खरीफ सीजन की दस्तक के साथ ही खेतों में नई हलचल देखने को मिल रही है। अब किसान धान की पारंपरिक रोपाई की झंझट से किनारा कर सीधी बुवाई यानी डीएसआर (डायरेक्ट सीडेड राइस) तकनीक की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। पानी की बचत, कम लागत और मजदूरी पर होने वाले खर्च में कमी ने इस तकनीक को किसानों के बीच खासा लोकप्रिय बना दिया है।
बीज उपचार क्यों है जरूरी
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि डीएसआर तकनीक से बेहतर पैदावार लेने के लिए बुवाई से पहले बीज का उपचार करना बेहद आवश्यक है। ठीक तरह से उपचारित बीज फसल को शुरुआती दौर में लगने वाले रोगों और कीटों से बचाते हैं और पौधों के स्वस्थ विकास में अहम भूमिका निभाते हैं।
सीधी के कृषि विशेषज्ञ अवनीश पटेल बताते हैं कि सीधी बुवाई के समय बीज उपचार को किसी भी हाल में अनदेखा नहीं करना चाहिए। बुवाई से पहले बीजों को फफूंदनाशी दवा से उपचारित करने पर फसल को शुरुआती अवस्था में हानिकारक कीटों और फंगस से सुरक्षा मिलती है। इससे बीजों का जमाव बेहतर होता है और पौधे शुरुआत से ही मजबूत बनते हैं।
एक एकड़ में कितने बीज की जरूरत
अवनीश पटेल के अनुसार, धान की बारीक और बासमती किस्मों की खेती के लिए प्रति एकड़ 7 से 10 किलोग्राम बीज पर्याप्त रहता है। वहीं सामान्य या मोटे धान की किस्मों के लिए प्रति एकड़ 15 से 20 किलोग्राम बीज का उपयोग करना चाहिए। सही बीज दर अपनाने से खेत में पौधों की संख्या संतुलित बनी रहती है और इसका सीधा सकारात्मक असर उत्पादन पर पड़ता है।
आसान है बीज उपचार की प्रक्रिया
बीज उपचार करना बेहद सरल है। इसके लिए बीजों को किसी साफ फर्श, त्रिपाल या प्लास्टिक शीट पर फैलाकर उन पर हल्का पानी छिड़कें। इसके बाद प्रति किलोग्राम बीज में एक से डेढ़ ग्राम कार्बेंडाजिम मिलाकर अच्छी तरह उपचारित करें। यह दवा सभी बीजों पर एक समान रूप से लगे, इसके लिए जूट के बोरे, मटके या सीड ट्रीटमेंट ड्रम का इस्तेमाल किया जा सकता है।
बीज उपचार के फायदे
अवनीश पटेल के मुताबिक, बीज उपचार से बीज और मिट्टी में मौजूद कई तरह के हानिकारक फंगस और पैथोजन नष्ट हो जाते हैं। ये सूक्ष्म जीव अक्सर बीज के अंकुरण और पौधों की शुरुआती बढ़वार को प्रभावित करते हैं। उपचारित बीज तेजी से अंकुरित होते हैं और फसल की प्रारंभिक वृद्धि बेहतर रहती है।
किसानों के लिए वरदान बनी डीएसआर तकनीक
कृषि वैज्ञानिक डॉ. शैलेंद्र गौतम का कहना है कि डीएसआर तकनीक किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। इस विधि में न तो नर्सरी तैयार करनी पड़ती है और न ही रोपाई कराने की जरूरत होती है, जिससे मजदूरी और दूसरे खर्चों में बड़ी बचत होती है।
कम पानी की उपलब्धता वाले इलाकों में यह तकनीक जल संरक्षण का प्रभावी माध्यम भी साबित हो रही है। कम लागत और अधिक मुनाफे के चलते धान की सीधी बुवाई अब किसानों की पहली पसंद बनती जा रही है।
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