खरगोन के प्राचीन मां बागेश्वरी मंदिर की अनूठी परंपरा
दीपावली पर्व के अवसर पर देशभर में देवी-देवताओं के विभिन्न पूजन और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के खरगोन में एक बेहद अनोखा आयोजन देखने को मिलता है। खरगोन शहर के मध्य स्थित प्रसिद्ध मां बागेश्वरी मंदिर में रूप चौदस की रात एक अद्भुत परंपरा का निर्वहन किया जाता है। सामान्यतः देवी-देवताओं का स्नान दिन के उजाले में संपन्न होता है, परंतु इस प्राचीन मंदिर में माता का शाही स्नान दिन में नहीं बल्कि रात के समय तारों की रोशनी में किया जाता है।
यह अनूठी परंपरा खरगोन के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को और अधिक समृद्ध करती है। धनतेरस से लेकर अमावस्या तक इस मंदिर में तीन दिवसीय दीपोत्सव का आयोजन बेहद धूमधाम से किया जाता है। इस दौरान मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रम निरंतर चलते रहते हैं, लेकिन रूप चौदस की मध्यरात्रि में आयोजित होने वाला देवी का शाही स्नान श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र रहता है। इस अलौकिक क्षण का साक्षी बनने और माता रानी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से सैकड़ों भक्त मंदिर पहुंचते हैं।
तारों की छांव में होता है देवी का दिव्य अभिषेक
रूप चौदस की रात निभाए जाने वाले इस शाही स्नान के नियम और परंपराएं बेहद कड़े और आध्यात्मिक हैं। इस अनुष्ठान को संपन्न कराने के लिए मंदिर के पुजारी और उनके परिवार के सदस्य अत्यंत पवित्रता का पालन करते हैं। रात के समय पूरा परिवार ठंडे पानी से स्नान करता है। इसके उपरांत, सभी सदस्य बिना वस्त्र सुखाए गीले कपड़ों में ही मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते हैं।
गर्भगृह में प्रवेश करने के पश्चात, तारों की धीमी रोशनी और दीपकों के प्रकाश के बीच माता की प्रतिमा पर सुगंधित लेप और अनेक प्रकार की दिव्य औषधियों से अभिषेक किया जाता है। अनुष्ठान के दौरान मंदिर में निरंतर दीपक प्रज्वलित रहते हैं, जिससे पूरा वातावरण एक अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है। स्नान की यह पूरी प्रक्रिया अत्यंत भक्तिभाव के साथ संपन्न की जाती है।
सूर्योदय से पूर्व भव्य श्रृंगार और महासरस्वती का स्वरूप
देवी का शाही स्नान संपन्न होने के बाद, सूर्योदय से पहले ही माता का अत्यंत भव्य और दिव्य श्रृंगार किया जाता है। जैसे ही सुबह सूर्य की पहली किरण धरती पर पड़ती है, मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिए जाते हैं। सुबह से लेकर देर रात तक भक्तों का तांता माता के इस मनमोहक स्वरूप के दर्शन के लिए लगा रहता है। ऐसी मान्यता है कि रूप चौदस के इस विशेष अवसर पर माता के इस दिव्य स्नान और श्रृंगार का दर्शन करने से श्रद्धालुओं को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
मंदिर के पुजारी पंडित जगदीश ठक्कर बताते हैं कि मंदिर में स्थापित माता की प्रतिमा अष्टभुजा धारी है। प्रायः कई श्रद्धालु प्रतिमा के हाथों में अस्त्र-शस्त्र देखकर उन्हें मां दुर्गा या मां काली का स्वरूप समझ लेते हैं। हालांकि, शास्त्रों और दुर्गा सप्तशती के विवरण के अनुसार, यह स्वरूप वास्तव में महासरस्वती का है। दुर्गा सप्तशती में महासरस्वती के जिस ध्यान, रूप और अस्त्र-शस्त्रों का वर्णन किया गया है, मंदिर की प्रतिमा पूर्णतः उसी शास्त्रोक्त विधान के अनुरूप है। इसी कारण इन्हें बागेश्वरी माता के नाम से भी श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है।
आटे के दीपकों का विशेष महत्व
इस दिव्य स्नान की तैयारियों के विषय में जानकारी देते हुए पुजारी बताते हैं कि रूप चौदस के दिन पूरे परिवार द्वारा विशेष रूप से आटे के दीपक तैयार किए जाते हैं। इन दीपकों को जलाकर मंदिर परिसर को आलोकित किया जाता है। दीपकों की पावन ज्योति के मध्य ही पुजारी और उनका परिवार ठंडे जल से स्नान करके गीले वस्त्रों में गर्भगृह में प्रवेश करता है। इसके पश्चात ही तारों की रोशनी और प्रज्वलित दीपों के साये में माता को सुगंधित लेप लगाकर जड़ी-बूटियों एवं दिव्य औषधियों से स्नान कराया जाता है।
श्रीयंत्र पूजन, गोद भराई और फुलेरा प्रसादी की परंपरा
दीपावली के इस पावन पर्व पर मां बागेश्वरी मंदिर में भगवती के पूजन के साथ-साथ अत्यंत प्राचीन श्रीयंत्र की भी विशेष उपासना की जाती है। मंदिर में सुबह और शाम दोनों समय श्रीयंत्र का पूरे विधि-विधान से अभिषेक एवं पूजन-अर्चन संपन्न होता है। जो श्रद्धालु अपने घर में स्थापना हेतु श्रीयंत्र प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें मंदिर प्रबंधन द्वारा श्रीयंत्र उपलब्ध भी कराया जाता है।
इसके अतिरिक्त, मंदिर में एक अन्य महत्वपूर्ण परंपरा भी निभाई जाती है। सूर्योदय के पश्चात मंदिर प्रांगण में महिलाओं की गोद भराई का विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। विशेष रूप से मंगलवार, शुक्रवार और शनिवार के दिन मंदिर में फुलेरा प्रसादी का वितरण किया जाता है। जो महिलाएं संतान प्राप्ति की मनोकामना लेकर मंदिर आती हैं, उन्हें माता की प्रतिमा के समक्ष बैठाकर यह फुलेरा प्रसादी ग्रहण कराई जाती है। श्रद्धालुओं का दृढ़ विश्वास है कि मां बागेश्वरी के दरबार से कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता।
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