OPINION: जिम ट्रेनर के प्यार में बदला आस्था का रंग, पर क्या ब्रेनवॉश से कोई अपनी पहचान सच में मिटा सकता है? जानिए मनोवैज्ञानिक सच

शामली में एक हिन्दू युवक के धर्म परिवर्तन ने सवाल खड़े कर दिए हैं। पर क्या हिन्दू-मुसलमान के नज़रिये से हटकर देखें तो यह असल में गैसलाइटिंग और कोर्सिव कंट्रोल का मनोवैज्ञानिक मामला है?

प्रेम अपने आप घटित होने वाली भावना है — बेसाख्ता, बिना किसी औपचारिकता और बिना किसी पूर्व-नियोजित इरादे के। सच्चे इश्क में अगर इरादा शामिल हो जाए तो वह मुहब्बत का अपमान बन जाता है, और जहाँ इरादा होता है, वहाँ रिश्ता प्रेम नहीं बल्कि एक सुनियोजित यानी टारगेटेड रिलेशनशिप बन जाता है।

शामली का मामला और उठते सवाल

शामली में एक हिन्दू युवक के धर्म परिवर्तन की घटना ने माहौल गरमा दिया। लेकिन अगर इसी प्रकरण को हिन्दू-मुसलमान के चश्मे से अलग हटकर देखा जाए, तो क्या यह मामला कुछ ज़्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया नहीं लगता?

सवाल यह भी है कि क्या कोई पढ़ा-लिखा और समझदार इंसान प्रेम में इस कदर अपना होश गँवा सकता है कि वह अपनी जड़ों और अपनी पहचान तक को भुला बैठे।

आस्था बनाम मनोविज्ञान

इसमें कोई संदेह नहीं कि आस्था पूरी तरह से व्यक्तिगत विषय है। पर जब इस घटना को मनोविज्ञान की कसौटी पर परखते हैं, तो यह केवल धर्म परिवर्तन भर नहीं, बल्कि गैसलाइटिंग, थॉट रिफॉर्म और कोर्सिव कंट्रोल जैसे मानसिक प्रभाव का मामला नज़र आता है।

https://hindi.news18.com/news/lifestyle/trends-opinion-can-brainwash-obsessive-love-erase-ones-innate-roots-know-physiology-of-religious-conversion-10554384.html