्रामीण सड़क योजना, दूरसंचार क्षेत्र में सुधार और बुनियादी ढांचे पर बड़े निवेश जैसे कदम उठाए गए थे।
बीजेपी लंबे समय से यह दावा करती रही है कि आर्थिक सुधारों को रफ्तार देने और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की नींव मजबूत करने में अटल सरकार की अहम भूमिका रही। इसी संदर्भ में मोदी ने अटल सरकार को तेज विकास के शुरुआती मॉडल के रूप में पेश किया।
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