पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में ममता बनर्जी को इतनी बड़ी शिकस्त झेलनी पड़ी, जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। जिस पार्टी को उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचकर पूरे 28 साल तक मजबूती से खड़ा रखा, वही तृणमूल कांग्रेस अब कई टुकड़ों में बंट चुकी है। हैरानी की बात यह है कि यह सब कुछ महज 13 दिनों के भीतर हो गया।
कैसे शुरू हुई पार्टी में फूट?
घटनाक्रम की शुरुआत 22 मई को बंगा भवन में हुई एक आकस्मिक मुलाकात से हुई, जब बागी टीएमसी विधायक ऋतब्रता बनर्जी और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी आपस में मिले। इसके बाद के 13 दिनों में हालात इस कदर बदल गए कि ममता बनर्जी के लिए अपनी ही पार्टी को संभालना मुश्किल हो गया।
बगावत का यह सिलसिला तब अपने अंजाम तक पहुंचा, जब 58 विधायकों ने पार्टी के विधायक दल पर नियंत्रण हासिल कर लिया, ऋतब्रता बनर्जी को अपना नेता चुना और विधानसभा अध्यक्ष से इसकी मान्यता भी ले ली। इस विद्रोह ने औपचारिक तौर पर उस मजबूत जनाधार वाली पार्टी को तोड़ दिया, जिसकी स्थापना ममता बनर्जी ने 1 जनवरी 1998 को कांग्रेस से अलग होकर की थी। हालांकि, इस बगावत के बीज बहुत पहले ही बोए जा चुके थे।
अभिषेक बनर्जी को लेकर असंतोष
विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के कुछ विधायकों को लगने लगा था कि पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के इर्द-गिर्द सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ता जा रहा है। इसी असंतोष के बीच 6 मई को नवनिर्वाचित विधायकों की एक बैठक हुई, जिसमें ममता बनर्जी ने कथित तौर पर विधायकों से चुनाव प्रचार में अभिषेक की भूमिका के लिए खड़े होकर तालियां बजाने को कहा। लेकिन इस इशारे ने विधायकों के एक वर्ग में कानाफूसी को हवा दे दी, जिन्हें यह महसूस होने लगा कि पार्टी तेजी से सिर्फ एक परिवार के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है।
दिल्ली में सुनाई दी टूट की आहट
इसके बाद 22 मई को ऋतब्रता बनर्जी, जो अपना राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने के बाद उससे जुड़ी औपचारिकताएं पूरी करने दिल्ली में थे, लंच के लिए बंगा भवन पहुंचे। वहां उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से हुई, जो पहले से दिल्ली में मौजूद थे। इसके बाद ऋतब्रता ने विपक्षी विधायकों और सांसदों को प्रशासनिक समीक्षा बैठकों में बुलाने के अधिकारी के फैसले का सार्वजनिक रूप से स्वागत किया और इसे एक स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया बताया। उनकी इस टिप्पणी ने तुरंत राजनीतिक गलियारों का ध्यान खींच लिया।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का इतिहास जितना संघर्ष और सफलता से भरा रहा है, उतना ही यह आंतरिक मतभेदों, बगावत और नेताओं के पार्टी छोड़ने की घटनाओं को लेकर भी चर्चित रहा है। मुकुल रॉय से लेकर शुभेंदु अधिकारी और हाल के वर्षों में कई अन्य नेताओं के अलग होने के पीछे गहरे राजनीतिक और सांगठनिक कारण रहे हैं।
आखिर दीदी से कहां हुई चूक, समझें 10 बिंदुओं में
- उत्तराधिकारी की अघोषित ताजपोशी: पार्टी का सबसे बड़ा आंतरिक तनाव तब शुरू हुआ, जब अभिषेक बनर्जी को अघोषित रूप से ममता का उत्तराधिकारी पेश किया जाने लगा। मुकुल रॉय और शुभेंदु अधिकारी जैसे कई वरिष्ठ नेताओं को लगा कि उनके वर्षों के संघर्ष और वरिष्ठता को नजरअंदाज कर कमान अभिषेक को सौंपी जा रही है।
- पुराने बनाम नए की लड़ाई: पार्टी में लंबे समय से 'ओल्ड गार्ड' यानी ममता के संघर्ष के दिनों के वफादार नेताओं और अभिषेक के नेतृत्व वाले 'न्यू ब्रिगेड' के बीच एक वैचारिक और प्रशासनिक शीतयुद्ध चलता रहा। यही टकराव कई नेताओं के इस्तीफे और बगावत की वजह बना।
- आई-पैक का 'कॉर्पोरेट दखल': 2019 के लोकसभा चुनाव में झटके के बाद ममता ने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की कंपनी आई-पैक को जिम्मेदारी दी। जब आई-पैक ने टिकट वितरण, संगठन के कामकाज और नेताओं के प्रदर्शन का आकलन शुरू किया, तो जमीनी और पारंपरिक नेताओं को यह 'बाहरी कॉर्पोरेट दखल' रास नहीं आया और कई ने पार्टी छोड़ दी।
- एजेंसियों का दबाव: शारदा चिटफंड, नारदा स्टिंग ऑपरेशन और हाल के वर्षों में कोयला घोटाला, मवेशी तस्करी तथा शिक्षक भर्ती घोटाले जैसे मामलों में सीबीआई और ईडी की कार्रवाई ने पार्टी को बैकफुट पर धकेल दिया। कई बड़े नेता इस कानूनी और राजनीतिक दबाव से बचने के लिए भाजपा में चले गए।
- भाजपा का मजबूत विकल्प: 2019 के बाद से पश्चिम बंगाल में भाजपा मुख्य विपक्ष के रूप में उभरी। ममता या स्थानीय नेतृत्व से नाराज नेताओं को भाजपा एक मजबूत, संसाधन-संपन्न और सत्ता की संभावनाओं वाला विकल्प नजर आई, जिसने उन्हें बगावत के लिए प्रेरित किया।
- कालीघाट से तय होते फैसले: पार्टी के कई क्षेत्रीय नेताओं की शिकायत रही कि टीएमसी में सारे फैसले कोलकाता स्थित कालीघाट यानी ममता के आवास से तय होते हैं। स्थानीय नेताओं को अपने जिलों में फैसले लेने की स्वायत्तता न मिलने से वे खुद को ठगा हुआ महसूस करते रहे।
- दागदार छवि का असर: शिक्षक भर्ती घोटाले में पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी और अनुब्रत मंडल जैसे कद्दावर नेताओं के जेल जाने से पार्टी की छवि को गहरा झटका लगा। कुछ नेता इस दागदार छवि का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे या उन्हें डर था कि आगामी चुनावों में जनता के गुस्से से वे हार जाएंगे, इसलिए उन्होंने समय रहते दूरी बना ली।
- निचले स्तर पर गुटबाजी: निचले और मध्यम स्तर के संगठन में गुटबाजी टीएमसी की बड़ी कमजोरी रही। एक ही इलाके में दो स्थानीय नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई इतनी बढ़ जाती कि टिकट या पद न मिलने पर दूसरा गुट बगावत कर देता या विपक्षी दल की मदद करने लगता।
- तुष्टिकरण के आरोप: विपक्ष लगातार टीएमसी पर 'अल्पसंख्यक तुष्टिकरण' के आरोप लगाता रहा। इसके चलते हिंदू बहुल क्षेत्रों के कुछ टीएमसी नेताओं को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती महसूस हुई और जनता में पैठ बनाए रखने के लिए उन्होंने 'सॉफ्ट हिंदुत्व' या भाजपा की विचारधारा की ओर रुख करना बेहतर समझा।
- मजबूत विचारधारा का अभाव: तृणमूल कांग्रेस का गठन किसी ठोस दक्षिणपंथी या वामपंथी विचारधारा के बजाय मुख्य रूप से 'वामपंथ विरोध' और 'ममता बनर्जी के व्यक्तित्व' के इर्द-गिर्द हुआ था। जब वामपंथ ही कमजोर पड़ गया, तो नेताओं को बांधे रखने के लिए कोई मजबूत वैचारिक धागा नहीं बचा। ऐसे में नेताओं की निष्ठा व्यक्तिगत हितों और सत्ता के समीकरणों पर टिकी रही, जो समीकरण बदलते ही टूट गई।
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