नौकरी छोड़कर शुरू किया कारोबार, झेलीं तमाम मुश्किलें, फिर भी डटे रहे ग्रेटर नोएडा के अमित उपाध्याय

ग्रेटर नोएडा के उद्यमी अमित उपाध्याय ने नौकरी छोड़कर कारोबार की राह चुनी और कैंसिल ऑर्डर, कर्ज व आर्थिक संकट से जूझते हुए आज सालाना 5 से 7 करोड़ रुपये के टर्नओवर तक पहुंच गए हैं।

कहते हैं कि लगातार मेहनत करने वालों को एक न एक दिन कामयाबी जरूर मिलती है। ग्रेटर नोएडा के उद्यमी अमित उपाध्याय की कहानी इसी बात की मिसाल है। उन्होंने नौकरी छोड़कर व्यापार का रास्ता चुना और तमाम कठिनाइयों के बावजूद आज करोड़ों रुपये का टर्नओवर खड़ा कर लिया है।

अमित ने नौकरी छोड़ने के बाद आर्थिक संकट, कैंसिल हुए ऑर्डर, क्रेडिट कार्ड के कर्ज और गोल्ड लोन जैसी कई मुसीबतें झेलीं, लेकिन कभी हार नहीं मानी। आज उनका कारोबार सालाना 5 से 7 करोड़ रुपये के टर्नओवर तक पहुंच चुका है और वे प्रत्यक्ष रूप से 50 से 100 लोगों को रोजगार दे रहे हैं।

14-15 हजार की नौकरी से शुरू हुआ सफर

अमित उपाध्याय बताते हैं कि वे साल 2007 में ग्रेटर नोएडा आए थे। इससे पहले वे एक फार्मा कंपनी के सेल्स विभाग में काम करते थे, जहां उनकी मासिक आय 14 से 15 हजार रुपये के बीच थी। कुछ परिस्थितियों के चलते उन्हें ग्रेटर नोएडा आना पड़ा। यहां पहुंचकर उन्होंने एक स्टोर में महज 7,500 रुपये प्रतिमाह पर नौकरी की। बाद में उन्हें पेरिप्लास्ट लिमिटेड में बेहतर वेतन पर काम करने का मौका मिला और जीवन पटरी पर आने लगा।

मोदी के भाषण ने बदली सोच

अमित के मुताबिक साल 2014 उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। वे बताते हैं कि उसी वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भाषण में कहा था कि देने वाले बनो, लेने वाले नहीं। यह बात उनके दिल को छू गई। उन्होंने सोचना शुरू किया कि अगर पूरी मेहनत और समर्पण के साथ ही काम करना है, तो क्यों न खुद का कुछ किया जाए। इसी सोच के साथ उन्होंने नौकरी छोड़ने का फैसला कर लिया, जबकि उन्हें व्यापार की बारीकियों या मशीनरी से जुड़े काम का कोई खास अनुभव नहीं था।

ग्रेटर नोएडा से दिल्ली तक की भागदौड़

नौकरी छोड़ने के बाद करीब एक सप्ताह तक वे अपने भविष्य को लेकर असमंजस में रहे। इसके बाद उन्होंने पैकेजिंग आइटम और होम अप्लायंस स्पेयर पार्ट्स की ट्रेडिंग शुरू की। शुरुआती दौर बेहद मुश्किल भरा रहा। वे ग्रेटर नोएडा से कच्चा माल खरीदकर दिल्ली ले जाते, वहां उसे बेचते और फिर लौट आते। इस दौरान उनकी जमा पूंजी धीरे-धीरे खत्म होती गई। किराए के मकान में रहना और परिवार का खर्च उठाना, इस वजह से आर्थिक दबाव लगातार बढ़ता रहा।

कैंसिल ऑर्डर ने झकझोरा

साल 2015 तक हालात इतने बिगड़ गए कि उन्होंने बड़ी मुश्किल से 50 हजार रुपये जुटाए। इसी बीच एक बड़ा ऑर्डर कैंसिल हो गया, जबकि माल पहले ही तैयार कराया जा चुका था। इस घटना ने उन्हें आर्थिक और मानसिक दोनों रूप से हिलाकर रख दिया। वे बताते हैं कि उस समय समझ ही नहीं आ रहा था कि आगे क्या किया जाए। कई बार ऐसा भी लगा कि सबकुछ छोड़ देना चाहिए, मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

मशीन लगते ही पकड़ी रफ्तार

अमित ने बताया कि कारोबार को बचाने के लिए उन्होंने क्रेडिट कार्ड का सहारा लिया और जरूरत पड़ने पर गोल्ड लोन भी लिया। आर्थिक संकट के बावजूद उनका हौसला नहीं डगमगाया। आखिरकार साल 2017 में उन्होंने पैकेजिंग की नई मशीन लगाई। यह फैसला उनके कारोबार के लिए मील का पत्थर बना। मशीन लगने के बाद उत्पादन बढ़ा और धीरे-धीरे व्यापार ने रफ्तार पकड़ ली। उनके अनुसार साल 2020 और 2021 में उनके व्यवसाय ने उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की।

परिवार का मिला पूरा साथ

कारोबार आगे बढ़ता गया और परिवार का भरोसा भी मजबूत होता गया। अमित अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे हैं और उन्हें परिवार का पूरा सहयोग मिला। उनकी पत्नी श्रेष्ठा उपाध्याय ने भी हर मुश्किल दौर में उनका साथ निभाया। माता-पिता और बड़े भाई का समर्थन भी उनके लिए बड़ी ताकत बना।

अब करोड़ों का सालाना टर्नओवर

आज अमित उपाध्याय न सिर्फ एक सफल उद्यमी हैं, बल्कि समाज को कुछ लौटाने की भावना भी रखते हैं। उनका मानना है कि समाज से जो मिलता है, उसका दोगुना समाज को वापस देना चाहिए। फिलहाल उनका कारोबार 5 से 7 करोड़ रुपये के वार्षिक टर्नओवर तक पहुंच चुका है। उनकी कंपनी से सीधे तौर पर 50 से 100 लोगों को रोजगार मिल रहा है, जबकि उनके वेंडर्स और सप्लायर्स को भी काम के अवसर मिल रहे हैं।

युवाओं के लिए संदेश

युवाओं को संदेश देते हुए अमित कहते हैं कि किसी भी व्यवसाय में पहले दिन से ही मुनाफे की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। कारोबार को खड़ा करने, उसकी बारीकियों को समझने और बाजार में पहचान बनाने में समय लगता है। उनके मुताबिक धैर्य, मेहनत और लगातार सीखते रहने की इच्छा ही सफलता की असली कुंजी है।

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