ईरान और इजरायल के बीच हुए सैन्य हमलों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर युद्ध समाप्त करने को लेकर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय, दोनों स्तरों पर दबाव और गहरा कर दिया है। एक विश्लेषण के अनुसार, युद्ध की मौजूदा स्थिति अमेरिका और इजरायल के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। यह टकराव वही है जिसकी शुरुआत ट्रंप ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ मिलकर करीब तीन महीने पहले की थी।
नेतन्याहू की राजनीतिक गणित
विश्लेषण कहता है कि नेतन्याहू चाहते हैं कि ईरान की रीढ़ टूटने तक यह युद्ध चलता रहे, ताकि आगामी इजरायली चुनावों में उन्हें राजनीतिक फायदा मिले और 'ग्रेटर इजरायल' की अवधारणा के तहत क्षेत्रीय दबदबा बढ़ाया जा सके। ऐसे में सवाल यह है कि युद्ध के इस मोड़ पर ट्रंप के लिए 'जीत' आखिर होगी क्या।
ट्रंप के सामने 'जीत' की पहेली
ट्रंप ऐसा नतीजा चाहते हैं जो युद्ध छेड़ने के उनके फैसले को सही ठहरा सके। यह फैसला बेहद महंगा साबित हुआ है, इसने दुनिया भर में ऊर्जा संकट खड़ा किया है और भारी आर्थिक नुकसान भी पहुंचाया है। इस साल के आखिर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में भी यह युद्ध ट्रंप के लिए राजनीतिक मुश्किलें पैदा कर सकता है।
इसके साथ ही वह ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ऐसा समझौता चाहते हैं, जिसे लेकर वह दावा कर सकें कि यह 2015 में हुए उस समझौते से बेहतर है, जिसे संयुक्त व्यापक कार्य योजना कहा जाता है। यह समझौता तेहरान ने ओबामा प्रशासन और उसके अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ किया था, जिससे ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को अलग कर लिया था। हालांकि ईरान अब तक अमेरिकी शर्तों के सामने झुकने को तैयार नहीं दिखा है।
क्षेत्रीय ताकत के रूप में उभरता ईरान
विश्लेषण के मुताबिक, तेहरान ने वैचारिक प्रतिबद्धता, राष्ट्रीयता की भावना और सैन्य क्षमता के बल पर अपनी स्थिति मजबूत की है और वह एक प्रमुख क्षेत्रीय शक्ति बनकर उभरा है। ईरान पर आरोप है कि उसने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए और इजरायल पर ड्रोन तथा मिसाइल हमलों के जरिए जवाब दिया। इसके अलावा उसने रणनीतिक रूप से अहम होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ मजबूत की है, जिसे वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का अहम रास्ता माना जाता है।
संकट ने भीतर से मजबूत की सरकार
विश्लेषण में कहा गया है कि इस संघर्ष ने ईरान के भीतर इस्लामिक सरकार और उसकी सत्ता में नई जान फूंक दी है, क्योंकि बाहरी खतरे के चलते कुछ विरोधी नागरिक भी राष्ट्रप्रेम के नाते सरकार के साथ खड़े हो गए हैं। साथ ही ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की भूमिका और मजबूत हुई है, जिसे अमेरिका और उसके कई सहयोगी आतंकवादी संगठन की श्रेणी में रखते हैं।
रूस-चीन का सहारा
लेख के अनुसार, ईरान पूरी तरह अलग-थलग नहीं है, क्योंकि उसे रूस और चीन का समर्थन हासिल है और भौगोलिक स्थिति के कारण उसकी पहुंच क्षेत्रीय व्यापार मार्गों तक बनी हुई है। यह सही है कि अमेरिका और इजरायल के पास सैन्य शक्ति ज्यादा है और वे ईरान को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन ईरान की रणनीतिक स्थिति भी अब पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुकी है, जिससे वार्ता की मेज पर वह बेहतर स्थिति में है।
यह लगभग तय माना जा रहा है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम या होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं होगा। विश्लेषण रेखांकित करता है कि ईरान का राजनीतिक ढांचा लंबे समय तक दबाव झेलने और टिके रहने के लिए बना है, जिसके चलते वह अपने विरोधियों को थका देने की रणनीति अपनाता है।
1979 की गूंज
विश्लेषण में 1979–81 के ईरान बंधक संकट का जिक्र करते हुए कहा गया है कि उस समय भी ईरान ने अमेरिकी दूतावास पर कब्जे के बाद 66 अमेरिकियों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर और संकट को लंबा खींचकर अमेरिका पर मनोवैज्ञानिक तथा राजनीतिक दबाव बनाया था।
खामेनेई ने उस घटना को 444 दिनों तक खिंचने दिया, ताकि वह अपनी ताकत बढ़ा सकें और अपने पूर्ववर्ती मोहम्मद रजा शाह पहलवी की पश्चिम-समर्थक राजशाही का साथ देने के लिए अमेरिका को बेइज्जत कर सकें। इस घटना का असर इतना गहरा था कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर चुनाव हार गए और बंधकों की रिहाई केवल जनवरी 1981 में रोनाल्ड रीगन के शपथ ग्रहण के बाद ही हो सकी।
आगे क्या?
लेख में दावा किया गया है कि मौजूदा टकराव अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन ईरान इसे लंबे समय तक खींचकर अमेरिका और इजरायल पर दबाव बनाने की रणनीति अपना सकता है। अंत में विश्लेषण यह भी कहता है कि इस पूरे संकट का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका और इजरायल आगे क्या कदम उठाते हैं और क्या कोई ऐसा समझौता हो पाता है जो सभी पक्षों को स्वीकार्य हो।
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