मौज-मस्ती की उम्र में मिसाल बनी अंशिका, गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ातीं और पॉकेट मनी से खरीदतीं कॉपी-पेंसिल

जमशेदपुर की ग्रेजुएशन छात्रा अंशिका हर दिन 20 से 25 गरीब बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देती हैं और अपनी पॉकेट मनी बचाकर उनके लिए पढ़ाई का सामान भी खरीदती हैं।

आज के दौर में जब ज्यादातर युवा अपनी पढ़ाई और करियर बनाने में जुटे रहते हैं, उसी उम्र में जमशेदपुर की होनहार बेटी अंशिका समाज के सामने एक ऐसी मिसाल रख रही हैं जिसकी चारों ओर तारीफ हो रही है। ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहीं अंशिका न सिर्फ पढ़ाई में अव्वल रही हैं, बल्कि समाज के वंचित बच्चों के जीवन में शिक्षा की रोशनी पहुंचाने का काम भी कर रही हैं।

10वीं और 12वीं की परीक्षा में टॉपर्स की सूची में जगह बना चुकीं अंशिका मानती हैं कि शिक्षा ही वह जरिया है, जो किसी भी इंसान का भविष्य बदलने की ताकत रखती है। उनके पास रोज 20 से 25 बच्चे पढ़ने आते हैं।

जरूरतमंद बच्चों का बनीं सहारा

अंशिका फिलहाल आर्ट्स विषय से स्नातक की पढ़ाई कर रही हैं और इसके साथ-साथ घर पर ट्यूशन भी पढ़ाती हैं। अपनी व्यस्त दिनचर्या के बावजूद वह हर दिन करीब दो घंटे उन बच्चों के लिए निकालती हैं, जो आर्थिक रूप से बेहद कमजोर परिवारों से आते हैं। इनमें कई ऐसे बच्चे भी हैं जिनके पास न रहने को पक्का घर है और न पढ़ने के लिए जरूरी संसाधन, जबकि कुछ बच्चों के सिर से तो माता-पिता का साया तक उठ चुका है।

शुरुआत में आईं कई दिक्कतें

अंशिका बताती हैं कि कई बार सड़क किनारे या झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों को देखकर उन्हें लगा कि अगर इन्हें शिक्षा से जोड़ा जाए तो इनका भविष्य संवर सकता है। इसी सोच के साथ उन्होंने करीब चार से पांच महीने पहले बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाना शुरू किया। शुरुआती दिनों में बच्चों को एक जगह बैठाकर पढ़ाना अपने आप में एक चुनौती थी, लेकिन धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी।

रोज पढ़ने आते हैं 20 से 25 बच्चे

आज हालत यह है कि हर दिन 20 से 25 बच्चे उनके पास पढ़ने पहुंचते हैं। अंशिका बच्चों को सिर्फ अक्षर ज्ञान ही नहीं देतीं, बल्कि उनमें अनुशासन, आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की प्रेरणा भी भरती हैं। जिन बच्चों को पहले एबीसीडी, गिनती या हिंदी वर्णमाला तक नहीं आती थी, वे अब आसानी से पढ़ और लिख रहे हैं। बच्चे कविताएं सुनाते हैं, गिनती बोलते हैं और पढ़ाई में रुचि भी दिखाने लगे हैं।

पॉकेट मनी से खरीदतीं पढ़ाई का सामान

सबसे खास बात यह है कि अंशिका अपनी छोटी-छोटी पॉकेट मनी बचाकर बच्चों के लिए कॉपी, पेंसिल, रंग और दूसरी जरूरी शैक्षणिक सामग्री भी खरीदती हैं। उनका मानना है कि अगर बच्चों को सही माहौल और थोड़ा-सा सहयोग मिल जाए, तो वे भी जीवन में बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं।

बड़े इरादों से आता है बदलाव

अंशिका की यह पहल इस बात का सबूत है कि समाज में बदलाव लाने के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि बड़े इरादों की जरूरत होती है। उनकी मेहनत और समर्पण न केवल इन बच्चों का भविष्य संवार रहा है, बल्कि समाज के दूसरे युवाओं को भी शिक्षा और सेवा के क्षेत्र में आगे आने की प्रेरणा दे रहा है।

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