जिस जगह को आमतौर पर लोग डर, सन्नाटे और अंतिम विदाई से जोड़कर देखते हैं और जहां कुछ पल ठहरने से भी कतराते हैं, उसी श्मशान घाट से दो बेटियों ने अपने सुनहरे भविष्य की कहानी गढ़ दी है। मुजफ्फरपुर के सिकंदरपुर मुक्तिधाम परिसर में संचालित अप्पन पाठशाला की छात्राएं माहिरा और संध्या ने 16वीं राज्य स्तरीय वुशू चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए अपनी जगह पक्की कर ली है।
दोनों बच्चियां स्लम बस्ती से आती हैं और वर्षों से श्मशान घाट परिसर में चलने वाली इसी पाठशाला में पढ़ रही हैं। आर्थिक तंगी और कठिन हालात के बीच इन बेटियों ने शिक्षा और खेल के सहारे अपने सपनों को आकार दिया। अब उनकी यह कामयाबी पूरे जिले के लिए मिसाल बन गई है।
श्मशान घाट में चलती है पाठशाला
11 वर्षीय माहिरा के पिता सब्जी बेचते हैं और मां मजदूरी करती हैं। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद माहिरा पिछले पांच वर्षों से श्मशान घाट परिसर में संचालित अप्पन पाठशाला में पढ़ाई कर रही है। करीब डेढ़ साल पहले उसने वुशू खेल का प्रशिक्षण शुरू किया और रोजाना नियमित अभ्यास के बल पर राज्य स्तर पर स्वर्ण पदक हासिल कर लिया। माहिरा का कहना है कि उसने कभी अपनी परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
देश के लिए पदक जीतने का सपना
वहीं 12 वर्षीय संध्या अंबेडकर नगर स्लम बस्ती की रहने वाली है। उनके पिता पलदारी का काम करते हैं और मां घरों में चौका-बर्तन का काम करती हैं। संध्या भी पिछले पांच वर्षों से इसी पाठशाला में शिक्षा प्राप्त कर रही है। पढ़ाई के साथ-साथ खेल में भी उसने कड़ी मेहनत की और राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल अपने नाम किया। अब उसका सपना है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए स्वर्ण पदक जीते।
इनकी रही अहम भूमिका
दोनों बच्चियों की इस सफलता के पीछे अप्पन पाठशाला के संस्थापक सुमित कुमार और प्रशिक्षक सुनील कुमार, अजीत कुमार सिंह तथा खेलो इंडिया के प्रशिक्षक करण कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रशिक्षकों का कहना है कि सीमित संसाधनों के बावजूद दोनों खिलाड़ियों ने असाधारण प्रतिभा और अनुशासन का परिचय दिया है।
पूरे जिले के लिए प्रेरणा
श्मशान घाट में पढ़ाई करने वाली इन बेटियों की कहानी यह साबित करती है कि सफलता के लिए आलीशान स्कूल या महंगे संसाधनों की नहीं, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति और सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है। आज माहिरा और संध्या न केवल अपनी बस्ती, बल्कि पूरे मुजफ्फरपुर के बच्चों के लिए उम्मीद की मिसाल बन चुकी हैं।
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