मुख्य न्यायाधीश पर टिप्पणी को लेकर शीर्ष अदालत का कड़ा रुख
भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ सोशल मीडिया मंच पर आपत्तिजनक सामग्री साझा करने के मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सभी पदाधिकारियों को नोटिस जारी किया है। शीर्ष अदालत ने पदाधिकारियों से सीधा सवाल किया है कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना की प्रक्रिया क्यों नहीं शुरू की जानी चाहिए।
बिना शर्त माफी और सोशल मीडिया पोस्ट पर दी गई दलीलें
मामले की अदालती सुनवाई के दौरान केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी का पक्ष रख रहे अधिवक्ता ने सफाई दी कि संबंधित सोशल मीडिया पोस्ट पार्टी के पदाधिकारियों की मंजूरी के बिना ही इंटरनेट पर अपलोड कर दी गई थी। अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि विवाद बढ़ने के बाद उस पोस्ट को सोशल मीडिया से हटा लिया गया था और अगली तारीख पर बिना किसी शर्त के माफी भी मांग ली गई है।
इस तर्क पर जस्टिस अरविंद कुमार ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत यह जांच करेगी कि यह माफी वास्तव में दिल से मांगी गई है या फिर इसे महज एक कागजी औपचारिकता के तौर पर लिखा गया है।
उल्लेखनीय है कि केरल कांग्रेस ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपने आधिकारिक अकाउंट से सीजेआई सूर्यकांत का इस्तीफा मांगते हुए एक पोस्ट किया था, जिसे बाद में हटा लिया गया था। उस विवादित पोस्ट में लिखा गया था:
"डियर सूर्यकांत, अगर लॉ एवं ऑर्डर आपका डोमेन नहीं है तो रिजाइन करें। हम आपका रिप्लेसमेंट ढूंढेंगे जो हैंडल कर सकें।"
'संविधान सर्वोच्च है और न्यायपालिका की स्वतंत्रता सर्वोपरि'
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने अपने दिए गए आदेश में यह स्पष्ट किया कि किसी भी राजनीतिक संगठन के आधिकारिक अकाउंट से देश के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ऐसी बयानबाजी करना बेहद गंभीर विषय है। पीठ ने रेखांकित किया कि देश में संविधान सबसे ऊपर है और कोई भी नागरिक या राजनीतिक दल संविधान के दायरे से ऊपर नहीं हो सकता।
अदालत की मुख्य टिप्पणियां इस प्रकार रहीं:
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता: न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता किसी राजनीतिक सुविधा या पसंद का विषय नहीं है।
- अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा: अदालत के फैसलों की आलोचना करने का अधिकार सभी को है, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में न्याय व्यवस्था को डराने या उसके कामकाज में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
- अदालत की गरिमा: किसी व्यक्ति का पद चाहे कितना भी ऊंचा क्यों न हो, न्यायपालिका के अधिकार और सम्मान को चोट पहुंचाने के प्रयासों पर सख्त रुख अपनाना अनिवार्य है।
- कानून का शासन: अदालत का सम्मान किसी राजनीतिक संगठन की सहमति पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह कानून के शासन से स्थापित होता है।
पदाधिकारियों को व्यक्तिगत पेशी से मिली छूट
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए भी केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सभी पदाधिकारियों को राहत दी है। अदालत ने सभी संबंधित पदाधिकारियों को अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट प्रदान कर दी है। हालांकि अवमानना नोटिस का जवाब देना उनके लिए अनिवार्य रहेगा।
https://www.indiatv.in/india/national/supreme-court-to-office-bearers-of-kerala-congress-asked-why-contempt-of-court-proceedings-should-not-be-initiated-against-them-2026-11-06-1253163