भारतीय पशुपालन में देशी गायों की अहमियत हमेशा से सबसे ऊपर रही है और इनमें थारपारकर नस्ल अपनी अलग पहचान रखती है। मूल रूप से राजस्थान के थारपारकर क्षेत्र से पहचानी जाने वाली यह गाय अब देश के दूसरे हिस्सों में भी किसानों की पहली पसंद बनती जा रही है। एक प्रगतिशील किसान ने बातचीत में बताया कि उनके पास मौजूद थारपारकर गाय की ब्रीड करनाल से संवर्धित है। थारपारकर के साथ-साथ गिर और साहिवाल जैसी स्वदेशी प्रजातियों की ओर किसानों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है, क्योंकि ये गायें भारतीय जलवायु के अनुकूल होने के साथ-साथ अपनी उच्च आनुवंशिक क्षमता के लिए जानी जाती हैं।
बीमारियों से बचाता है इन गायों का दूध
थारपारकर गाय के दूध की सबसे बड़ी खूबी इसका ए-2 (A2) प्रोटीन से युक्त होना है। पशुपालक किसान उमेश प्रसाद के अनुसार, जर्सी या एचएफ (होल्सटीन फ्रीजियन) जैसी विदेशी नस्लों के दूध में ए-1 (A1) प्रोटीन पाया जाता है, जिसके सेवन से मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटती है और मधुमेह (शुगर) जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
इसके उलट थारपारकर का ए-2 दूध सेहत के लिए बेहद लाभकारी और आसानी से पचने वाला होता है। उमेश प्रसाद का कहना है कि यह दूध किसी भी तरह की बीमारी को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि शरीर को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है, जिसके चलते आम लोग और मरीज भी इसे बेझिझक पी सकते हैं।
कम खर्च में बेहतर दुग्ध उत्पादन
उत्पादन के लिहाज से भी थारपारकर गाय बेहद किफायती और मुनाफे का सौदा साबित हो रही है। उमेश प्रसाद ने अपनी गाय का हवाला देते हुए बताया कि इस नस्ल की गाय में दूध देने की क्षमता प्रतिदिन लगभग 12 से 15 लीटर तक होती है, जो किसी किसान के लिए व्यावसायिक रूप से काफी फायदेमंद है। खास बात यह है कि इस उन्नत नस्ल को पालने के लिए किसी विशेष या बेहद महंगे खान-पान की जरूरत नहीं पड़ती।
उमेश प्रसाद के मुताबिक इसका रख-रखाव और चारा-पानी पूरी तरह सामान्य गायों की तरह ही होता है। कम लागत में ज्यादा और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन मिलने के कारण यह नस्ल पशुपालकों की आमदनी बढ़ाने में मददगार साबित हो रही है।
नस्ल संवर्धन और जागरूकता जरूरी
आज के दौर में डेयरी क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए किसानों को पारंपरिक सोच से आगे बढ़कर उन्नत नस्लों के संवर्धन पर ध्यान देना होगा। किसान ने स्पष्ट किया कि थारपारकर को खरीदने या पालने में अन्य सामान्य गायों की तुलना में कोई अतिरिक्त खर्च नहीं आता, बस इसके प्रति सही समझ और संवर्धन की कोशिश जरूरी है।
जब किसान इस उन्नत प्रजाति की खूबियों और इसके दूध की बेहतरीन गुणवत्ता को समझेंगे, तभी वे अपनी डेयरी का स्तर सुधार सकेंगे। स्वदेशी नस्लों का यह संरक्षण न सिर्फ किसानों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाएगा, बल्कि समाज को शुद्ध और पौष्टिक दूध भी उपलब्ध कराएगा।
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