हाल ही में आयोजित ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) को लेकर अभ्यर्थियों और अधिवक्ताओं के बीच गहरी नाराजगी देखने को मिल रही है। इस बार परीक्षा में पूछे गए सवालों को लेकर शिकायत है कि उनका संबंध व्यावहारिक कानूनी ज्ञान से कम और अत्यधिक तकनीकी तथा सामान्य जानकारी से ज्यादा था। अधिवक्ताओं का कहना है कि कई प्रश्न इतने कठिन थे कि अनुभवी विधि विशेषज्ञों के लिए भी उनका जवाब देना आसान नहीं था।
उल्लेखनीय है कि एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने के बाद वकालत शुरू करने के लिए AIBE पास करना अनिवार्य होता है। यही वजह है कि परीक्षा के स्तर और स्वरूप पर उठे सवालों ने बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों को चिंतित कर दिया है।
परीक्षा का स्तर लगातार कठिन होने का आरोप
अधिवक्ता शैलेंद्र द्विवेदी ने बताया कि AIBE में कुल 100 प्रश्न पूछे जाते हैं और परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए कम से कम 45 अंक हासिल करना जरूरी होता है। उनके अनुसार पिछले कुछ वर्षों से परीक्षा का स्तर लगातार कठिन होता जा रहा है। इस बार ऐसे कई सवाल शामिल किए गए, जिन्हें अनुभवी विधि विशेषज्ञों के लिए भी चुनौतीपूर्ण माना जा सकता है।
किस तरह के सवालों पर खड़ा हुआ विवाद
अभ्यर्थियों का कहना है कि प्रश्नपत्र में कुछ सवाल बेहद विशिष्ट कानूनी प्रावधानों पर आधारित थे, जिनका रोजमर्रा की वकालत से सीधा संबंध नहीं था। उदाहरण के तौर पर पूछे गए कुछ सवाल इस तरह थे:
- इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट के तहत विवाह किन घंटों के बीच कराया जा सकता है।
- पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम में भरण-पोषण की अवधि कितनी हो सकती है।
- उत्तराखंड यूनिफॉर्म सिविल कोड नियमों के तहत उत्तराधिकारी की घोषणा के लिए आवेदन रजिस्ट्रार जनरल को कब भेजा जाता है।
अधिवक्ता ने अदालत में दायर की याचिका
इन्हीं सवालों को आधार बनाकर अधिवक्ता राजेश खंडेलवाल ने न्यायालय में याचिका दायर की है। याचिका में मांग की गई है कि ऐसे विवादित और अत्यधिक कठिन प्रश्नों को मूल्यांकन प्रक्रिया से हटाया जाए और परीक्षार्थियों को इसका लाभ दिया जाए।
याचिकाकर्ता का कहना है कि तीन घंटे की परीक्षा में कुछ प्रश्नों को हल करने में 10 से 15 मिनट तक अतिरिक्त समय लग गया, जिसके चलते बाकी प्रश्नों के लिए समय कम पड़ गया।
मूल्यांकन को निष्पक्ष बनाने की मांग
याचिका में यह भी कहा गया है कि AIBE का उद्देश्य भावी अधिवक्ताओं की व्यावहारिक कानूनी समझ और पेशेवर क्षमता का आकलन करना होना चाहिए, न कि दुर्लभ और बेहद तकनीकी जानकारियों की परीक्षा लेना। अधिवक्ताओं का मानना है कि मूल्यांकन प्रक्रिया निष्पक्ष, व्यावहारिक और न्यायसंगत होनी चाहिए, क्योंकि बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों का भविष्य इसी परीक्षा पर टिका होता है।
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