कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी कठिनाई रास्ता नहीं रोक सकती। बालाघाट के लांजी तहसील के भीमोड़ी गांव के रहने वाले कार्तिक बंबूरे ने इसी बात को सच कर दिखाया। शारीरिक रूप से दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और जिला प्रशासन की एक पहल ने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी।
लाल आतंक के साये से रोजगार की राह तक
जिस जिले में करीब 35 सालों तक नक्सलवाद का खौफ बना रहा, आज वहीं रोजगार के नए अवसर खड़े हो रहे हैं। जिन इलाकों में कभी माओवादी युवाओं को सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए पर्चे बांटा करते थे, अब उन्हीं क्षेत्रों के नौजवानों को जिला प्रशासन की मदद से नौकरियां मिल रही हैं।
दरअसल, बालाघाट कलेक्टर ने बीते साल जिले में निजी कंपनियों को आमंत्रित कर युवाओं के लिए रोजगार मेलों का आयोजन कराया था। उस दौरान सैकड़ों युवाओं को मल्टीनेशनल कंपनियों में रोजगार मिला। अब आदिवासी अंचल के नौजवान अपनी जिंदगी संवार रहे हैं और कार्तिक की कहानी इसी बदलाव की एक मिसाल है।
किसान का बेटा, एक पैर से दिव्यांग
कार्तिक एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता खेती-किसानी करते हैं और मां गृहिणी हैं। बचपन से ही उनकी पढ़ाई में गहरी रुचि रही और जीवन में कुछ कर गुजरने की चाहत भी थी। उनके भीतर बेहतर काम करने का जज्बा और परिवार के लिए कुछ करने की प्रबल इच्छाशक्ति मौजूद थी, लेकिन मंजिल तक पहुंचने की राह नहीं मिल पा रही थी। बालाघाट जिला प्रशासन की पहल से उन्हें वह मौका मिला, जिसने उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया।
रोजगार मेले से चमकी किस्मत
कार्तिक ने अपनी शुरुआती पढ़ाई गांव में ही की। लांजी के एक कंप्यूटर एजुकेशन इंस्टीट्यूट से उन्हें जानकारी मिली कि जिला प्रशासन रोजगार मेले आयोजित कर रहा है। कार्तिक ने इस मौके का भरपूर फायदा उठाया और नौकरी के लिए आवेदन कर दिया।
नतीजा यह हुआ कि उन्हें अहमदाबाद स्थित एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई। आज वे हर महीने लगभग 40 हजार रुपए की कमाई कर रहे हैं। कार्तिक बताते हैं कि अगर उन्हें रोजगार मेले की जानकारी न मिली होती, तो शायद यह अवसर कभी हाथ नहीं लगता। आज वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं और अपने परिवार की भी मदद कर रहे हैं।
उनकी यह सफलता साबित करती है कि सही समय पर मिला अवसर और सही मार्गदर्शन किसी भी व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
कलेक्टर ने की कार्तिक की सराहना
बालाघाट कलेक्टर मृणाल मीना ने बातचीत में कार्तिक की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि कार्तिक बेहद मेहनती है और उसकी लगन के कारण ही उसकी जिंदगी बेहतर हुई है। आज वह अपने माता-पिता का सहारा बन रहा है।
हजारों युवाओं को मिल रहा रोजगार
प्रशासन बेरोजगार युवाओं की डिजिटल रजिस्ट्री तैयार कर रहा है। बीते साल से एक गूगल शीट के जरिए युवाओं का डेटा जुटाया जा रहा है और उनकी योग्यता के अनुसार एक ब्लूप्रिंट बनाया जा रहा है। इसके आधार पर ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स समेत अन्य कंपनियों को सीधे बालाघाट बुलाकर युवाओं को रोजगार दिया जा रहा है।
इन अवसरों के जरिए युवाओं को 15 हजार रुपए से लेकर 25 हजार रुपए तक मासिक वेतन वाली नौकरियां दिलाई जा रही हैं। डेटा शीट में मौजूद उम्मीदवार की प्रोफाइल और योग्यता के अनुसार ही संबंधित कंपनी को आमंत्रित किया जाता है।
महीने में दो बार रोजगार मेला आयोजित होता है, जहां देश की प्रतिष्ठित कंपनियां और आवेदक दोनों पहुंचते हैं। कंपनी की जरूरत और उम्मीदवार की योग्यता के मिलान के आधार पर युवाओं को नौकरी मिलती है। बीते साल जहां 2500 बच्चों को रोजगार दिया गया था, वहीं इस साल करीब 4000 बच्चों को नौकरी मिली है। इस तरह अब तक 6000 से ज्यादा बच्चों को रोजगार दिलाया जा चुका है।
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