ताइवान को अपने कब्जे में लेने की कोशिश में जुटे चीन ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिससे अमेरिका और ताइवान दोनों की चिंता बढ़ गई है। पीएलए ने उत्तर-पश्चिमी चीन के गोबी रेगिस्तान में अपने अत्याधुनिक एयर-डिफेंस सिस्टम 'HQ-16F' का पहला लाइव-फायर टेस्ट चुपचाप पूरा कर लिया है। बीजिंग को आशंका है कि भविष्य की कोई भी जंग सिर्फ समंदर या 180 किलोमीटर चौड़े ताइवान स्ट्रेट तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि ताइवान और अमेरिका की लंबी दूरी की मिसाइलें सीधे चीनी भूभाग के भीतर तबाही मचा सकती हैं। इसी खतरे से निपटने के लिए चीन ने यह तैयारी की है।
गोबी रेगिस्तान में लाइव-फायर ड्रिल
चीन के सरकारी टेलीविजन चैनल सीसीटीवी ने 5 जून को यह जानकारी सार्वजनिक की कि चीनी सेना ने अपने नए मिसाइल एयर-डिफेंस सिस्टम का लाइव-फायर परीक्षण किया है। इस अभ्यास को ईस्टर्न थिएटर कमांड की 73वीं ग्रुप आर्मी की एक टुकड़ी ने अंजाम दिया, जो हजारों किलोमीटर का सफर तय करके गोबी रेगिस्तान पहुंची।
सैनिकों ने बेहद कठिन परिस्थितियों और भारी इलेक्ट्रॉनिक रुकावटों के बीच इस हथियार की क्षमता को परखा। परीक्षण के दौरान नए सिस्टम ने 50 किलोमीटर की दूरी से एक साथ कई हवाई निशानों को आसमान में ही नष्ट कर दिया।
HQ-16F की मारक क्षमता और 250KM की रडार रेंज
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह चीन के 'एचक्यू (HQ)-16' मिसाइल परिवार का ही उन्नत संस्करण (HQ-16F) है। इस मिसाइल को सीधे ऊपर की दिशा में दागा जाता है, यानी इसे नौसेना के युद्धपोतों पर भी आसानी से लगाया जा सकता है। लॉन्चर को घुमाने की जरूरत नहीं पड़ती और यह 360-डिग्री किसी भी दिशा से आ रहे लक्ष्य को निशाना बना सकता है।
- क्षमता: इसकी ताकत अमेरिकी पैट्रियट (Patriot PAC-2 और PAC-3) एयर डिफेंस सिस्टम के बराबर या उससे अधिक मानी जा रही है।
- रडार: इसके एक्सपोर्ट मॉडल में लगा AESA रडार 250 किलोमीटर दूर से ही दुश्मन की गतिविधियों को पहचान लेता है।
ताइवान की मिसाइलों से चीन की चिंता
चीन को डर है कि ताइवान के पास मौजूद अमेरिकी 'ATACMS' मिसाइलें चीन के भीतर 300 किलोमीटर के दायरे में बने ठिकानों को निशाना बना सकती हैं। इन मिसाइलों की रफ्तार इतनी तेज है कि चीन के रडार और एयर-डिफेंस सिस्टम को संभलने का मौका ही नहीं मिल पाता।
Hsiung Feng IIE क्रूज मिसाइल का खतरा
ताइवान के पास Hsiung Feng IIE जैसी क्रूज मिसाइलें भी हैं, जिनकी एक्सटेंडेड रेंज 1,200 किलोमीटर तक है और जो चीन के भीतर गहराई तक मार कर सकती हैं। ये मिसाइलें रडार की पकड़ से बचकर कम ऊंचाई पर उड़ती हैं और जमीनी बनावट का फायदा उठाते हुए सीधे लक्ष्य पर गिरती हैं, जिससे इन्हें रोक पाना लगभग असंभव हो जाता है।
यूक्रेन युद्ध से मिला सबक
जिस तरह विशाल देश होने के बावजूद रूस यूक्रेन की मार से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह पाया, उसी तरह चीन के लिए भी अपनी इतनी बड़ी सीमा को हर जगह सुरक्षित रखना मुश्किल है। पूरे देश को एयर-डिफेंस से कवर करना चीन के बस की बात नहीं है, इसी वजह से उसे अपनी मिसाइलें सिर्फ सीमा पर नहीं, बल्कि अपनी सेना और अहम ठिकानों के आसपास तैनात करनी पड़ रही हैं।
ईरान पर अमेरिकी हमले से बढ़ी बेचैनी
जून 2025 में अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर जिस तरह भारी बम गिराए थे, उससे चीन की चिंता और बढ़ गई है। उसे आशंका है कि अमेरिका वैसा ही कदम उसके खिलाफ भी उठा सकता है।
- हामी न्यूक्लियर साइट: रिपोर्ट के मुताबिक चीन की 'हामी न्यूक्लियर सिलो' को छिपाने के लिए रेगिस्तान में बंकर बनाए जा रहे हैं और वहां HQ-16F जैसी एयर डिफेंस तैनात की जा रही है।
- बीजिंग मिलिट्री सिटी: चीन अपनी राजधानी के नीचे बने 'बीजिंग मिलिट्री सिटी' जैसे कमांड सेंटर की सुरक्षा पर भी पूरा जोर लगा रहा है।
क्या नो-फर्स्ट-यूज नीति को ताक पर रख देगा चीन?
चीन भले ही दावा करता रहे कि वह पहले परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं करेगा, लेकिन हालात बिगड़ने पर वह इस नियम को दरकिनार कर सकता है। अगर उसे लगा कि उसकी सरकार या परमाणु हथियार नष्ट होने वाले हैं, तो हार टालने के लिए वह परमाणु हथियार चलाने में देर नहीं करेगा। इस नए सिस्टम की तैनाती साफ संकेत दे रही है कि चीन अब मान चुका है कि ताइवान को लेकर लड़ाई सिर्फ समंदर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उसके भूभाग के भीतर तक पहुंच सकती है।
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