पूरे देश में जब दिवाली का त्योहार दीयों की रोशनी और पटाखों की गूंज के साथ मनाया जाता है, तब तेलंगाना के आदिवासी क्षेत्रों में एक बिल्कुल अलग और अनूठी सांस्कृतिक झलक देखने को मिलती है। राज्य की राजधानी हैदराबाद से लगभग 300 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आदिलाबाद जिले के विभिन्न गांवों में दिवाली के अवसर पर दांडारी-गुस्साड़ी उत्सव का आयोजन किया जाता है। मुख्य रूप से मारलावाई, नारनूर और जैनूर जैसे गांवों में इस पर्व की खास रौनक रहती है, जहां गोंड, कोलम और आंध समुदाय के लोग मिलकर इस परंपरा को पूरे उत्साह से निभाते हैं।
गांव के पटेल तय करते हैं आयोजन और नर्तकों का चयन
यह पारंपरिक उत्सव लगभग 8 से 9 दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत किस दिन से होगी, इसका फैसला गांव का मुखिया यानी पटेल करता है। आमतौर पर यह पर्व दिवाली से ठीक पहले शुरू होता है और त्योहार बीतने के कुछ दिनों बाद तक जारी रहता है। आयोजन के दौरान पटेल ही गांव के दो से आठ युवकों का चयन करता है, जिन्हें गोंडी भाषा में 'गुस्साड़ी' कहा जाता है। चयन के बाद ये युवक ही पूरे उत्सव के मुख्य नर्तक की भूमिका निभाते हैं।
भगवान शिव के नटराज स्वरूप में प्रस्तुति और नृत्य की शैलियां
गुस्साड़ी के रूप में चुने गए युवक भगवान शिव के नटराज स्वरूप की तरह विशेष श्रृंगार करते हैं। उनके हाथों में एक पारंपरिक लकड़ी का डंडा होता है, जिसे शिव के त्रिशूल का प्रतीक माना जाता है। इस उत्सव के दौरान 40-50 लोगों की टोली एक गांव से दूसरे गांव का भ्रमण करती है और रात 10 बजे से सुबह 4 बजे तक ढोल-नगाड़ों की थाप पर जोरदार नृत्य प्रस्तुतियां देती है।
इस सांस्कृतिक उत्सव में मुख्य रूप से तीन प्रकार के नृत्य किए जाते हैं:
- मुख्य गुस्साड़ी नृत्य: जिसे चयनित गुस्साड़ी नर्तक प्रस्तुत करते हैं।
- पोलाक नृत्य: इस नृत्य में पुरुष महिलाओं के वस्त्र धारण करके गुस्साड़ी नर्तकों के साथ ताल मिलाते हैं।
- अद्यान नृत्य: यह नृत्य मुख्य रूप से समुदाय की महिलाओं द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।
इसके अलावा, अकेले मुख्य गुस्साड़ी नृत्य के भीतर ही पांच अलग-अलग शैलियां शामिल होती हैं, जो इसकी समृद्ध नृत्य शैली को दर्शाती हैं।
नृत्य उत्सव के बीच जीवनसाथी चुनने की अनूठी परंपरा
जब नर्तकों की टोली एक गांव से दूसरे गांव पहुंचती है, तो वहां की युवतियां और ग्रामीण बड़ी संख्या में इस नृत्य प्रदर्शन को देखने आते हैं। इस दौरान यदि किसी युवती को कोई नर्तक पसंद आ जाता है या फिर कोई युवक किसी युवती के प्रति अपनी रुचि दिखाता है, तो वे इसकी जानकारी अपने परिवार के बड़े-बुजुर्गों को देते हैं। इसके बाद दोनों परिवारों के बुजुर्ग आपस में बैठकर विवाह की बातचीत को आगे बढ़ाते हैं। हालांकि यह इस उत्सव का प्राथमिक उद्देश्य नहीं है, लेकिन यह युवाओं के लिए एक-दूसरे को पसंद करने का एक सहज और सम्मानजनक अवसर प्रदान करता है।
पहनावे का आधुनिक बदलाव और सख्त नियम
समय के साथ गुस्साड़ी नर्तकों के पहनावे में कुछ बदलाव भी आए हैं। पहले गुस्साड़ी नर्तक त्रिशूल के आकार की टोपी पहनते थे, लेकिन अब उसकी जगह मोरपंखों और छोटे शीशों से सजी गोल टोपी ने ले ली है। वन्यजीव संरक्षण नियमों के लागू होने के कारण अब हिरण की खाल की जगह बकरी की खाल का प्रयोग किया जाता है। इसके साथ ही आधुनिक समय में कुछ नर्तक चश्मे और रंग-बिरंगे लहंगे पहनकर भी अपनी प्रस्तुति देते हैं।
इन आधुनिक बदलावों के बावजूद परंपरा के कड़े नियमों का पूरी निष्ठा से पालन किया जाता है। उत्सव के सभी दिनों में गुस्साड़ी नर्तकों को नंगे पैर रहना होता है और वे रात में केवल जमीन पर ही सोते हैं।
2,500 साल पुराना इतिहास और सरकारी सहायता
इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार, इस अनूठी सांस्कृतिक परंपरा की जड़ें करीब 2,500 साल पुरानी हैं। इस प्राचीन उत्सव और परंपरा का उल्लेख कई ऐतिहासिक और प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में भी मिलता है।
इस प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने, संरक्षित करने और इसे बढ़ावा देने के लिए तेलंगाना सरकार ने विशेष कदम उठाए हैं। सरकार की ओर से 1.5 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया गया है। इस योजना के अंतर्गत क्षेत्र की लगभग 1,000 मंडलियों को 15-15 हजार रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है, ताकि यह ऐतिहासिक परंपरा आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहे।
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