छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग के सबसे बड़े और अहम राजमाता देवेंद्र कुमारी सिंहदेव मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल भवन के निर्माण में हो रही भारी देरी ने प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना का काम शुरू हुए करीब 4 साल बीत चुके हैं, फिर भी भवन आज तक अधूरा पड़ा है। इसी सुस्ती को लेकर मौजूदा भाजपा सरकार के वित्त मंत्री ओपी चौधरी और पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के पूर्व डिप्टी सीएम व स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव आमने-सामने आ गए हैं। दोनों नेता इस नाकामी के लिए एक-दूसरे की कार्यप्रणाली को सीधे जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
ओपी चौधरी का 'जय-वीरू' वाला तंज
विवाद की शुरुआत वित्त मंत्री ओपी चौधरी के अंबिकापुर दौरे के दौरान दिए गए बयान से हुई। उन्होंने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि उस दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के बीच मतभेद चरम पर थे। चौधरी ने 'जय-वीरू' की जोड़ी का हवाला देते हुए दावा किया कि इन दोनों नेताओं के आपसी झगड़े के कारण ही यह अहम मेडिकल कॉलेज अस्पताल समय पर तैयार नहीं हो सका।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भाजपा सरकार ने इस स्वास्थ्य परियोजना को हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता दी है और इसके लिए 100 करोड़ रुपये से अधिक की राशि मंजूर की है।
टीएस सिंहदेव का पलटवार
वित्त मंत्री के इस सीधे हमले का जवाब देने में पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने भी देर नहीं लगाई। उन्होंने मौजूदा भाजपा सरकार पर आरोप लगाया कि वह अपनी प्रशासनिक नाकामी और सुस्ती छिपाने के लिए लगातार कांग्रेस को दोष दे रही है। सिंहदेव ने तीखा सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य में वर्तमान सरकार को सत्ता में आए काफी समय बीत चुका है, इसके बावजूद वह अब तक इस परियोजना की टेंडर प्रक्रिया तक पूरी नहीं करा पाई है।
उन्होंने याद दिलाया कि सरगुजा संभाग का यह मेडिकल कॉलेज और अस्पताल मूल रूप से कांग्रेस शासनकाल की ही देन है और कॉलेज में पीजी कोर्स की शुरुआत भी उसी दौर में हुई थी।
छात्रों और जनता पर पड़ रही मार
इस राजनीतिक खींचतान का सबसे बड़ा खामियाजा स्थानीय जनता और वहां पढ़ रहे मेडिकल छात्रों को उठाना पड़ रहा है। अस्पताल भवन का निर्माण समय पर पूरा न होने का सीधा और नकारात्मक असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के निर्धारित मानकों के अनुरूप पर्याप्त आधुनिक सुविधाएं और बुनियादी ढांचा उपलब्ध न होने के कारण इस मेडिकल कॉलेज को अब तक दो बार 'जीरो ईयर' घोषित किया जा चुका है। नियमों के तहत जरूरी सुविधाएं न होने से कॉलेज की मान्यता और साख पर लगातार गंभीर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
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