राज्यसभा चुनाव: मीनाक्षी नटराजन कौन हैं, जिनका नामांकन रद्द होने से छिड़ा सियासी घमासान?

मीनाक्षी नटराजन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की वरिष्ठ नेता और मंदसौर से पूर्व लोकसभा सांसद हैं, जो फिलहाल तेलंगाना कांग्रेस की प्रभारी हैं। मध्य प्रदेश से उनका राज्यसभा नामांकन खारिज होने के बाद कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने आ गई हैं।

मध्य प्रदेश में होने वाले राज्यसभा उपचुनाव के लिए कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र चुनाव अधिकारी ने रद्द कर दिया है, जिसके बाद भाजपा कोटे से महेश केवट की दावेदारी और मजबूत हो गई है। इस अहम फैसले के बाद अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के मंदसौर से पूर्व लोकसभा सांसद मीनाक्षी नटराजन देश की राजनीति में चर्चा का बड़ा केंद्र बन गई हैं।

वर्तमान में वह तेलंगाना कांग्रेस की प्रभारी हैं। उनका राज्यसभा नामांकन खारिज होने के बाद दिल्ली के निर्वाचन सदन से लेकर भोपाल के विधानसभा गलियारों तक राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है, जिसने एक बार फिर कांग्रेस और भाजपा को आमने-सामने ला खड़ा किया है। कांग्रेस आलाकमान ने संख्या बल को देखते हुए अपनी इस सुरक्षित मानी जाने वाली सीट से नटराजन को प्रत्याशी बनाकर उन पर भरोसा जताया था, लेकिन ऐन मौके पर पर्चा रद्द होने से देश की सबसे पुरानी पार्टी को बड़ा झटका लगा है।

राहुल गांधी की बेहद भरोसेमंद और कोर टीम की प्रमुख सिपहसालार मानी जाने वाली 52 वर्षीय मीनाक्षी नटराजन का राजनीतिक सफर जमीनी संघर्ष और सादगी से भरा रहा है। वह लंबे अरसे से कांग्रेस के भीतर एक ईमानदार, बौद्धिक और गंभीर नेता के रूप में पहचानी जाती हैं, जिन्होंने छात्र राजनीति से उठकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाई। फिलहाल उनके राज्यसभा टिकट के खारिज होने के पीछे तकनीकी वजहों और तेलंगाना की एक अदालत से जुड़े मामले की जानकारी छुपाने के आरोप बताए जा रहे हैं, जिसे कांग्रेस ने पूरी तरह राजनीति से प्रेरित और लोकतंत्र की हत्या करार दिया है।

उज्जैन के मध्यमवर्गीय परिवार से राहुल गांधी की कोर टीम तक

मीनाक्षी नटराजन का जन्म 23 जुलाई 1973 को मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के नागदा नामक छोटे से कस्बे में एक मध्यमवर्गीय तमिल परिवार में हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई इंदौर में हुई, जहां उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय और होल्कर साइंस कॉलेज से बायोकेमिस्ट्री में पोस्ट ग्रेजुएशन किया और बाद में कानून की पढ़ाई भी पूरी की।

पढ़ाई पूरी करने के बाद वह छात्र राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हो गईं और साल 1999 से 2002 तक कांग्रेस की छात्र शाखा एनएसयूआई की राष्ट्रीय अध्यक्ष रहीं। इसके बाद 2002 से 2005 तक उन्होंने मध्य प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष पद की कमान संभाली। उनकी सादगी और संगठनात्मक क्षमता से राहुल गांधी बेहद प्रभावित हुए और उन्होंने साल 2008 में मीनाक्षी को एआईसीसी का राष्ट्रीय सचिव नियुक्त कर अपनी युवा टीम में शामिल कर लिया।

मंदसौर से संसद में धमाकेदार एंट्री

साल 2009 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश की मंदसौर संसदीय सीट से मीनाक्षी नटराजन को मैदान में उतारा। उस समय मंदसौर सीट भाजपा का अभेद्य किला मानी जाती थी, जहां से भाजपा के दिग्गज नेता लक्ष्मी नारायण पांडेय साल 1971 से लगातार आठ बार चुनाव जीतते आ रहे थे।

मीनाक्षी ने चुनाव प्रचार के दौरान “प्रगति के पथ पर” का नारा दिया और अपनी सादगी तथा आक्रामक प्रचार शैली के बल पर तत्कालीन सांसद लक्ष्मी नारायण पांडेय को 30,000 से अधिक वोटों के अंतर से हराकर पूरे देश को चौंका दिया। 15वीं लोकसभा के अपने पहले ही कार्यकाल में उन्होंने संसद में बेहद सक्रिय भूमिका निभाई और कार्मिक, जन शिकायत, कानून एवं न्याय समिति के साथ-साथ महिला अधिकारिता समिति की प्रखर सदस्य के रूप में अपनी छाप छोड़ी।

मोदी लहर में लगातार दो हार

साल 2009 की शानदार जीत के बाद मीनाक्षी नटराजन का राजनीतिक ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ा, लेकिन साल 2014 में देशभर में चली ‘नरेंद्र मोदी लहर’ ने उनके विजय रथ को रोक दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा के सुधीर गुप्ता के हाथों 3 लाख से अधिक वोटों के बड़े अंतर से हार झेलनी पड़ी। इसके बाद उन्होंने साल 2019 में फिर मंदसौर से किस्मत आजमाई, लेकिन इस बार उनकी हार का अंतर बढ़कर 3.76 लाख वोटों तक पहुंच गया।

लगातार दो बड़ी चुनावी हार के बाद कांग्रेस के भीतर पुराने ढर्रे के नेताओं ने मीनाक्षी नटराजन और उनकी टीम की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने तंज कसते हुए उन्हें “जय जगत गैंग” का नाम दिया, जिसे राहुल गांधी के करीबियों का एक प्रभावशाली अनौपचारिक समूह माना जाता है।

तेलंगाना की कमान मिलते ही रेवंत रेड्डी से टकराव

लगातार चुनावी हार के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी का भरोसा मीनाक्षी नटराजन पर कभी कम नहीं हुआ। उनकी ईमानदारी और वफादारी का इनाम देते हुए पार्टी आलाकमान ने 14 फरवरी 2025 को उन्हें दीपा दासमुंशी की जगह तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नया एआईसीसी प्रभारी नियुक्त किया।

दक्षिण भारत के इस अहम राज्य की कमान संभालते ही नटराजन ने अपनी स्वतंत्र और बेबाक राजनीति शुरू कर दी, जो वहां के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी और राज्य इकाई के कई ताकतवर नेताओं को रास नहीं आई। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कथित तौर पर आलाकमान से यहां तक कह दिया था कि मीनाक्षी की “अत्यधिक सादगी वाली राजनीति” उत्तर भारत में तो चल सकती है, लेकिन तेलंगाना जैसे आक्रामक राजनीतिक माहौल वाले राज्य में इससे पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

हैदराबाद यूनिवर्सिटी जमीन विवाद में अपनी ही सरकार के खिलाफ

तेलंगाना के प्रभारी पद पर रहते हुए मीनाक्षी नटराजन का सबसे बड़ा विवाद तब सामने आया जब उन्होंने मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी सरकार के एक फैसले का खुलकर विरोध किया। दरअसल, तेलंगाना की कांग्रेस सरकार ने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय को आवंटित 400 एकड़ सरकारी जमीन को खाली कराकर किसी अन्य प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल करने का प्रस्ताव तैयार किया था। इस फैसले के खिलाफ विश्वविद्यालय के छात्रों, प्रोफेसरों और सिविल सोसाइटी ने बड़ा आंदोलन शुरू कर दिया।

राज्य प्रभारी होने के बावजूद नटराजन ने सरकार का बचाव करने के बजाय प्रदर्शनकारी छात्रों और शिक्षकों का पक्ष लिया और अपनी ही पार्टी की सरकार के फैसले पर सवाल खड़े कर दिए। उनके इस कदम से तेलंगाना कांग्रेस के भीतर भारी असंतोष फैल गया और स्थानीय नेताओं ने उन पर सरकार को अस्थिर करने तक के आरोप लगा दिए।

पुराने केस को छुपाने के आरोप में रद्द हुआ पर्चा

इस बार वह मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए उम्मीदवार थीं, लेकिन नामांकन पत्रों की स्क्रूटनी के दौरान बड़ा भूचाल आ गया। भाजपा के तीसरे उम्मीदवार महेश केवट के वकीलों ने रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा के समक्ष मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ आधिकारिक लिखित आपत्ति दर्ज कराई। भाजपा के वकीलों का आरोप था कि नटराजन ने अपने चुनावी हलफनामे (फॉर्म 26) में तेलंगाना की एक अदालत में लंबित अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले की जानकारी जानबूझकर छुपाई।

जांच में पाया गया कि अगस्त 2025 में हैदराबाद की एक स्थानीय मजिस्ट्रेट अदालत में ए श्रीलता नामक महिला ने एक निजी शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें तत्कालीन तेलंगाना प्रभारी मीनाक्षी नटराजन को आरोपी नंबर चार बनाया गया था। अदालत ने इस पर संज्ञान लेते हुए सितंबर 2025 में उन्हें नोटिस जारी किया था। इसी केस की जानकारी हलफनामे में न होने को आधार बनाते हुए चुनाव अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के उल्लंघन के तहत नटराजन का नामांकन पत्र पूरी तरह खारिज कर दिया।

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