पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान इस समय भारी उथल-पुथल से गुजर रहा है। उसके कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में जनता अपने अधिकारों की आवाज बुलंद कर रही है, जबकि जवाब में सत्ता गोलियां बरसा रही है। शांतिपूर्ण ढंग से मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों को पाकिस्तान रेंजर्स चुन-चुनकर निशाना बना रहे हैं। इन लोगों का कथित 'अपराध' सिर्फ इतना है कि वे लंबे समय से जारी अत्याचार के खिलाफ खड़े हो गए हैं।
पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoK) में बीते कुछ दिनों में हालात बेहद तेजी से बिगड़े हैं। यहां लोग आजादी और अपने हक की मांग कर रहे हैं, और बदले में उन्हें गोलियों का सामना करना पड़ रहा है। रावलकोट में हुई हिंसक झड़पों के बाद पूरे इलाके में तनाव फैल गया है तथा प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव और गहरा हो गया है। इस पूरे घटनाक्रम ने स्थानीय राजनीति को तो प्रभावित किया ही है, साथ ही पाकिस्तान सरकार की नीतियों और सुरक्षा व्यवस्था पर भी कड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
रावलकोट में खूनी झड़प
रविवार को रावलकोट में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई भिड़ंत में कई लोगों की जान चली गई और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मारे जाने वालों में पुलिसकर्मी और आम नागरिक दोनों शामिल हैं। हालांकि स्थानीय पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कुछ मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि मरने और घायल होने वालों की वास्तविक संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है। सामने आ रहे वीडियो से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस समय पीओके में पाकिस्तानी फौज किस तरह कहर बरपा रही है।
JAAC के प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग
प्रशासन ने जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के प्रस्तावित लंबे मार्च को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चला रखा है। यह मार्च भीमबर से शुरू होकर मीरपुर, कोटली और पुंछ के रास्ते मुजफ्फराबाद तक पहुंचने वाला था, जहां प्रदर्शनकारियों ने विधानसभा के बाहर धरना देने की योजना बनाई थी। प्रशासन ने पहले तो मार्च की अनुमति देने से इनकार कर दिया और आंदोलन से जुड़े कई नेताओं व कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया।
बताया जा रहा है कि पूछताछ और सुरक्षा कारणों का हवाला देकर 200 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है। कई स्थानीय नेता गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत हो गए हैं, फिर भी प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहे।
प्रशासनिक सख्ती के बावजूद विरोध की आवाजें शांत नहीं पड़ीं। मुजफ्फराबाद, रावलकोट, मीरपुर, भीमबर समेत कई इलाकों में लोगों ने प्रदर्शन किए। कई जगहों पर बाजार बंद रहे और यातायात भी प्रभावित हुआ। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे अपने अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।
विवाद की असली जड़ क्या है?
यह किसी एक दिन का गुस्सा नहीं है, बल्कि बरसों से जमा हो रहे असंतोष का नतीजा है। महंगाई, बिजली की लगातार बढ़ती कीमतें, बेरोजगारी, प्रशासनिक खामियां और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को लेकर लोगों में नाराजगी पनप रही थी। JAAC ने इन्हीं मुद्दों को आधार बनाकर व्यापक जनसमर्थन जुटाया और हाल के महीनों में विधानसभा में शरणार्थियों के लिए आरक्षित सीटों को समाप्त करने जैसी मांगों को भी जोरदार तरीके से उठाया। यही मांगें सरकार और संगठन के बीच टकराव की प्रमुख वजह बन गईं।
मानवाधिकारों की अनदेखी
दुनिया भर में खुद को 'शांतिदूत' के रूप में पेश करने में जुटे पाकिस्तान के भीतर प्रदर्शन रोकने के नाम पर गर्भवती महिलाओं और बच्चों तक को मौत के घाट उतारने के आरोप लग रहे हैं। वीडियो में दिखाई दे रहा है कि रेंजर्स निहत्थे लोगों पर दौड़ा-दौड़ाकर गोलियां चला रहे हैं, और पाकिस्तान सरकार इसे जायज ठहरा रही है।
इन घटनाओं के वीडियो सामने आने के बाद कई मानवाधिकार संगठनों ने हालात पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि राजनीतिक असहमति को सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के मसले के रूप में देखना स्थिति को और उलझा सकता है। कुछ संगठनों ने प्रदर्शनकारियों पर की गई कार्रवाई और बड़े पैमाने पर हुई गिरफ्तारियों पर भी सवाल उठाए हैं।
दहशत के पीछे पाकिस्तानी वर्दी
फिलहाल PoK में हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं। यहां पहले भी प्रदर्शन होते रहे हैं और हर बार सेना ने इसी अंदाज में उनका दमन किया है। प्रशासन किसी भी नए बड़े प्रदर्शन को रोकने की तैयारी में जुटा है, जबकि आंदोलनकारी अपने अभियान को जारी रखने पर अड़े हैं।
इस इलाके में जुलाई के महीने में चुनाव होने हैं, ऐसे में स्थानीय मुद्दों और 12 आरक्षित सीटें खत्म करने का मामला और तूल पकड़ता जा रहा है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि अगर जनता की आर्थिक और राजनीतिक मांगों का हल नहीं निकाला गया, तो यह असंतोष आगे चलकर और बड़े आंदोलन की शक्ल ले सकता है। पीओके में पैदा हुआ यह संकट अब केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शासन, प्रतिनिधित्व और नागरिक अधिकारों से जुड़ा एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है।
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