बिहार के पूर्णिया जिले को यूं ही देश के सबसे प्राचीन जिलों में नहीं गिना जाता। यह जिला अपने भीतर अनेक ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरें समेटे हुए है। जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर कस्बा प्रखंड के बरेटा पंचायत में आज भी महाभारत काल से जुड़ी कई मान्यताएं लोगों की जुबान पर हैं। यहां मौजूद धार्मिक निशानियों को देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं, जिससे पूर्णिया की एक अलग पहचान बनती जा रही है।
करीब 250 साल पुराना अनोखा पेड़
कस्बा प्रखंड के बरेटा में काली पोखर के नाम से प्रसिद्ध प्राचीन वन देवी मंदिर स्थित है, जो स्थानीय लोगों के बीच खासा लोकप्रिय है। मंदिर प्रांगण में पीपल और वट का एक प्राचीन पेड़ है, जिसकी खासियत यह है कि दोनों पेड़ आपस में जुड़े हुए हैं और इनकी शाखाएं एक-दूसरे से लिपटी हुई हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि आंधी आए या तूफान, यह पेड़ टस से मस नहीं होता। गांव के पवन कुमार विश्वाश, अजय मंडल, सुभाष गुप्ता, राम मंडल और सुभाष कुमार समेत कई लोगों के मुताबिक, यह पेड़ लगभग 250 साल से भी अधिक पुराना है।
महाभारत काल की स्मृतियों से जुड़ाव
कस्बा नगर परिषद क्षेत्र का बरेटा काली पोखर और उसके आसपास का इलाका आज भी स्थानीय लोगों के बीच महाभारत काल की यादों से जुड़ा माना जाता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इन मान्यताओं ने इस क्षेत्र को एक विशेष पहचान दी है।
ग्रामीणों के अनुसार, सीमा गांव को प्राचीन समय में विराटनगर की सीमा माना जाता था। इसी सीमा के दक्षिण में स्थित बरेटा वार्ड नंबर 1 का काली पोखर वन देवी मंदिर और आसपास का घना जंगल महाभारत कालीन घटनाओं से जुड़ा हुआ बताया जाता है।
पांडवों से जुड़ी जनश्रुति
जनश्रुति के अनुसार, अज्ञातवास पर जाने से पहले पांडवों ने कुछ समय इसी क्षेत्र में बिताया था। स्थानीय ग्रामीणों का मानना है कि यहां मौजूद दो पोखरों का संबंध उसी स्थान से जोड़ा जाता है, जहां यक्ष के प्रश्नों का उत्तर दिए बिना पानी पीने पर पांडव मूर्छित हो गए थे।
एक मान्यता यह भी है कि वन देवी मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद पांडवों ने अपने अस्त्र और शस्त्र इसी जंगल के एक विशाल वट वृक्ष के पीछे छिपाए थे और इसके बाद सीमा गांव से विराटनगर के लिए रवाना हुए थे। स्थानीय लोगों की आस्था है कि इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
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