जहां दुनिया भर में लोग मीठे और स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों की तलाश में रहते हैं, वहीं झारखंड के पलामू जिले के निवासी शिव कुमार पांडे ने एक ऐसा अनोखा उत्पाद बनाया है जिसे दुनिया का सबसे कसैला खाद्य पदार्थ कहा जा रहा है। खास बात यह है कि यह सत्व आंवला से तैयार किया गया है और इसके निर्माण की प्रेरणा उन्हें प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथ चरक संहिता से मिली। अपने विशिष्ट स्वाद और औषधीय गुणों के कारण यह इन दिनों लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
चरक संहिता से मिली प्रेरणा
शिव कुमार पांडे के अनुसार, उन्होंने आयुर्वेद के प्राचीन ज्ञान को आधुनिक दौर में लोगों तक पहुंचाने के मकसद से यह विशेष सत्व तैयार किया है। इसके लिए उन्होंने चरक संहिता में वर्णित प्रक्रियाओं का गहन अध्ययन किया और लंबे प्रयोग के बाद इसे विकसित किया। उनका मानना है कि प्रकृति में मौजूद औषधीय गुणों को सही ढंग से संरक्षित कर आम लोगों तक पहुंचाना आवश्यक है।
छह महीने की जटिल प्रक्रिया
इस सत्व को बनाना बेहद कठिन और समय लेने वाला काम है। पांडे बताते हैं कि सबसे पहले आंवला को करीब तीन महीने तक एक खास प्राकृतिक प्रक्रिया में रखा जाता है। इसके बाद अगले तीन महीनों में इसे परिपक्व कर पूरी तरह तैयार किया जाता है। इस तरह कुल मिलाकर करीब छह महीने की लंबी प्रक्रिया के बाद यह सत्व बनकर तैयार होता है। यही वजह है कि इसका उत्पादन सीमित मात्रा में ही संभव हो पाता है।
कई समस्याओं में लाभकारी होने का दावा
शिव कुमार पांडे का दावा है कि आंवला से बना यह सत्व पेट दर्द, कब्ज, एसिडिटी और मधुमेह जैसी समस्याओं में फायदेमंद साबित हो सकता है। इसके साथ ही इसे आंखों की सेहत के लिए भी उपयोगी माना जा रहा है। उन्होंने बताया कि इसके लिए वर्ल्ड रिकॉर्ड में आवेदन करने की तैयारी की जा रही है।
उनके मुताबिक इसकी प्रकृति पूरी तरह शीतल होती है, इसलिए भीषण गर्मी के मौसम में भी यह शरीर को ठंडक पहुंचाने में सहायक है। वे यह भी दावा करते हैं कि इसके नियमित सेवन से पथरी की समस्या में राहत मिल सकती है। हालांकि किसी भी रोग के इलाज के लिए डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी बताया गया है।
कीमत और सेवन का तरीका
पांडे के अनुसार, इस आंवला सत्व का सेवन सुबह नाश्ते के बाद लगभग एक ग्राम मात्रा में किया जा सकता है। इसकी 50 ग्राम की पैकिंग की कीमत 500 रुपये रखी गई है और इच्छुक लोग उनसे संपर्क कर इसे प्राप्त कर सकते हैं। आयुर्वेदिक परंपरा और स्थानीय नवाचार का यह अनूठा संगम आज पलामू को एक नई पहचान दिलाने में जुटा है।
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