अरावली की पहाड़ियों की गोद में बसे सिरोही जिले के आमथला गांव के तपोवन में करीब दो बीघा भूमि पर अंजीर की पूरी तरह जैविक खेती की जा रही है। कम पानी, सीमित खर्च और बाजार में हमेशा बनी रहने वाली मांग के कारण यह फसल किसानों के लिए मुनाफे का अच्छा रास्ता बनकर उभर रही है। गोबर की खाद, जीवामृत और नीम पर आधारित जैविक उपायों से तैयार होने वाले इन अंजीरों की गुणवत्ता बेहतर रहती है और इन्हें बाजार में अच्छे दाम भी मिलते हैं।
सिरोही की जलवायु अंजीर के लिए अनुकूल
जिले की जलवायु को अंजीर की खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। अरावली की पहाड़ियों और यहां के सामान्य तापमान के कारण अंजीर के पेड़ अच्छी तरह बढ़ते हैं। जिले में कई जगहों पर इसकी खेती होती है, लेकिन अरावली की तलहटी में बसे आमथला गांव के तपोवन में करीब दो बीघा में जैविक तरीके से अंजीर उगाई जा रही है।
तपोवन के बीके ललन भाई ने बताया कि यहां कई तरह के फल, फूल और सब्जियों की जैविक खेती की जाती है। इनमें से अंजीर की खेती सिरोही जिले के लिए खासी उपयुक्त मानी जाती है।
आठ साल पहले हुई थी शुरुआत
तपोवन में करीब 8 वर्ष पहले अंजीर को जैविक तरीके से उगाने का फैसला लिया गया था। छोटे पौधों की रोपाई के बाद गोबर की खाद के साथ-साथ छाछ, गोमूत्र और पानी के मिश्रण से तैयार जीवामृत जैसे बिना रसायन वाले देसी खाद का इस्तेमाल किया गया, जबकि कीटों से बचाव के लिए नीम की खली से तैयार कीटनाशक का उपयोग किया गया।
जिले की अनुकूल जलवायु को देखते हुए सरकार की ओर से सिरोही में अंजीर एक्सीलेंस सेंटर स्थापित करने की भी योजना है।
किसानों के लिए फायदे का सौदा
बीके ललन भाई के मुताबिक कम लागत में अच्छा मुनाफा कमाने के लिए अंजीर एक बेहतरीन फसल है। यह एक सेहतमंद और महंगा फल है, जिसकी मांग बाजार में हमेशा बनी रहती है। कम पानी वाले इलाकों के किसानों के लिए इसकी व्यावसायिक खेती आमदनी का शानदार जरिया साबित हो सकती है।
उन्होंने बताया कि यदि खेती पूरी तरह जैविक तरीके से की जाए, तो न सिर्फ लागत घटती है, बल्कि फलों की गुणवत्ता और बाजार भाव भी बेहतर मिलते हैं।
ऐसे करें खेती की शुरुआत
अंजीर की खेती शुरू करने से पहले खेत की अच्छी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बनाना जरूरी है। इसके बाद 2 फीट के गड्ढे खोदकर उन्हें कुछ दिनों तक धूप में खुला छोड़ दें, ताकि हानिकारक बैक्टीरिया नष्ट हो जाएं। मानसून की शुरुआत में इन गड्ढों को मिट्टी और भरपूर मात्रा में सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट (केंचुआ खाद) के मिश्रण से भरकर पौधों की रोपाई करें।
अंजीर को बहुत कम पानी की जरूरत होती है, इसलिए यह सूखे क्षेत्रों के लिए वरदान है। सर्दियों में 10-15 दिन के अंतराल पर और गर्मियों में सप्ताह में एक बार सिंचाई पर्याप्त रहती है।
गोबर की खाद और नीम की खली का इस्तेमाल
रासायनिक खादों की जगह हर साल पौधे की उम्र के हिसाब से गोबर की खाद, केंचुआ खाद और जरूरत के मुताबिक नीम की खली देनी चाहिए। कीटों से बचाव के लिए रासायनिक कीटनाशकों के बजाय नीम तेल या जीवामृत का छिड़काव करें।
सर्दियों में पौधों की छंटाई जरूरी है। जमीन से एक फीट ऊपर आने के बाद हर साल छंटाई करने से फल बड़े और अच्छी क्वालिटी के मिलते हैं। एक पौधे से रोपाई के दो से तीन साल बाद फल पूरी तरह परिपक्व होकर मिलने लगते हैं।
सिंचाई और तुड़ाई का सही तरीका
सिंचाई के लिए ड्रिप पद्धति का उपयोग कारगर रहता है। जब फल का रंग हरे से बदलकर हल्का पीला या भूरा होने लगे और वे थोड़े नरम पड़ जाएं, तब उनकी तुड़ाई करनी चाहिए। एक पूरी तरह विकसित पेड़ सालाना करीब 15 से 20 किलो तक उपज देता है।
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