जिस पार्टी को ममता बनर्जी ने अपने बूते खड़ा किया था, उसी के भीतर अब असंतोष की चिंगारी खुलकर सामने आ चुकी है। इस बगावत की अगुवाई कर रही हैं काकोली घोष दस्तीदार—वही नेता जिन्हें कभी ममता की सबसे करीबी और भरोसेमंद सहयोगियों में गिना जाता था। अब उन्हीं काकोली ने ममता की नाक के नीचे से तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों को अपने साथ कर लिया है। उनके नेतृत्व में पार्टी के करीब 20 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र सौंपकर एनडीए में शामिल होने की इच्छा जाहिर की है।
ममता से चार दशक पुराना नाता
दिलचस्प बात यह है कि काकोली घोष दस्तीदार राजनीति में अचानक उभरी कोई नेता नहीं हैं। ममता बनर्जी के साथ उनका रिश्ता करीब चार दशक पुराना है। दोनों ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत कांग्रेस की छात्र राजनीति से की थी। जिस दौर में ममता कोलकाता के जोगमाया देवी कॉलेज में छात्र राजनीति का चेहरा बन रही थीं, उसी समय काकोली घोष कोलकाता मेडिकल कॉलेज में सक्रिय थीं। समय के साथ दोनों के राजनीतिक रास्ते एक हो गए।
साल 1984 में जब ममता बनर्जी ने दिग्गज वामपंथी नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर राष्ट्रीय राजनीति में जोरदार दस्तक दी, तभी से काकोली भी उनके राजनीतिक सफर की अहम साथी बन गईं। यही कारण है कि मौजूदा बगावत को सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक पुराने रिश्ते के टूटने के रूप में भी देखा जा रहा है।
पेशे से डॉक्टर, पर सबसे मुखर आवाज
पेशे से चिकित्सक काकोली घोष दस्तीदार की गिनती तृणमूल कांग्रेस की सबसे वरिष्ठ महिला नेताओं में होती है। वह पार्टी की महिला इकाई ऑल इंडिया तृणमूल महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। संसद में स्वास्थ्य, महिलाओं और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर उनकी सक्रियता अक्सर चर्चा का विषय रही है।
चार बार सांसद चुनी गईं
बारासात लोकसभा सीट से उन्होंने लगातार चार बार जीत हासिल की। 2009, 2014, 2019 और 2024 के चुनावों में अपनी सीट बरकरार रखकर उन्होंने यह साबित किया कि वह सिर्फ संगठन की नेता नहीं, बल्कि जनता के बीच भी मजबूत पकड़ रखती हैं। पार्टी में उनका कद इतना बड़ा रहा कि उन्हें लोकसभा में टीएमसी संसदीय दल की उपनेता और बाद में चीफ व्हिप जैसी अहम जिम्मेदारियां सौंपी गईं।
कहां से बिगड़ी बात
लेकिन राजनीति में रिश्ते जितनी तेजी से बनते हैं, उतनी ही तेजी से बदल भी जाते हैं। बीते कुछ महीनों में तृणमूल कांग्रेस के भीतर शक्ति का संतुलन बदलता नजर आया। कल्याण बनर्जी और महुआ मोइत्रा से जुड़े विवादों के बाद काकोली को चीफ व्हिप बनाया गया था। उस समय यह माना गया कि ममता बनर्जी ने उन पर पूरा भरोसा जताया है।
हालांकि हाल के घटनाक्रम में कल्याण बनर्जी की दोबारा वापसी हुई और उन्हें फिर से चीफ व्हिप बना दिया गया। शताब्दी रॉय उपनेता के पद पर बनी रहीं और इस तरह काकोली के पास संसदीय ढांचे में कोई औपचारिक पद नहीं बचा। राजनीतिक हलकों में तभी से यह चर्चा तेज हो गई थी कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।
जब वायरल हुई फेसबुक पोस्ट
इसी बीच काकोली घोष दस्तीदार की एक फेसबुक पोस्ट खूब सुर्खियों में रही थी। उन्होंने लिखा था—1976 से जान-पहचान, 1984 से साथ चल रहे हैं। आज मुझे चार दशकों की वफादारी का इनाम मिला।
यह छोटा सा वाक्य था, मगर राजनीति में ऐसे ही वाक्य अक्सर बड़े संदेश दे जाते हैं। उस समय कई लोगों ने इसे उनकी नाराजगी का संकेत माना था। हालांकि तब किसी ने यह नहीं सोचा था कि कुछ ही दिनों में वही नाराजगी खुली बगावत में बदल जाएगी। अब जब 20 सांसदों के साथ एनडीए में जाने की बात सामने आई है, तो उस पोस्ट का मतलब और भी स्पष्ट दिखने लगा है।
जब आया नया मोड़
सोमवार को घटनाक्रम ने तब नया मोड़ लिया, जब काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र सौंपा। काकोली का दावा है कि कम से कम 20 सांसद इस फैसले के साथ खड़े हैं। उन्होंने कहा कि यह कोई व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि लंबे विचार-विमर्श और साथियों से चर्चा के बाद उठाया गया कदम है।
उनका कहना है कि जनता ने जो जनादेश दिया है, उसे देखते हुए उन्हें लगता है कि उनकी आगे की राजनीतिक यात्रा एनडीए के साथ होनी चाहिए। यह बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे साफ संकेत मिलता है कि यह सिर्फ संसदीय पद को लेकर नाराजगी भर नहीं, बल्कि राजनीतिक दिशा बदलने का फैसला भी हो सकता है।
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