अंतिम विदाई से पहले सुहागिन को सिंदूर-चूड़ियां पहनाने की परंपरा क्यों? जानिए मृत महिला को सजाकर विदा करने का धार्मिक कारण

हिंदू धर्म में मृत सुहागिन को अंतिम संस्कार से पूर्व सोलह श्रृंगार से सजाने की परंपरा उसके अखंड सौभाग्य और वैवाहिक पहचान का सम्मान मानी जाती है। यह रिवाज आत्मा की शांति और पुनर्जन्म से जुड़ी मान्यताओं से गहराई से जुड़ा है।

सनातन परंपरा में जीवन और मृत्यु को एक अटूट और निरंतर चलने वाले चक्र का हिस्सा माना गया है। यही वजह है कि हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर संस्कार का अपना अलग और विशेष महत्व बताया गया है। अंतिम संस्कार से जुड़ी ऐसी अनेक परंपराएं प्रचलित हैं, जिनके मूल में गहरे धार्मिक और आध्यात्मिक भाव छिपे हुए हैं।

इन्हीं रीतियों में से एक है किसी सुहागिन महिला की मृत्यु के बाद, उसे अंतिम विदाई देने से पहले सोलह श्रृंगार से सजाने की परंपरा। पहली बार सुनने या देखने पर यह प्रथा कई लोगों को हैरान कर सकती है, क्योंकि शोक से भरे माहौल में किसी मृत स्त्री को दुल्हन की तरह सजाने का विचार सामान्य नहीं लगता। लेकिन हिंदू मान्यताओं में इसे महज सजावट नहीं, बल्कि सम्मान, श्रद्धा और आध्यात्मिक आस्था से जुड़ा एक अहम संस्कार माना जाता है।

सधवा मृत्यु को विशेष क्यों माना जाता है?

हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि किसी स्त्री की मृत्यु उसके पति के जीवित रहते होती है, तो उसे "सधवा मृत्यु" कहा जाता है। इसे महिला के अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। ऐसी स्त्री अपने जीवन की अंतिम सांस तक सुहागिन बनी रहती है और उसके वैवाहिक चिह्न भी अंत तक उसके साथ बने रहते हैं।

सिंदूर और चूड़ियां सिर्फ आभूषण नहीं

धार्मिक दृष्टिकोण से सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी, बिछिया और मंगलसूत्र केवल आभूषण भर नहीं हैं, बल्कि एक विवाहित स्त्री की पहचान और उसके वैवाहिक जीवन के प्रतीक माने जाते हैं। इसी कारण अंतिम संस्कार से पहले इन प्रतीकों के साथ महिला को विदाई देना उसके सुहाग और वैवाहिक जीवन के प्रति सम्मान प्रकट करने का तरीका माना जाता है।

परंपरा का गहरा अर्थ

मृत सुहागिन को सोलह श्रृंगार से सजाकर विदा करने की यह परंपरा उसके अखंड सौभाग्य, वैवाहिक पहचान और धार्मिक सम्मान का प्रतीक मानी जाती है। यह रिवाज आत्मा की शांति, पुनर्जन्म से जुड़ी मान्यताओं और सांस्कृतिक श्रद्धा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

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