आज के दौर में जब लोग खाने की बर्बादी घटाने और सेहतमंद खानपान को अपनी थाली का हिस्सा बनाने पर ध्यान दे रहे हैं, तब एक ऐसी रेसिपी खूब चर्चा बटोर रही है जो स्वाद और समझदारी का अनूठा संगम है। कच्चे केले की चटनी वैसे तो कई घरों में बनती है, मगर ज्यादातर लोग इसका छिलका कचरे में फेंक देते हैं। हैरानी की बात यह है कि केले के हरे छिलके में भरपूर फाइबर होता है और अगर इसे सही ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो यह स्वाद को कई गुना निखार सकता है।
दक्षिण भारत की पारंपरिक कच्चा केला पचड़ी से प्रेरित यह शून्य-कचरा चटनी पूरे केले का इस्तेमाल करती है। यानी सिर्फ गूदा ही नहीं, बल्कि छिलका भी इस रेसिपी का अहम हिस्सा बनता है। इमली के खट्टेपन, हरी मिर्च की तीखी धार और सरसों के तड़के के साथ तैयार यह चटनी डोसा, इडली या रोजमर्रा के भोजन के साथ बेहद स्वादिष्ट लगती है। सबसे खास बात यह है कि यह रेसिपी जायकेदार होने के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार सोच को भी आगे बढ़ाती है।
क्यों खास है यह शून्य-कचरा चटनी
खाने की बर्बादी कम करने की बात अक्सर सुनने को मिलती है, लेकिन रसोई में इसे अपनाना उतना आसान नहीं लगता। कच्चे केले की यह चटनी इसका एक सरल उदाहरण है कि कैसे रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली चीजों का पूरा फायदा उठाया जा सकता है। कई पोषण विशेषज्ञ भी मानते हैं कि फलों और सब्जियों के छिलकों में अक्सर ऐसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं जो भीतरी हिस्से जितने ही लाभकारी हो सकते हैं।
छिलके और गूदे का पोषण
कच्चे केले का छिलका फाइबर से भरपूर माना जाता है, जबकि इसका गूदा शरीर को ऊर्जा देने वाले स्टार्च का अच्छा स्रोत होता है। इस तरह पूरे केले का इस्तेमाल न सिर्फ चटनी के स्वाद को बढ़ाता है, बल्कि सेहत के लिहाज से भी इसे और फायदेमंद बना देता है।
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