20 सांसदों ने एक-एक कर छोड़ा ममता का साथ, फिर भी डटे रहे ये दो 'बिहारी बाबू'

तृणमूल कांग्रेस में मचे बिखराव और करीब 20 सांसदों के अलग गुट बनाने के बीच बिहार के दो दिग्गज नेता शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति झा आजाद ममता बनर्जी के साथ चट्टान की तरह खड़े हैं।

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय बड़े उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर मचे बिखराव ने पार्टी के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। सत्ता गंवाने के बाद ममता बनर्जी शायद ही कभी अपने राजनीतिक सफर में इतनी कठिन घड़ी से रूबरू हुई हों। जिन नेताओं को अच्छे दिनों में दीदी ने आगे बढ़ाया और बड़े ओहदे दिए, उनमें से अधिकांश आज पार्टी के संकटकाल में या तो पाला बदल चुके हैं या साथ छोड़ चुके हैं।

हालात इस हद तक बिगड़े हैं कि संसद के दोनों सदनों को मिलाकर टीएमसी के करीब 20 सांसदों ने बगावत का बिगुल फूंकते हुए अलग गुट बनाकर बैठने तक का मन बना लिया है। लेकिन इस मुश्किल दौर में भी दो बिहारी सांसद ममता के साथ अडिग बने हुए हैं। शॉटगन के नाम से मशहूर शत्रुघ्न सिन्हा और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति झा आजाद आज भी पूरी मजबूती के साथ ममता बनर्जी के पीछे खड़े हैं। जहां बंगाल के अपने नेता दीदी को अकेला छोड़ रहे हैं, वहीं इन दोनों ने साबित कर दिया है कि वे केवल सत्ता-सुख के साथी नहीं, बल्कि संकट के सबसे कठिन वक्त में भी वफादार सिपाही हैं।

कब हुई थी दोनों दिग्गजों की टीएमसी में एंट्री

शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति झा आजाद, दोनों ही कभी भारतीय जनता पार्टी के पुराने और दमदार चेहरे रहे हैं। बाद में दोनों ने कांग्रेस का रास्ता अपनाया और फिर ममता बनर्जी के नेतृत्व पर भरोसा जताते हुए तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए।

कीर्ति झा आजाद नवंबर 2021 में टीएमसी से जुड़े थे। उन्होंने ममता बनर्जी की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की और दीदी ने उन्हें तुरंत राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का बड़ा चेहरा बना दिया। फिलहाल आजाद पश्चिम बंगाल के बर्दवान-दुर्गापुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं।

वहीं शत्रुघ्न सिन्हा की टीएमसी में एंट्री मार्च 2022 में हुई। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री 'बिहारी बाबू' शत्रुघ्न सिन्हा को ममता बनर्जी ने साल 2022 के उपचुनाव में आसनसोल लोकसभा सीट से उतारकर बंगाल की राजनीति में स्थापित किया। इसके बाद साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने जीत दर्ज की।

दोनों को मिला सिर-आंखों पर स्थान

ममता बनर्जी ने इन दोनों गैर-बंगाली नेताओं को पार्टी के भीतर जो सम्मान और राजनीतिक तरजीह दी, उसकी मिसाल बंगाल की राजनीति में कम ही देखने को मिलती है। उन्होंने न सिर्फ इन्हें चुनावी मैदान में उतारा, बल्कि बंगाली अस्मिता की राजनीति के दौर में इन्हें 'बाहरी' होने के तमगे से भी बचाया।

शत्रुघ्न सिन्हा को आसनसोल जैसी बड़ी और हिंदी भाषी बहुल सीट से टिकट मिला, जहां उन्होंने रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की। दूसरी ओर कीर्ति झा आजाद को पार्टी के भीतर राष्ट्रीय प्रवक्ता और थिंक टैंक के रूप में अहम जिम्मेदारी सौंपी गई।

क्यों 'चट्टान' बने शत्रुघ्न और कीर्ति

मौजूदा दौर में जब संसद में टीएमसी के 20 सांसदों के बागी तेवर अपनाने और अलग बैठने की चर्चाएं जोरों पर हैं, तब भी इन दोनों नेताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी हालत में ममता बनर्जी के साथ विश्वासघात नहीं करेंगे।

बिहार के एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक, राजनीति में वफादारी की असली कीमत तभी समझ आती है जब नाव डूब रही हो। बंगाल के स्थानीय नेता और सांसद भले ही अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने के लिए बागी गुट या सत्तापक्ष के दरवाजे खटखटा रहे हों, लेकिन बिहार के इन दोनों नेताओं ने साफ कर दिया है कि वे ममता बनर्जी के नेतृत्व के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं और बगावत का हिस्सा नहीं बनेंगे। यह कदम दिखाता है कि इनके लिए नैतिक मूल्य, दीदी का पुराना सम्मान और बिहारी होने का गर्व तात्कालिक राजनीतिक लाभ से कहीं ऊपर है।

अपनों की बगावत और दिल्ली में 'इंडिया' गठबंधन के दबाव के बीच, बिहार के इन दो कद्दावर नेताओं की अडिग वफादारी ममता बनर्जी के लिए इस डूबते दौर में संजीवनी से कम नहीं है। यह तय है कि आने वाले दिनों में जब टीएमसी को नए सिरे से खुद को खड़ा करना होगा, तब ये दोनों 'बिहारी बाबू' ममता बनर्जी के राष्ट्रीय अभियान के सबसे मजबूत और भरोसेमंद स्तंभ साबित होंगे।

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