बांग्लादेश के रंगपुर डिवीजन के अंतर्गत आने वाले गाइबांधा जिले के पलाशबाड़ी में स्थित एक प्रमुख सनातन धार्मिक परिसर को ध्वस्त करने की मांग कट्टरपंथी ताकतों की ओर से लगातार उठाई जा रही है। इसी परिसर में बांग्लादेश की सबसे ऊंची भगवान कृष्ण की प्रतिमा स्थापित है। करीब 50 फीट ऊंची इस काली प्रतिमा का उद्घाटन 25 नवंबर 2025 को राजशाही में भारत के सहायक उच्चायुक्त मनोज कुमार ने किया था। इस स्थल पर भगवान श्रीराम के साथ-साथ भगवान शिव की भी विशाल प्रतिमाएं तैयार की जा रही हैं।
लोकतांत्रिक वापसी के बाद उलटे संकेत
12 फरवरी को हुए आम चुनावों के बाद बांग्लादेश में लोकतांत्रिक शासन की वापसी को स्थिरता और संवैधानिक व्यवस्था की एक नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा था। खासकर धार्मिक अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय को भरोसा था कि मुहम्मद यूनुस के विवादित शासन के समाप्त होते ही असुरक्षा और सांप्रदायिक भय का दौर थम जाएगा। लेकिन ताजा घटनाक्रम इसके बिलकुल विपरीत इशारा कर रहे हैं। कट्टरपंथी ताकतें एक बार फिर धार्मिक भावनाओं और सांप्रदायिक विभाजन को हथियार बनाकर देश में अस्थिरता फैलाने का प्रयास कर रही हैं।
इस सांप्रदायिक उन्माद का सबसे चिंताजनक उदाहरण गाइबांधा जिले के पलाशबाड़ी स्थित इसी प्रमुख सनातन धार्मिक परिसर को गिराने की बढ़ती मांग है, जहां भगवान श्रीराम के अलावा भगवान श्रीकृष्ण और भगवान शिव की विशाल प्रतिमाएं बन रही हैं। जो मामला शुरुआत में एक स्थानीय विवाद जैसा प्रतीत हो रहा था, वह अब पूरे बांग्लादेश में हिंदू धार्मिक स्थलों और प्रतीकों को निशाना बनाने वाले एक बड़े अभियान का रूप ले रहा है। चिंताजनक बात यह है कि तारिक रहमान के नेतृत्व वाली सरकार इस पूरे घटनाक्रम पर मूकदर्शक बनी हुई है।
एक स्थानीय पहल से बना तीर्थ स्थल
होसैनपुर यूनियन के रामचंद्रपुर गांव में स्थित यह धार्मिक परिसर अब बांग्लादेश के सबसे महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थों और सांस्कृतिक केंद्रों में गिना जाने लगा है। स्थानीय समाजसेवी हरिदास बाबू की पहल से शुरू हुई यह परियोजना समय के साथ एक विशाल धार्मिक एवं स्थापत्य परिसर में बदल गई है, जहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं।
इस परिसर की सबसे खास पहचान बांग्लादेश की सबसे ऊंची भगवान कृष्ण की प्रतिमा है। करीब 50 फीट ऊंची इस काली प्रतिमा का उद्घाटन 25 नवंबर 2025 को राजशाही में भारत के सहायक उच्चायुक्त मनोज कुमार ने किया था। उद्घाटन के बाद से यह स्थान देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं और सैलानियों को आकर्षित कर रहा है। मंदिर समिति की दीर्घकालिक योजना में भगवान राम और भगवान शिव समेत विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं की कुल 144 प्रतिमाओं का निर्माण, धार्मिक संरचनाएं और कलात्मक स्थापत्य विकसित करना शामिल है। समर्थक इसे बांग्लादेश की धार्मिक विविधता और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक मानते हैं, वहीं कट्टरपंथी समूह इसे अपना राजनीतिक निशाना बना रहे हैं।
ऑनलाइन अभियान से राजनीतिक आंदोलन तक
विवाद उस समय और गहरा गया जब शाहिफ उस्मान हादी की हत्या को लेकर ममता बनर्जी के दावों के बाद कुछ पाकिस्तान समर्थक और तुर्की समर्थक ऑनलाइन कार्यकर्ताओं ने एक संगठित अभियान छेड़ दिया। उन्होंने गाइबांधा के इस धार्मिक परिसर को भारत के प्रभाव के विस्तार के रूप में पेश करने की कोशिश की। बिना किसी विश्वसनीय सबूत के उन्होंने परियोजना की देखरेख करने वाले हरिचंद्र तरोनी दास पर भारतीय खुफिया एजेंसियों से जुड़े होने का आरोप लगाया और दावा किया कि इस परियोजना को भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी रॉ (R&AW) वित्तपोषित कर रही है।
बांग्लादेश के प्रतिष्ठित डिजिटल न्यूज़ पोर्टल BLITZ के संपादक शोएब चौधरी ने इस मामले की गंभीरता पर चिंता जताते हुए बताया कि स्थिति तब और बिगड़ गई जब हेफाजत-ए-इस्लाम से जुड़े प्रभावशाली नेता केफायतुल्लाह अज़हरी और मौलाना ममूनुल हक भी इस परिसर के खिलाफ चल रहे अभियान में कूद पड़े। इन दोनों नेताओं के शामिल होने से ऑनलाइन अभियान अब एक बड़े राजनीतिक और वैचारिक आंदोलन का स्वरूप ले चुका है। पर्यवेक्षकों का मानना है कि कट्टरपंथी संगठन जानबूझकर धार्मिक समुदायों के बीच टकराव का माहौल पैदा कर सामाजिक सौहार्द को क्षति पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।
विवादित नेताओं की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि केफायतुल्लाह अज़हरी को इससे पहले मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड से कथित संबंधों के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि मौलाना ममूनुल हक के हमास से करीबी रिश्ते बताए जाते हैं। शोएब चौधरी ने यह भी बताया कि शेख हसीना के शासनकाल में अज़हरी को गिरफ्तार करने की तैयारी की गई थी।
आरोप है कि उन्होंने पाकिस्तान और तुर्की समेत विभिन्न स्रोतों से 132 करोड़ बांग्लादेशी टका जुटाकर बांग्लादेश के दर्जनों मदरसों के आधुनिकीकरण और उन्हें जिहादी भर्ती तथा प्रशिक्षण केंद्रों में तब्दील करने की योजना बनाई थी। बताया जाता है कि यह पूरी रकम अवैध हवाला माध्यमों से लाई गई थी, जिसके चलते कई खुफिया एजेंसियों को संदेह हुआ। हालांकि आरोप है कि बांग्लादेश की राष्ट्रीय सुरक्षा खुफिया (NSI) के महानिदेशक मेजर जनरल टीएम जुबायर और उनके एक करीबी सहयोगी ने अज़हरी की गिरफ्तारी रुकवा दी। यह भी कहा जाता है कि जनरल जुबायर ने इसके बदले मोटी रिश्वत ली थी।
संवैधानिक मूल्यों पर सवाल
ऐसे अभियानों का उभरना इसलिए भी चिंता बढ़ाता है क्योंकि बांग्लादेश की स्थापना समावेशिता, सांस्कृतिक विविधता और समान नागरिकता के सिद्धांतों पर हुई थी। देश का संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता और सुरक्षा की गारंटी देता है। किसी भी धार्मिक समूह या उसके पूजा स्थलों को केवल उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाना इन बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है।
यह मसला सिर्फ हिंदू समुदाय तक सीमित नहीं है। किसी भी धार्मिक पहचान के आधार पर पूजा स्थलों को गिराने की मांग करने वाला आंदोलन समूचे समाज और नागरिक व्यवस्था के लिए खतरा है। यदि एक समुदाय के विरुद्ध असहिष्णुता को सामान्य मान लिया जाए, तो भविष्य में कोई भी समुदाय इससे सुरक्षित नहीं रह पाएगा।
सरकार के सामने बड़ी परीक्षा
बांग्लादेश सरकार के सामने अब एक अहम परीक्षा है। अधिकारियों को सभी नागरिकों और धार्मिक संस्थानों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी तथा हिंसा और सांप्रदायिक नफरत फैलाने की कोशिशों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी होगी। कानून प्रवर्तन एजेंसियों को चरमपंथी गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए, धार्मिक स्थलों के खिलाफ दी जा रही धमकियों की जांच करनी चाहिए और हिंसा भड़काने वालों के खिलाफ कानूनी कदम उठाने चाहिए।
नागरिक समाज, धार्मिक नेताओं और राजनीतिक दलों की भी इसमें अहम भूमिका है। नफरत फैलाने वाले अभियानों की स्पष्ट और बिना किसी शर्त के निंदा होनी चाहिए। इसीलिए पलाशबाड़ी धार्मिक परिसर के विरुद्ध चल रहे अभियान को महज एक मंदिर विवाद के रूप में नहीं, बल्कि बांग्लादेश की सामाजिक एकता और लोकतांत्रिक भविष्य के लिए एक व्यापक चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए।
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