यूपी 2027: अखिलेश का 'बड़ा दिल' वाला सियासी दांव बनाम राहुल का 'दलित-मुस्लिम-EBC' गठजोड़, क्या होगा सीट शेयरिंग का फॉर्मूला?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले सपा और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे पर मंथन शुरू हो गया है। सपा जहां आलोक रंजन की सर्वे रिपोर्ट के आधार पर कांग्रेस को 70-75 सीटें देने की तैयारी में है, वहीं कांग्रेस 'दलित-मुस्लिम-EBC' गठजोड़ के सहारे अपनी खोई जमीन तलाश रही है।

दिल्ली में लंबे अंतराल के बाद जब 'इंडिया ब्लॉक' के नेता एक मंच पर जुटे, तो सबसे ज्यादा चर्चा एक तस्वीर की रही, जिसमें राहुल गांधी के ठीक बगल में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव बैठे नजर आए। दोनों नेता मुस्कुराते हुए हाथ मिला रहे थे और सोशल मीडिया पर एकजुटता का संदेश तैर रहा था। लेकिन इस गर्मजोशी के पीछे उत्तर प्रदेश की सत्ता की वह बड़ी परीक्षा छिपी है, जिसमें अब एक साल से भी कम समय बचा है। यह परीक्षा है यूपी विधानसभा चुनाव 2027 की।

दिल्ली की इस बैठक से स्पष्ट संकेत मिले हैं कि 'यूपी के लड़के' एक बार फिर मिलकर सूबे में चुनावी बिसात बिछाने की तैयारी में हैं। हालांकि इस बार दोस्ती के समीकरण कुछ बदले हुए दिख रहे हैं। अखिलेश यादव ने कांग्रेस को 'बड़ा दिल' दिखाने की नसीहत देकर यह जता दिया है कि यूपी की सियासत के असली केंद्र में वही हैं।

अखिलेश का 'बड़ा दिल' वाला सधा हुआ दांव

दिल्ली की बैठक में अखिलेश और राहुल के बीच दिखी केमिस्ट्री ने यह तय कर दिया कि दोनों दल मिलकर ही 2027 के मैदान में उतरेंगे। इसी मौके पर अखिलेश ने कांग्रेस से 'बड़ा दिल' दिखाने की अपील की, जिसका सीधा मतलब सीटों के बंटवारे में नरमी बरतने से है।

अखिलेश ने कांग्रेस को 2024 के लोकसभा चुनाव का हिसाब भी याद दिलाया। उन्होंने कहा कि सपा ने यूपी में कांग्रेस को 17 लोकसभा सीटें दी थीं, जिनमें से कांग्रेस केवल 6 सीटें जीत सकी। उनका इशारा साफ था कि यूपी में इंडिया गठबंधन की सफलता अकेले कांग्रेस के नाम पर नहीं थी, बल्कि इसमें समाजवादी पार्टी का मजबूत जमीनी संगठन, मेहनती कार्यकर्ता और यादव, मुस्लिम तथा पीडीए जैसा ठोस सामाजिक आधार शामिल था।

इस बयान के जरिए सपा यह संदेश देना चाहती है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी के खिलाफ लड़ाई का केंद्र समाजवादी पार्टी ही है और सीटों के बंटवारे में ड्राइविंग सीट पर अखिलेश यादव ही रहेंगे।

सपा का 'प्लान-बी' और आलोक रंजन का फॉर्मूला

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, समाजवादी पार्टी राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस को अधिकतम 80 सीटें देने के मूड में है। इसके लिए अखिलेश ने एक खास 'प्लान-बी' तैयार किया है, जिसके तहत कांग्रेस को हर जिले में कम से कम एक सीट दी जा सकती है।

इस रणनीति के दो फायदे माने जा रहे हैं — पहला, कांग्रेस का मान बना रहेगा, और दूसरा, सालों से क्षेत्र में मेहनत कर रहे सपा कार्यकर्ताओं में नाराजगी या बगावत नहीं होगी। अखिलेश ने अपने सभी विधायकों और जिलाध्यक्षों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने-अपने जिलों में ऐसी एक-एक सीट की पहचान कर रिपोर्ट सौंपें।

सपा इस बार वैज्ञानिक तरीके से सीटों का बंटवारा करना चाहती है और इस मिशन की कमान उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव (रिटायर्ड आईएएस) आलोक रंजन को सौंपी गई है, जो सर्वे टीम का नेतृत्व कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, आलोक रंजन ने अपनी शुरुआती रिपोर्ट में कांग्रेस को गठबंधन के तहत 70 से 75 सीटें देने का सुझाव दिया है।

इन सीटों के चयन के लिए भी एक कड़ा फॉर्मूला बनाया गया है। सपा केवल उन्हीं सीटों को कांग्रेस के खाते में डालेगी जहां:

  • कांग्रेस के पास जमीन पर पकड़ रखने वाला मजबूत उम्मीदवार मौजूद हो।
  • उस सीट का जातीय समीकरण कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक या इंडिया गठबंधन के सामाजिक समीकरण में फिट बैठता हो।

सपा का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में 37 सीटें जीतकर वह यूपी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनी थी, और यह सफलता उसके मजबूत सांगठनिक नेटवर्क की देन थी। इसलिए 2027 में भी वह अपनी इस केंद्रीय भूमिका को कमजोर नहीं होने देना चाहती।

राहुल गांधी का 'दलित-मुस्लिम-EBC' काउंटर प्लान

दूसरी ओर, कांग्रेस भी सिर्फ सपा के भरोसे बैठने के मूड में नहीं है। राहुल गांधी और पार्टी के रणनीतिकार यूपी में पुराना जनाधार वापस पाने के लिए एक साइलेंट गेम प्लान पर काम कर रहे हैं, जिसका नाम है 'दलित-मुस्लिम-EBC' गठजोड़।

कांग्रेस ने अपने अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति विभागों को सक्रिय कर एक साझा मंच तैयार किया है। इसके तहत पूरे प्रदेश में दलित और मुस्लिम समुदायों के बीच आपसी संवाद और भाईचारा बढ़ाने के लिए जमीनी अभियान चलाए जा रहे हैं। राहुल गांधी संसद से लेकर अपनी रैलियों तक सामाजिक न्याय और संविधान बचाने के मुद्दे को लगातार उठा रहे हैं।

हाल ही में राहुल गांधी अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली और अमेठी के दौरे पर थे, जहां उन्होंने वीरांगना मीरा पासी की मूर्ति का अनावरण किया। राजनीतिक जानकार इसे महज एक मूर्ति का अनावरण नहीं, बल्कि चुनाव से ठीक पहले यूपी के पासी (दलित) समुदाय को दिया गया सीधा राजनीतिक संदेश मानते हैं।

कांग्रेस का अगला बड़ा कदम जून महीने में लखनऊ में होने वाली बड़ी बैठक है, जिसका मुख्य एजेंडा 'अत्यंत पिछड़े वर्गों' को पार्टी के पाले में लाना है। राहुल गांधी 2024 के चुनाव प्रचार के समय से ही पिछड़ा, अत्यंत पिछड़ा और दलित — इन तीन शब्दों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं और उनका नारा है 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी'। इसी दबाव का असर है कि केंद्र सरकार भी अब राष्ट्रीय स्तर पर जातीय जनगणना की दिशा में कदम बढ़ाती दिख रही है।

यूपी में EBC का गणित और कांग्रेस की उम्मीदें

यूपी कांग्रेस के नेताओं को राहुल गांधी की ओर से हरी झंडी मिल चुकी है और पार्टी अब उन ओबीसी जातियों को एकजुट करने में जुटी है, जिन्हें राजनीति की मुख्यधारा में पर्याप्त जगह नहीं मिल पाई। कांग्रेस का खास फोकस इन जातियों पर है:

  • नाई
  • राजभर
  • निषाद
  • कश्यप
  • विश्वकर्मा

अतीत का आईना: पिछले चार चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन

1990 के दशक में 'मंडल' और 'कमंडल' की राजनीति के बाद कांग्रेस का जनाधार यूपी से लगभग खिसक गया था और उसका पारंपरिक वोट बैंक सपा, बसपा तथा बीजेपी में बंट गया। 2007 से 2022 तक के आंकड़े बताते हैं कि 2012 को छोड़कर कांग्रेस का ग्राफ लगातार नीचे गिरता रहा है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव – 2022

प्रियंका गांधी के नेतृत्व में पार्टी ने 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' के नारे के साथ अकेले 399 सीटों पर चुनाव लड़ा। यह कांग्रेस के इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन रहा — पार्टी सिर्फ 02 सीटों पर सिमट गई और वोट शेयर गिरकर मात्र 2.33% रह गया। जीतने वाले विधायक रहे रामपुर खास से आराधना मिश्रा 'मोना' और फरेन्दा से वीरेंद्र चौधरी।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव – 2017

कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर 'यूपी के लड़के' के नारे के साथ 114 सीटों पर चुनाव लड़ा। गठबंधन के बावजूद नतीजा निराशाजनक रहा और कांग्रेस केवल 07 सीटें जीत पाई, जबकि वोट शेयर 6.25% रहा। प्रमुख सीटें रहीं — रामपुर खास (आराधना मिश्रा 'मोना'), बेहद (नरेश सैनी), सहारनपुर (मसूद अख्तर) और अमेठी (अमिता सिंह)।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव – 2012

राहुल गांधी के आक्रामक प्रचार के दम पर कांग्रेस बिना किसी बड़े गठबंधन के मैदान में उतरी थी। यह पिछले दो दशकों का उसका सबसे बेहतरीन प्रदर्शन रहा — पार्टी ने 28 सीटें जीतीं और 11.6% वोट शेयर हासिल किया। प्रमुख सीटें रहीं — रामपुर खास (प्रमोद तिवारी), हापुड़ (गजराज सिंह), शामली (पंकज कुमार मलिक) और गंगोह (प्रदीप कुमार)।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव – 2007

मायावती की बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग के दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी और कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही थी। इस चुनाव में कांग्रेस को 22 सीटें मिलीं और वोट शेयर 8.61% रहा। पार्टी मुख्य रूप से अपने पारंपरिक गढ़ रायबरेली, अमेठी और प्रतापगढ़ तक ही सिमट कर रह गई थी।

अखिलेश की शर्त और कांग्रेस का आत्मविश्वास

दोनों दल मिलकर चुनाव लड़ने का मन बना चुके हैं, लेकिन अखिलेश यादव ने एक नई शर्त रखकर कांग्रेस के प्रांतीय नेताओं की धड़कनें बढ़ा दी हैं। उन्होंने साफ कहा है कि गठबंधन का आधार केवल 'जीत' होगा, यानी कांग्रेस को सीटें तभी मिलेंगी जब वह वहां जीतने वाला उम्मीदवार होने का प्रमाण दे पाएगी।

इस पर यूपी कांग्रेस के मीडिया विभाग के उपाध्यक्ष मनीष हिंदवी का कहना है कि पार्टी अपनी जमीन मजबूत करने के लिए हर जरूरी कदम उठा रही है। संगठन में नई जान फूंकने के लिए कांग्रेस ने इस बार बड़ा फैसला लिया है। पार्टी महासचिव और यूपी प्रभारी अविनाश पांडे के मुताबिक, कांग्रेस आगामी एमएलसी चुनावों के साथ-साथ राज्य के 'पंचायत चुनाव' भी पूरी ताकत से लड़ेगी।

कांग्रेस की योजना राज्य की 57,961 पंचायतों, 826 ब्लॉकों और 75 जिला पंचायतों की लगभग 3,500 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, उन्होंने राज्य की 100 विधानसभा सीटों को ऐसी सीटों के रूप में चिन्हित किया है, जहां वे बेहद मजबूत स्थिति में हैं।

क्या 2024 का करिश्मा 2027 में दोहरा पाएगा विपक्ष?

2024 के लोकसभा चुनाव ने विपक्ष को यह भरोसा दिया है कि सही सामाजिक समीकरण और सही मुद्दों के साथ मैदान में उतरने पर बीजेपी के मजबूत किले को भी भेदा जा सकता है। 2027 का चुनाव केवल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी का फैसला नहीं करेगा, बल्कि 2029 के आम चुनाव की नींव भी रखेगा।

एक ओर समाजवादी पार्टी अपने मजबूत 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और आलोक रंजन के सर्वे फॉर्मूले के दम पर 'बड़े भाई' की भूमिका में है, तो दूसरी ओर कांग्रेस राहुल गांधी के 'दलित-मुस्लिम-EBC' कार्ड और पंचायत स्तर के संगठन के सहारे अपनी खोई जमीन वापस पाने को बेताब है। अब देखना दिलचस्प होगा कि सीटों के बंटवारे की मेज पर अखिलेश यादव का 'बड़ा भाई' वाला रसूख भारी पड़ता है या राहुल गांधी का राष्ट्रीय नैरेटिव। इतना तय है कि यूपी 2027 की यह सियासी जंग बेहद दिलचस्प और कांटे की होने वाली है।

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