टाइगर के बच्चे जन्म के समय देख नहीं पाते, फिर इस तरह सीखते हैं जंगल में जीने की कला, जानिए रोचक तथ्य

वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में N-6 बाघिन ने चार शावकों को जन्म दिया। जानिए बाघिन अपने बच्चों को कैसे पालती है और शावक जन्म के बाद कब तक देख नहीं पाते।

वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में N-6 बाघिन ने हाल ही में चार नन्हे शावकों को जन्म दिया। कई दिनों तक नजर न आने के बाद जब बाघिन अपने बच्चों के साथ दिखाई दी, तो वन विभाग और वन्यजीव प्रेमियों को बड़ी राहत मिली। आइए जानते हैं कि एक मादा बाघ अपने बच्चों को जन्म देने के बाद कितने समय तक उनके साथ रहती है, उन्हें कहां छिपाकर रखती है और नवजात शावक कितने दिनों तक देख नहीं पाते।

चार शावकों के जन्म से वन्यजीव प्रेमियों में खुशी

वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में N-6 मादा बाघ के चार शावकों को जन्म देने की खबर वन्यजीव प्रेमियों के लिए बेहद सुखद रही। कुछ समय से बाघिन दिखाई नहीं दे रही थी, जिससे वन विभाग को आशंका थी कि वह ग्रीन कॉरिडोर के रास्ते किसी दूसरे इलाके में चली गई है। आसपास के गांवों में उसकी हलचल की जानकारी मिलने पर ग्रामीणों को सतर्क भी किया गया था। बाद में बाघिन अपने चार नन्हे शावकों के साथ नजर आई, जिससे साफ हो गया कि वह बच्चों की हिफाजत के लिए किसी सुरक्षित ठिकाने पर छिपी हुई थी।

जन्म के बाद बदल जाता है बाघिन का व्यवहार

रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर डॉक्टर रजनीश सिंह के अनुसार, शावकों के जन्म के बाद मादा बाघ का व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है। वह पहले की तुलना में कहीं अधिक सतर्क और रक्षात्मक हो जाती है, क्योंकि नवजात बच्चों की सुरक्षा उसके लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता बन जाती है। यही कारण है कि कई बार बाघिन लंबे समय तक कैमरा ट्रैप और गश्ती दल की नजरों से दूर रहती है। वह ऐसे स्थान चुनती है जहां दूसरे शिकारी जानवर या इंसान आसानी से न पहुंच सकें। N-6 बाघिन का कुछ दिनों तक गायब रहना भी इसी स्वाभाविक व्यवहार का हिस्सा माना जा रहा है।

15 से 20 दिन तक बंद रहती हैं शावकों की आंखें

बहुत कम लोग जानते हैं कि बाघ के बच्चे जन्म के समय देख नहीं पाते। जन्म के बाद करीब 15 से 20 दिनों तक उनकी आंखें बंद रहती हैं और इस दौरान वे सिर्फ मां की गंध और स्पर्श के सहारे जीवित रहते हैं। आंखें खुलने के बाद भी उन्हें पूरी तरह सामान्य रूप से देख पाने में कुछ समय लग जाता है। शुरुआती दिनों में शावक बेहद कमजोर होते हैं, इसलिए मां उन्हें किसी सुरक्षित स्थान पर छिपाकर रखती है। यही वजह है कि जंगल में नवजात शावकों का दिखाई देना बेहद दुर्लभ माना जाता है।

6 से 8 महीने तक साथ रहती है मां

वन विशेषज्ञों के मुताबिक, मादा बाघ अपने बच्चों को करीब 6 से 8 महीने तक लगातार अपने साथ रखती है। इस अवधि में वह उन्हें जंगल में जीवित रहने के जरूरी गुर सिखाती है। शावक मां के साथ रहकर चलना, खेलना, अपने इलाके को पहचानना और खतरों से बचना सीखते हैं। मां उन्हें हर पल अपनी निगरानी में रखती है। शुरुआती महीनों में बच्चे पूरी तरह मां पर निर्भर रहते हैं और उनकी सुरक्षा व भोजन की पूरी जिम्मेदारी बाघिन ही उठाती है, इसलिए वह उन्हें अकेला छोड़ने से बचती है।

भोजन की तलाश में बदलती रहती है ठिकाने

जब बाघिन को भोजन या पानी की तलाश में बाहर जाना पड़ता है, तब वह अपने बच्चों को बेहद सुरक्षित स्थान पर छोड़कर जाती है। चट्टानों की दरारें, छोटी गुफाएं और घनी झाड़ियों वाले इलाके अक्सर उसके पसंदीदा ठिकाने होते हैं, जहां दूसरे शिकारी जानवरों का पहुंचना मुश्किल होता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि मां बनने के बाद बाघिन बार-बार अपना ठिकाना भी बदल सकती है, ताकि शावकों की गंध किसी शिकारी तक न पहुंच पाए। यह रणनीति बच्चों को सुरक्षित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।

मां की खास आवाज पहचान लेते हैं शावक

बाघ के बच्चे जन्म से ही मां के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। जब बाघिन भोजन की तलाश में बाहर जाती है, तो शावक उसके लौटने तक अपने छिपने के स्थान से बाहर नहीं निकलते। वापस आने पर मां एक खास तरह की आवाज निकालती है, जिसे शावक तुरंत पहचान लेते हैं और उसे सुनते ही सुरक्षित ठिकाने से बाहर आते हैं। जंगल में यह अनुशासन उनके जीवित रहने के लिए बेहद जरूरी होता है, यही कारण है कि शुरुआती महीनों में शावक मां के हर निर्देश का पूरी तरह पालन करते हैं।

खेल-खेल में बनते हैं कुशल शिकारी

बाघिन केवल बच्चों की रक्षा ही नहीं करती, बल्कि उन्हें जंगल का कुशल शिकारी भी बनाती है। शावक आपस में खेलते, दौड़ते और नकली लड़ाई करते हैं, जो उनकी स्वाभाविक ट्रेनिंग का हिस्सा होता है। धीरे-धीरे मां उन्हें शिकार का पीछा करना, छिपकर हमला करना और सही समय पर झपट्टा मारना सिखाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यही प्रशिक्षण आगे चलकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाता है। जंगल में जीवित रहने के लिए यह कौशल बेहद अहम होता है और इसकी नींव बचपन से ही पड़ जाती है।

हर बाघ की धारियां होती हैं अलग

बाघ को दुनिया की सबसे बड़ी बिल्ली प्रजाति माना जाता है। इसके शरीर पर बनी काली धारियों का पैटर्न हर बाघ में अलग होता है, ठीक वैसे ही जैसे इंसानों के फिंगरप्रिंट अलग-अलग होते हैं। इसी विशेषता के कारण हर बाघ की अलग पहचान संभव हो पाती है। इसके अलावा बाघ की दहाड़ कई किलोमीटर दूर तक सुनी जा सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अनुकूल परिस्थितियों में इसकी आवाज लगभग 3 किलोमीटर तक पहुंच सकती है। यही खूबियां बाघ को जंगल का सबसे प्रभावशाली और आकर्षक शिकारी बनाती हैं।

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