देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम दर्ज एक बड़ा रिकॉर्ड अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम हो गया है। चुनाव के जरिए निर्वाचित होकर सबसे लंबे समय तक लगातार प्रधानमंत्री पद पर बने रहने वाले नेता अब मोदी बन गए हैं। 10 जून 2026 को उनके निरंतर कार्यकाल के 4399 दिन पूरे हुए, जबकि नेहरू का यह कार्यकाल 4398 दिनों का था। खास बात यह है कि मोदी ने यह मुकाम किसी सियासी गॉडफादर के सहारे नहीं, बल्कि अपनी संगठन क्षमता और कठोर परिश्रम के बूते हासिल किया है।
संसद के द्वार पर नतमस्तक होने वाला वह दिन
20 मई 2014 वह तारीख थी, जब अपने दम पर लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बहुमत दिलाकर नरेंद्र मोदी संसद भवन पहुंचे थे। बीजेपी संसदीय दल की बैठक में उन्हें सदन के नेता के रूप में चुना जाना था। यह कार्यक्रम सेंट्रल हॉल में था, लेकिन वहां पहुंचने से पहले संसद के मुख्य द्वार पर पहुंचते ही मोदी झुक गए और संसद की इस पुरानी इमारत को दंडवत नमन किया। आसपास मौजूद पत्रकार कुछ समझ पाते, उससे पहले ही उन्होंने उस भवन के आगे सिर नवाया, जहां आजादी से पहले सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेंबली और आजादी के बाद लोकसभा व राज्यसभा की बैठकें होती रहीं।
इसके बाद सेंट्रल हॉल में पार्टी नेताओं और नवनिर्वाचित सांसदों ने करतल ध्वनि के बीच उनका स्वागत किया और सर्वसम्मति से उन्हें सदन का नेता चुना गया। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें सरकार बनाने का न्योता दिया और इसके साथ ही मोदी पदनामित प्रधानमंत्री बन गए। उसी शाम वे गांधीनगर पहुंचे, क्योंकि अगले दिन गुजरात विधानसभा से इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी और को सौंपनी थी, जिस पर वे पौने तेरह साल से लगातार बैठे थे।
देर रात किसी ने फोन कर पूछा कि संसद के द्वार पर अचानक दंडवत क्यों हुए और कैसा महसूस हुआ। पहले तो मोदी ने मजाकिया लहजे में कहा कि सिर झुकाने पर आसपास खड़े पत्रकारों के जूते-चप्पल ही दिखे। फिर गंभीर होकर बोले कि संसद को नमन करने का मन सहज ही हो आया, क्योंकि यह प्रजातंत्र का सबसे बड़ा मंदिर है और इसी प्रजातंत्र की ताकत है कि वडनगर के एक गरीब घर में जन्मा व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है।
नेहरू और मोदी की राह में बुनियादी फर्क
मई 2014 में मोदी पहली बार जन समर्थन और प्रजातंत्र की ताकत के बल पर प्रधानमंत्री बने, न कि किसी की कृपा या किसी गॉडफादर की बैकिंग से। यहीं नेहरू से उनकी परिस्थिति एकदम उलट थी। नेहरू को पहली बार पीएम की कुर्सी गांधी की कृपा से मिली थी, जबकि मोदी ने यह मुकाम अपने दम पर बनाया।
इतिहास की किताबों में दर्ज है कि 1946 में जब कांग्रेस का नया अध्यक्ष चुना जाना था, तो उसी के साथ यह भी तय हो जाना था कि अध्यक्ष ही वायसराय की अगुआई वाली अंतरिम सरकार में नंबर दो और आजादी के बाद देश का पहला प्रधानमंत्री होगा। उस वक्त पार्टी में अधिकांश लोग सरदार पटेल को अध्यक्ष बनाना चाहते थे। तब देश में मौजूद सोलह प्रांतीय कांग्रेस समितियों में से चौदह ने पटेल के पक्ष में औपचारिक समर्थन दिया था, जबकि सिर्फ दो समितियां आचार्य कृपालानी के साथ थीं। बावजूद इसके गांधी की जिद के चलते उनके कृपापात्र नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने। गांधी ने अपने परम शिष्य पटेल को दावेदारी से हटने के लिए मना लिया और सरदार ने बेहिचक यह बात मान ली। गांधी का तर्क था कि सरदार उनकी बात मानकर चुप बैठ सकते हैं, पर नेहरू का सत्ता-मोह नहीं छूटेगा और वे अलग पार्टी बनाने से भी नहीं हिचकेंगे, जो आजादी की पूर्व संध्या पर गांधी को मंजूर नहीं था।
इसी वजह से नेहरू 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष और 15 अगस्त 1947 को आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री बने। हालांकि जनता का असली मैंडेट उन्हें 1952 में मिला, जब देश में पहली बार लोकसभा चुनाव हुए। उस चुनाव में कांग्रेस की नैया पार लगाने में उन क्षेत्रीय क्षत्रपों का बड़ा योगदान था, जो अपने-अपने राज्य में नेहरू से ज्यादा मजबूत और लोकप्रिय थे।
शुरुआती चुनावों की तस्वीर
आजादी के बाद की चुनाव प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष और 'लेवल प्लेइंग फील्ड' वाली थी, इसका अंदाजा इसी से लगता है कि पांच साल से पीएम की कुर्सी पर बैठे नेहरू वायुसेना के विमान से पूरे देश का दौरा कर सके और सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल कांग्रेस के प्रचार में हुआ, जबकि विपक्षी नेता बिना फंडिंग और संसाधन के तांगे या टूटी-फूटी जीप पर सवार होकर बमुश्किल कुछ जिलों या राज्यों तक ही पहुंच पाए।
1971 में भी यही हाल रहा, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली में सरकारी मशीनरी का जमकर इस्तेमाल हुआ। यही वजह रही कि 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनका चुनाव निरस्त कर दिया, जिससे नाराज इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दी, विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया और प्रेस की आजादी का गला घोंट दिया। पौने दो साल बाद 1977 में इस भ्रम में उन्होंने इमरजेंसी हटाई कि देश भर में उन्हें जन समर्थन मिलेगा, लेकिन जनता ने उन्हें उखाड़ फेंका और 'जनता सरकार' को सत्ता में पहुंचा दिया।
दो अलग-अलग पृष्ठभूमि
उस दौर में किसी ने नहीं सोचा था कि इमरजेंसी विरोधी आंदोलन में गुजरात में भूमिगत रहकर लोगों को संगठित करने वाला युवा एक दिन उसी नेहरू से आगे निकल जाएगा। जब पांच साल 'नोमिनेटेड पीएम' रहने के बाद नेहरू 1952 में पहली बार जनता का मैंडेट लेने निकले, उस वक्त महज डेढ़ साल के मोदी वडनगर के मामूली घर में मां हीराबा की छाया में जीवन के शुरुआती कदम उठा रहे थे।
इलाहाबाद के अभिजात्य परिवार में जन्मे नेहरू को शायद ही पता रहा हो कि उनका रिकॉर्ड किसी महानगर या बड़े खानदान में नहीं, बल्कि गुजरात के छोटे से कस्बे वडनगर में एक चाय बेचने वाले के घर जन्मा बच्चा तोड़ेगा। 27 मई 1964 को जब नेहरू का देहांत हुआ, तब लंदन के हैरो पब्लिक स्कूल से पढ़े नेहरू के बारे में किसी ने नहीं सोचा था कि उनका रिकॉर्ड एक कस्बाई सरकारी स्कूल का छात्र तोड़ेगा। उस समय मोदी वडनगर के बीएन हाईस्कूल से आठवीं पास कर नौवीं की पढ़ाई में जुटे थे।
नेहरू के सियासी सफर को संवारने में पिता मोतीलाल नेहरू के रसूख और धन का बड़ा हाथ रहा। उन्होंने कांग्रेस का दफ्तर चलाने के लिए इलाहाबाद का अपना विशाल घर दे दिया, जो आज 'स्वराज भवन' के नाम से जाना जाता है, और फिर 'आनंद भवन' नामक महलनुमा घर बनाया, जहां गांधी से लेकर राष्ट्रीय आंदोलन के तमाम बड़े नेता उस दौर के करोड़पति मोतीलाल का आतिथ्य पाते रहे। नेहरू का कानूनी करियर पिता जैसा सफल नहीं रहा, फिर भी बापू के लाड़ले के तौर पर उनकी राजनीति परवान चढ़ती रही और आखिरकार गांधी ने ही उन्हें देश का पहला प्रधानमंत्री बना दिया। नेहरू अपने देहांत तक पीएम की कुर्सी पर रहे। कुल मिलाकर वे पौने सतरह साल प्रधानमंत्री रहे, पर निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल 13 मई 1952 से 27 मई 1964 तक यानी 4398 दिनों का रहा।
मई महीने का अनूठा संयोग
नेहरू के इसी रिकॉर्ड को अब मोदी ने तोड़ दिया है, और इसमें मई महीने का अनूठा संयोग भी है। नेहरू ने निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर मई 1952 में पहली बार कुर्सी संभाली और 1964 के मई में ही उनका देहांत हुआ। मोदी ने भी नेहरू के देहांत के ठीक पचास साल बाद, 26 मई 2014 को पहली बार प्रधानमंत्री पद संभाला। इस साल 26 मई को लगातार बारह साल पूरे करने वाले मोदी 10 जून 2026 को नेहरू से आगे निकल गए। नेहरू के 4398 दिनों के मुकाबले आज उनके 4399 दिन पूरे हो चुके हैं, और यह बात उनकी उपलब्धि को इसलिए भी विशिष्ट बनाती है क्योंकि उन्होंने यह सब बिना किसी सियासी सरपरस्त के अपने दम पर हासिल किया।
संघर्ष से भरा रहा सफर
आज पूरी पार्टी, सरकार के मंत्री और ज्यादातर राज्यों की एनडीए सरकारें इस कीर्तिमान का जश्न मना रही हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब पार्टी के बाहर ही नहीं, भीतर भी मोदी को किनारे करने वालों की कमी नहीं थी। गुजरात प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री के तौर पर राज्य में पहली बार बीजेपी सरकार की नींव रखने वाले मोदी को पार्टी की आंतरिक राजनीति के कारण 1995 में गुजरात से निर्वासित होना पड़ा, उसी साल जब केशुभाई पटेल ने राज्य में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी।
जब मोदी को गुजरात छोड़कर दिल्ली आना पड़ा, तो कई राजनीतिक पंडितों ने उनका भविष्य खत्म मान लिया। मगर महज छह साल में वे वापस गुजरात लौटे। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ही उन्हें लौटने को कहा, जबकि 1995 में विद्रोही नेता शंकरसिंह वाघेला के साथ सरकार बचाने के समझौते के तहत उन्हीं वाजपेयी ने मोदी को दिल्ली भेजने का इशारा किया था। दिल्ली में रहते हुए मोदी ने अपनी संगठन शक्ति का लोहा मनवाया और हरियाणा से हिमाचल तथा जम्मू-कश्मीर से लेकर पंजाब व चंडीगढ़ तक पार्टी को मजबूत किया, कई राज्यों में सत्ता का स्वाद चखाया और पार्टी की केंद्रीय इकाई में संगठन महामंत्री बने।
गुजरात में जीत की हैट्रिक
अक्टूबर 2001 में मोदी को गुजरात भेजना पार्टी नेतृत्व की मजबूरी थी, क्योंकि स्थानीय निकाय चुनावों से लेकर लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में मिली हार के बीच आलाकमान को मोदी के अलावा कोई तारणहार नहीं दिख रहा था। उस नकारात्मक माहौल में मोदी ने 7 अक्टूबर 2001 को पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और एलान किया कि वे यहां टेस्ट मैच नहीं, वनडे खेलने आए हैं।
2003 की शुरुआत में विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने वाला था। मगर 2002 के गोधरा कांड के बाद हुए गुजरात दंगों को लेकर मोदी पर हमले हुए, तो उन्होंने विधानसभा भंग कर जनता का विश्वास फिर हासिल करने का मन बनाया और दिसंबर 2002 में ही चुनाव करा दिए। इन चुनावों में उन्होंने पार्टी को जबरदस्त जीत दिलाई। 1995 और 1998 में संगठन की ओर से जो जिम्मेदारी मोदी ने निभाई थी, 2002 में वही काम उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में किया। इसके बाद 2007 और 2012 में भी पार्टी को विधानसभा चुनाव में जीत दिलाकर उन्होंने जीत की हैट्रिक बनाई। उनके 'गुजरात मॉडल' की चर्चा देश-दुनिया में होने लगी।
पार्टी के भीतर की चुनौती
दिसंबर 2012 की जीत के बाद पूरे देश में मोदी को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखा जाने लगा, हालांकि तब केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार थी। जनता का विश्वास पाने से पहले मोदी को पार्टी का भरोसा जीतना था। कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह था और जहां वे जाते, लाखों लोग उमड़ते, लेकिन कुछ बड़े नेताओं की अपनी महत्वाकांक्षाएं थीं। इनमें लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता भी थे, जिनका चेहरा सामने रखकर बीजेपी 2009 का लोकसभा चुनाव लड़ी और हारी थी, फिर भी उनकी पीएम पद की इच्छा बनी हुई थी।
यही वजह थी कि जून 2013 में गोवा में हुई बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आडवाणी शामिल नहीं हुए। माना जा रहा था कि वहीं मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाएगा, मगर आडवाणी के रुख के कारण 9 जून को तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह सिर्फ इतना ही कर पाए कि मोदी को कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष बनाया जाए। यह भी आडवाणी को मंजूर नहीं हुआ और अगले ही दिन, 10 जून 2013 को उन्होंने विरोध स्वरूप पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। बड़ी मुश्किल से समझाकर उनका इस्तीफा वापस कराया गया। उधर बीजेपी के समर्थन से बिहार में सरकार चला रहे नीतीश कुमार ने खुलेआम मोदी विरोध का झंडा उठा लिया और 16 जून 2013 को अपनी सरकार से बीजेपी मंत्रियों को बर्खास्त कर एनडीए से बाहर निकल गए।
13 सितंबर 2013 को जब राजनाथ सिंह ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, तब आडवाणी उस बैठक में नहीं गए, लेकिन घोषणा के बाद मोदी खुद उनके घर जाकर आशीर्वाद लेने पहुंचे और सम्मान देने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
नेहरू के दौर के बरअक्स बड़प्पन
क्या नेहरू ऐसा कर पाते, इतिहास में झांकें तो जवाब है—नहीं। 1950 में सरदार पटेल के निधन पर नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को अंतिम संस्कार में जाने से रोकने की कोशिश की थी। यही नहीं, नेहरू की अनिच्छा के बावजूद देश के पहले राष्ट्रपति बने और दो बार पुनर्निर्वाचित हुए राजेंद्र प्रसाद का जब 18 फरवरी 1963 को निधन हुआ, तो नेहरू पटना में उनके अंतिम संस्कार तक में शामिल नहीं हुए, बल्कि तत्कालीन राष्ट्रपति राधाकृष्णन को भी जाने से रोकने का प्रयास किया।
जिन सरदार पटेल का हक छीनकर नेहरू को पहला प्रधानमंत्री बनाया गया, उन्हीं नेहरू ने अपने पौने सतरह साल के कार्यकाल में भारत के एकीकरण का भगीरथ कार्य करने वाले सरदार को भारत रत्न नहीं दिया। दिलचस्प यह कि नेहरू को पीएम रहते 1956 में खुद भारत रत्न लेने में कोई नैतिक संकोच नहीं हुआ, जबकि सरदार को यह सम्मान 1991 में मरणोपरांत मिला, वह भी नेहरू के प्रपौत्र राजीव गांधी के साथ, जिनका निधन उसी वर्ष हुआ था। सरदार को देश का सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान पाने के लिए इकतालीस साल इंतजार करना पड़ा, वह भी तब जब नेहरू-गांधी खानदान का कोई व्यक्ति पीएम की कुर्सी पर नहीं था।
नागरिक सम्मानों का बदला स्वरूप
अपने बारह वर्षों के कार्यकाल में मोदी ने नागरिक सम्मानों को आम आदमी के सामर्थ्य और उपलब्धियों को सराहने का माध्यम बना दिया, न कि अभिजात्य वर्ग का आभूषण। हर साल सैकड़ों ऐसे लोगों को ये अलंकरण मिलते हैं, जो सुर्खियों में रहने के बजाय जमीनी स्तर पर बदलाव लाने में लगे रहते हैं।
भारत रत्न से भी मोदी ने सिर्फ अपनी विचारधारा या पार्टी के लोगों को नहीं, बल्कि उन विभूतियों को भी नवाजा जिनके अपने राजनीतिक शिष्य उनके लिए कुछ नहीं कर सके। कर्पूरी ठाकुर इसका बड़ा उदाहरण हैं, जिन्हें भारत रत्न देने का श्रेय मोदी को मिला, जबकि लालू यादव जैसे नेताओं ने उनके नाम पर राजनीति चमकाने के बावजूद यह काम नहीं किया। मोदी ने 2024 में कर्पूरी ठाकुर के साथ-साथ लालकृष्ण आडवाणी, पीवी नरसिंह राव और एमएस स्वामीनाथन को भी भारत रत्न दिया। राव और स्वामीनाथन का बीजेपी से कोई संबंध नहीं था—बल्कि राव तो वही प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने 1992 में बाबरी ढांचा विध्वंस के बाद आरएसएस पर आखिरी बार प्रतिबंध लगाया था।
रिश्ते संभालने और पहल कर सुधारने के मामले में नीतीश कुमार को लेकर दिखाया गया मोदी का बड़प्पन सबके सामने है। बार-बार साथ छोड़ने और अपमानित करने के बावजूद मोदी उन्हें सहेजते रहे, यह सोचकर कि लंबे समय तक राजनीतिक विरोधी रहने के बाद भी ईमानदारी और शुचिता के मामले में नीतीश जैसे लोग विरले हैं।
प्रशासन का अनुभव और रिकॉर्ड
पद संभालते समय नेहरू के पास कोई बड़ा प्रशासनिक अनुभव नहीं था—प्रधानमंत्री बनने से पहले उनका इकलौता प्रशासनिक अनुभव इलाहाबाद म्युनिसपलिटी के चेयरमैन का था। इसके उलट मोदी इस पद के लिए सबसे योग्य थे, क्योंकि उनके पास पौने तेरह साल का सफल मुख्यमंत्री कार्यकाल था, जिसके बल पर प्रशासक के रूप में उनकी धाक जमी।
प्रशासक के तौर पर मोदी का रिकॉर्ड अनूठा है। मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक, यह उनका पचीसवां साल है और इसी साल 7 अक्टूबर को शासन के शीर्ष पर रहते हुए उनके पचीस साल पूरे हो जाएंगे। यही नहीं, मुख्यमंत्री के तौर पर जीत की हैट्रिक लगाने वाले मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में भी जीत की हैट्रिक लगाई है—ऐसा रिकॉर्ड भारतीय राजनीति में पहले कभी नहीं बना।
आर्थिक और वैश्विक मोर्चे पर छाप
मुख्यमंत्री रहते गुजरात को भारत का ग्रोथ इंजन बनाने वाले मोदी ने दिसंबर 2025 में भारत को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था तक पहुंचा दिया। दुनिया में मची उथलपुथल के बीच भारत ही एकमात्र देश है, जो उनकी अगुआई में तेज रफ्तार से आगे बढ़ रहा है।
प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने इंफ्रास्ट्रक्चर, पर्यावरण, रक्षा, स्वास्थ्य, आवास और डिजिटल क्रांति—हर क्षेत्र में भारत को नई ऊंचाई दी है। आम आदमी तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए जनधन, आधार और मोबाइल की त्रिपुटी उनके शासन की बड़ी कामयाबी है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति और अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण जैसे साहसिक फैसले लिए। वैश्विक मोर्चे पर भी वे ढाई दर्जन से अधिक देशों के सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान हासिल कर चुके हैं, जो उनकी अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता की निशानी है। योग को पूरी दुनिया में स्थापित करने से लेकर भारत की प्राचीन नगरियों में जान फूंकने तक, हर जगह उनकी छाप दिखती है।
परिवारवाद से दूरी
जहां ज्यादातर नेताओं के साथ भाई-भतीजावाद और ऐशोआराम जुड़ा रहता है, वहीं मोदी के आसपास न कोई भाई दिखता है, न भतीजा। नेहरू ने पीएम रहते अपनी बहन विजयालक्ष्मी पंडित को एक के बाद कई देशों का राजदूत बनाया और अपने जीवनकाल में ही बेटी को कांग्रेस अध्यक्ष और फिर पीएम बनाने का रास्ता तैयार करने के लिए कामराज प्लान का सहारा लिया। जो भी इंदिरा की राह में बाधा बन सकते थे, उन्हें नेहरू ने कमजोर किया। इसके उलट मोदी के परिवार का कोई सदस्य सरकारी व्यवस्था के आसपास तक नहीं फटका।
नेहरू से लेकर इंदिरा और राजीव गांधी तक, ये सभी प्रधानमंत्री रहते हिल स्टेशन से लेकर अंडमान और लक्षद्वीप तक छुट्टियां मनाने जाते थे। इसके उलट मोदी ने मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक एक दिन की छुट्टी नहीं ली। विदेश दौरों में भी वे रिकॉर्ड बैठकें करते हैं और स्वदेश लौटते ही फटाफट काम में जुट जाते हैं।
पार्टी को सर्वसमावेशी बनाया
संघ के प्रचारक के तौर पर करीब डेढ़ दशक काम करने के बाद मोदी 1987 में बीजेपी से जुड़े, उस वक्त पार्टी की छवि ब्राह्मण-बनियों की पार्टी की थी। मोदी ने दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग को जोड़ते हुए इसे सर्वसमावेशी बनाया। उनकी कैबिनेट में जितनी बड़ी संख्या में इन वर्गों के लोग हैं, उतनी पहले कभी नहीं रही। देश को पहला आदिवासी राष्ट्रपति देने का श्रेय भी मोदी को मिला, जब उन्होंने द्रौपदी मुर्मू को इस पद पर पहुंचाया।
अस्सी के दशक तक उत्तर भारत की पार्टी मानी जाने वाली बीजेपी आज पूर्वोत्तर से दक्षिण और पश्चिम से पूरब तक पूरे देश की पार्टी है। पश्चिम बंगाल में बहुमत के साथ बीजेपी की सरकार बनने की कल्पना मुश्किल थी, लेकिन मोदी ने वह भी कर दिखाया। आज उम्मीदवार चाहे कोई हो, मतदाता मोदी को ध्यान में रखकर वोट देते हैं—पिछले सवा दशक की यह सच्चाई है।
अनुशासित सिपाही की छवि
इतने बड़े कद के बावजूद मोदी आज भी खुद को एक सामान्य कार्यकर्ता और पार्टी का अनुशासित सिपाही बताते हैं। इतिहास के जानकारों को याद होगा कि जब पीडी टंडन कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए थे, तो नेहरू ने सार्वजनिक रूप से उनका विरोध कर उन्हें इस्तीफे के लिए मजबूर कर दिया था। इसके उलट करीब तीन दशक की राजनीति के बावजूद मोदी ने पार्टी फोरम के बाहर कभी आंतरिक मुद्दों पर मुंह नहीं खोला। उन्होंने हमेशा पार्टी को अपनी मां माना।
मोदी का सबसे बड़ा हथियार उनकी दूरदृष्टि, लगन और बड़े लक्ष्य के लिए परिश्रम की पराकाष्ठा है। कामयाबी पर इतराने के बजाय वे और बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं, और यही वजह है कि वे एक के बाद एक नए कीर्तिमान बनाते जा रहे हैं।
अब आगे की राह
मोदी युग कब खत्म होगा, यह भविष्यवाणी अब वे राजनीतिक पंडित भी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, जो शुरुआती वर्षों में हर कुछ महीने पर उनके करियर पर 'फुल स्टॉप' का फतवा जारी करते रहते थे। एक बात तय है—मोदी जब तक अपनी पारी खत्म करेंगे, भारतीय राजनीति में ऐसे रिकॉर्ड बन चुके होंगे, जिन्हें पार करने की जल्दी कोई कल्पना भी नहीं कर पाएगा।
आज नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ने वाले मोदी के लिए देश ही नहीं, दुनिया भर के देशों के शासनाध्यक्षों के बधाई संदेश आ रहे हैं। मोदी अब उस ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं, जहां उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, और वे एक और बड़ी मंजिल पार करने की तैयारी में जुटे हैं।
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