भारत पर मंडराता अल-नीनो का खतरा: इसकी खोज करने वाले IMD वैज्ञानिक कौन थे?

अल-नीनो का संकट भारत के 40 करोड़ लोगों पर मंडरा रहा है, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि इसकी बुनियादी खोज भारत मौसम विज्ञान विभाग के ब्रिटिश वैज्ञानिक सर गिल्बर्ट वॉकर ने ही की थी।

अल-नीनो आज एक ऐसा नाम बन चुका है जिससे पूरी दुनिया सतर्क रहती है। यही वह मौसमी परिघटना है जिसके कारण भारत में अकाल, सूखे और तबाही की आशंकाएं गहराने लगती हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिस संकट से दुनिया घबरा रही है, उसकी पहली पहचान भी भारत की धरती पर ही हुई थी। मॉनसून को आने से पहले ही सुखा देने वाली इस घटना के वायुमंडलीय पक्ष को सबसे पहले भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने खोजा था।

1920 के शुरुआती वर्षों में, जब ब्रिटिश गणितज्ञ सर गिल्बर्ट वॉकर आईएमडी में डायरेक्टर जनरल ऑफ ऑब्जर्वेटरीज के पद पर थे, उन्होंने इस परिघटना का पता लगाया। उस दौर में वे भारतीय मानसून का सटीक पूर्वानुमान तैयार करने में जुटे थे। अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि भारतीय मानसून अलग-थलग नहीं है, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों के मौसम से गहराई से जुड़ा हुआ है।

सी-सॉ व्यवहार से मिली दिशा

वॉकर ने दुनिया भर के पुराने मौसम संबंधी आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण किया। उन्होंने देखा कि प्रशांत महासागर के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में हवा का दबाव एक-दूसरे के विपरीत व्यवहार करता है। जब पूर्व में दबाव बढ़ता है तो पश्चिम में घट जाता है और जब पूर्व में घटता है तो पश्चिम में बढ़ जाता है। इस झूले जैसे (सी-सॉ) व्यवहार को ही उन्होंने सदर्न ऑसिलेशन (Southern Oscillation) नाम दिया, जिसे बाद में एल नीनो सदर्न ऑसिलेशन (ENSO) कहा गया।

यह वही अल-नीनो है जिसकी आहट से इस समय भारत में संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इसके प्रभाव से देश की धरती तपती भट्टी में बदल सकती है और मॉनसून की बारिश बेहद कम हो सकती है। आज भी मौसम विभाग इसी आधार पर मॉनसून और मौसम की भविष्यवाणी करता है।

कौन थे सर गिल्बर्ट थॉमस वॉकर?

सर गिल्बर्ट थॉमस वॉकर (1868-1958) एक ब्रिटिश गणितज्ञ और मौसम वैज्ञानिक थे। वे 1904 से 1924 तक, यानी करीब 20 वर्षों तक, भारत मौसम विज्ञान विभाग के डायरेक्टर जनरल ऑफ ऑब्जर्वेटरीज रहे। मौसम विज्ञान में औपचारिक प्रशिक्षण न होने के बावजूद उनकी गणितीय प्रतिभा को देखते हुए यह जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई थी।

भारत आने के बाद उनका मुख्य लक्ष्य भारतीय मानसून का सटीक पूर्वानुमान तैयार करना था। 1899-1900 के भयंकर अकाल के बाद सरकार मानसून की भविष्यवाणी को लेकर बेहद चिंतित थी। वॉकर ने पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ सांख्यिकीय (statistical) पद्धति को अपनाया। उन्होंने दुनिया भर के पुराने मौसम आंकड़ों का विश्लेषण किया और फिर ऐसी खोज की, जो आज भी मौसमी घटनाओं की गणना में सबसे अहम मानी जाती है।

एक से ज्यादा अहम खोजें

1920 के दशक में वॉकर ने सबसे महत्वपूर्ण सदर्न ऑसिलेशन की खोज की। उन्होंने पाया कि प्रशांत महासागर के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में हवा का दबाव परस्पर विपरीत, यानी सी-सॉ जैसा व्यवहार करता है। उन्होंने यह भी देखा कि यह ऑसिलेशन भारतीय मानसून को गहराई से प्रभावित करता है। आगे चलकर इसे एल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन (ENSO) कहा गया, जो आज भी मानसून पूर्वानुमान का आधार है।

इसके अलावा वॉकर ने नॉर्थ अटलांटिक ऑसिलेशन और नॉर्थ पैसिफिक ऑसिलेशन की भी पहचान की। उन्होंने रिग्रेशन समीकरणों के जरिए मानसून पूर्वानुमान के मॉडल विकसित किए। आईएमडी को वैज्ञानिक रूप से मजबूत बनाने के लिए उन्होंने जॉर्ज सिंपसन और चार्ल्स नॉर्मंड जैसे युवा वैज्ञानिकों को आगे बढ़ाया और संस्थान का आधुनिकीकरण किया। 1924 में भारत छोड़ने से पहले उन्हें नाइटहुड (Sir) की उपाधि से सम्मानित किया गया।

क्रांतिकारी साबित हुई यह खोज

वॉकर की यह खोज मौसम विज्ञान की दुनिया में क्रांतिकारी साबित हुई। बाद में वैज्ञानिक जेकब ब्जर्नेस ने इसे और आगे बढ़ाया तथा इसे "वॉकर सर्कुलेशन" का नाम दिया। एक रिपोर्ट के अनुसार, आज ENSO को भारतीय मानसून में साल-दर-साल होने वाले बदलाव का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। जब एल नीनो मजबूत होता है तो भारत में अक्सर कम बारिश होती है, जबकि ला नीना की स्थिति में अच्छी बारिश की संभावना बढ़ जाती है।

सर गिल्बर्ट वॉकर की 1920 के दशक की इस खोज ने यह साबित कर दिया कि भारतीय मानसून को समझने के लिए हमें पूरे विश्व के मौसम पैटर्न पर नजर डालनी होगी। आज आईएमडी आधुनिक उपग्रहों, सुपर कंप्यूटरों और ENSO डेटा का उपयोग करके पहले से कहीं बेहतर पूर्वानुमान दे रहा है।

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