कानपुर में सास-दामाद ने रचाई शादी, क्या कानूनी छूट की आड़ में दम तोड़ रही पारिवारिक मर्यादा?

कानपुर में सास और दामाद की कोर्ट मैरिज महज एक वायरल खबर नहीं, बल्कि हमारी पारिवारिक नींव पर एक बड़ा सवाल है। आइए समझें कि क्या निजी आजादी और कानूनी अधिकारों की आड़ में सामाजिक मूल्य खोखले होते जा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले से सामने आई एक घटना ने न केवल सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी है, बल्कि समाज की नैतिक और पारिवारिक बुनियाद को भी हिलाकर रख दिया है। कानपुर के अकबरपुर थाना क्षेत्र में एक दामाद अपनी सास के साथ घर से फरार हो गया और दोनों ने अदालत पहुंचकर शादी रचा ली। मामला यहीं नहीं थमा। शादी के बाद दोनों ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी साझा किया, जिसमें वे अपने इस नए रिश्ते को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते और लोगों से आशीर्वाद मांगते नजर आ रहे हैं।

यह सिर्फ कोई अनोखी खबर नहीं है, बल्कि आज के दौर की एक कड़वी सच्चाई है, जो हमें ठहरकर यह सोचने पर विवश करती है कि क्या आधुनिकता और निजी स्वतंत्रता के नाम पर हम एक खोखले समाज की ओर बढ़ रहे हैं? आखिर हमारे पारिवारिक मूल्य इस तरह क्यों दरक रहे हैं?

मनोवैज्ञानिक नजरिए से क्या कहता है यह मामला

मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से देखें तो कानपुर का यह प्रकरण रिश्तों में गहरे ‘इमोशनल दिवालियापन’ (Emotional Bankruptcy) को उजागर करता है। जब कोई व्यक्ति सामाजिक और पारिवारिक सीमाओं (Social Boundaries) को पार कर केवल अपनी निजी इच्छाओं को तरजीह देने लगता है, तब ऐसे अप्रत्याशित रिश्ते जन्म लेते हैं। अक्सर घर के किसी सदस्य द्वारा महसूस किया जाने वाला भावनात्मक खालीपन या रोजमर्रा की जिंदगी में धुंधली पड़ती मर्यादाएं इसकी प्रमुख वजह बनती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी अपने को गहरा आघात (Trauma) देकर शुरू होने वाले ऐसे रिश्तों में जैसे ही शुरुआती आकर्षण या सनक खत्म होती है, वैसे ही आपसी मतभेद और सामाजिक तिरस्कार हावी होने लगता है, जिससे इनका भविष्य असुरक्षित हो जाता है।

क्या कानून की ओट में तार-तार हो रही मर्यादा

भारतीय समाज में रिश्तों की एक बेहद पवित्र और स्पष्ट मर्यादा निर्धारित की गई है। सास और दामाद के रिश्ते को मां और बेटे के समान माना जाता है। लेकिन जब एक ही छत के नीचे रहते हुए इस रिश्ते की लक्ष्मण रेखा लांघ दी जाती है, तो यह एक गहरे मानसिक और सामाजिक संकट की ओर इशारा करता है।

कानूनी दृष्टि से देखा जाए तो दो बालिग (Adults) अपनी मर्जी से साथ रहने या विवाह करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं और कानून उन्हें इसकी अनुमति भी देता है। मगर असली सवाल यह है कि क्या इसी कानूनी छूट की आड़ में हम उन नैतिक मूल्यों की बलि चढ़ा देंगे, जो किसी परिवार को आपस में जोड़े रखते हैं? जब कोई व्यक्ति केवल अपनी निजी इच्छाओं की पूर्ति के लिए समाज और परिवार के प्रति अपने दायित्वों को भुला देता है, तब ‘परिवार’ नामक संस्था भीतर से खोखली होने लगती है।

डिजिटल कल्चर और लोकलाज का खत्म होता डर

इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कोर्ट मैरिज के बाद दोनों ने बिना किसी झिझक के सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर दिया। एक दौर वह भी था, जब लोग ऐसी अनैतिक भूलों के बाद समाज के डर से अपना मुंह छिपाते थे या ग्लानि महसूस करते थे। लेकिन आज के ‘रील और डिजिटल कल्चर’ ने लोगों को एक अजीब किस्म का दुस्साहस दे दिया है। हर विवाद और हर विचित्र फैसला अब ‘वायरल कंटेंट’ बनने की होड़ में शामिल हो चुका है। जब समाज से लोकलाज या शर्म का डर पूरी तरह समाप्त हो जाता है, तो रिश्तों का बिखराव और भी तेजी से बढ़ने लगता है।

पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं

कानपुर की यह घटना पहली बार नहीं हुई है। इससे पूर्व अलीगढ़ जिले में भी एक ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आ चुका है, जहां एक मां अपनी ही बेटी के होने वाले पति यानी दामाद के साथ शादी का कार्ड बंटने के बाद फरार हो गई थी। लेकिन उस कहानी का अंत क्या हुआ? शादी के महज एक साल बाद ही दोनों के बीच गंभीर विवाद शुरू हो गया और मामला सीधे पुलिस स्टेशन तक जा पहुंचा।

मनोविज्ञान भी यही कहता है कि जो रिश्ते किसी अपने को गहरा आघात (Trauma) देकर या सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह तोड़कर शुरू होते हैं, वे प्रायः लंबे समय तक नहीं टिक पाते। शुरुआती आकर्षण या सनक के समाप्त होते ही जब सामाजिक तिरस्कार और हकीकत सामने आती है, तो ये रिश्ते ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं।

आखिर क्यों खत्म हो रहे हैं मूल्य

यह घटना हम सभी के लिए एक कठोर रियलिटी चेक है। यदि हमने निजी आजादी, सोशल मीडिया की सनक और केवल कानून का हवाला देकर अपनी नैतिक सीमाओं को भुलाना जारी रखा, तो आने वाले समय में परिवार महज एक खोखला ढांचा बनकर रह जाएंगे। व्यक्तिगत स्वतंत्रता बेहद आवश्यक है, परंतु उसकी कीमत अपनों का भरोसा और सामाजिक मूल्य कतई नहीं होने चाहिए।

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