संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस का वीटो, पश्चिमी सहारा में 35 साल पुराना UN मिशन हुआ समाप्त

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका के प्रस्ताव पर रूस द्वारा वीटो लगाए जाने के बाद पश्चिमी सहारा में शांति मिशन MINURSO का कार्यकाल आधिकारिक तौर पर समाप्त हो गया है। इस घटनाक्रम से मोरक्को और पोलिसारियो फ्रंट के बीच चल रहे दशकों पुराने विवाद के समाधान की कूटनीतिक कोशिशों को बड़ा झटका लगा है।

रूस के वीटो से सुरक्षा परिषद में गतिरोध

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के भीतर हाल ही में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की जटिलताओं को उजागर कर दिया है। रूस ने अमेरिका द्वारा लाए गए उस प्रस्ताव पर वीटो का प्रयोग किया, जिसका मुख्य उद्देश्य पश्चिमी सहारा में तैनात संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन, जिसे MINURSO के नाम से जाना जाता है, के कार्यकाल को आगे बढ़ाना था। इस प्रस्ताव को सुरक्षा परिषद के कुल 11 सदस्य देशों का समर्थन प्राप्त था, इसके बावजूद रूस के विरोध के चलते यह पारित नहीं हो सका। अमेरिका ने इसके जवाब में रूस के वैकल्पिक प्रस्ताव को भी स्वीकार नहीं किया, जिसके परिणामस्वरूप दोनों ही प्रस्ताव विफल रहे और 35 वर्षों से संचालित यह मिशन अब समाप्त हो गया है।

वीटो पावर की ताकत और सुरक्षा परिषद का गणित

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब 11 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था, तो केवल एक देश के विरोध से यह कैसे गिर गया? इसका उत्तर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की विशेष संरचना और वीटो की शक्ति में निहित है। सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं, जिनमें से अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस पांच स्थायी सदस्य हैं। इन पांचों देशों के पास विशेष वीटो अधिकार है। परिषद का कोई भी प्रस्ताव तब तक पारित नहीं हो सकता जब तक कि कम से कम 9 सदस्य उसका समर्थन न करें और किसी भी स्थायी सदस्य ने उसके खिलाफ वीटो न किया हो। यदि कोई एक भी स्थायी सदस्य वीटो का उपयोग कर देता है, तो भारी बहुमत होने के बावजूद प्रस्ताव रद्द हो जाता है। इस मामले में, रूस ने वीटो का उपयोग करके अमेरिकी योजना पर पूर्ण विराम लगा दिया।

अमेरिकी प्रस्ताव के पीछे का उद्देश्य और विवाद

पश्चिमी सहारा का विवाद दशकों पुराना है। 1975 में स्पेन के इस क्षेत्र से हटने के बाद, मोरक्को ने इसके एक बड़े हिस्से पर नियंत्रण कर लिया, जबकि पोलिसारियो फ्रंट ने एक स्वतंत्र देश की मांग करते हुए संघर्ष छेड़ दिया। इस संघर्ष में उन्हें पड़ोसी देश अल्जीरिया का समर्थन मिलता रहा है। 1991 में एक युद्धविराम समझौता हुआ और संयुक्त राष्ट्र ने शांति बनाए रखने के लिए MINURSO का गठन किया। इस मिशन का कार्य युद्धविराम की निगरानी करना और एक जनमत संग्रह सुनिश्चित करना था, ताकि वहां के लोग अपनी नियति स्वयं तय कर सकें। हालांकि, मतदाता सूची और अन्य तकनीकी कारणों से जनमत संग्रह कभी आयोजित नहीं हो सका।

वर्ष 2007 में, मोरक्को ने एक स्वायत्तता योजना का प्रस्ताव रखा, जिसमें पश्चिमी सहारा को मोरक्को की संप्रभुता के अधीन रहकर स्थानीय मामलों का प्रशासन चलाने का अधिकार देने की बात थी। अमेरिका ने अपने नए प्रस्ताव में इसी योजना को विवाद के समाधान का सबसे व्यावहारिक आधार माना था। प्रस्ताव में मिशन का नाम बदलकर 'संयुक्त राष्ट्र मिशन इन वेस्टर्न सहारा' करने और उसके राजनीतिक उद्देश्यों में बदलाव करने का सुझाव दिया गया था, जिससे रूस पूरी तरह असहमत था।

रूस का तर्क और कूटनीतिक मतभेद

रूस का मानना है कि अमेरिका द्वारा पेश किया गया प्रस्ताव किसी एक पक्ष की शर्तों को थोपने जैसा है। रूस ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि मोरक्को की योजना को समाधान का एकमात्र आधार मानना वहां के निवासियों के आत्मनिर्णय के अधिकार के साथ समझौता हो सकता है। रूस की नीति रही है कि इस विवाद का समाधान किसी पक्ष विशेष की शर्तों पर नहीं, बल्कि निष्पक्ष बातचीत से निकलना चाहिए।

दूसरी ओर, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों ने अमेरिकी प्रस्ताव का समर्थन करते हुए रूस पर कूटनीतिक प्रक्रिया को बाधित करने का गंभीर आरोप लगाया। ब्रिटेन ने इस निर्णय को सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता के लिए एक बड़ा झटका माना है। फ्रांस ने भी इसे मोरक्को की संप्रभुता के प्रति एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए रूस की मंशा पर सवाल उठाए हैं।

रूस का अपना प्रस्ताव और दोनों पक्षों की विफलता

रूस ने केवल अमेरिकी प्रस्ताव को वीटो ही नहीं किया, बल्कि उसने अपना एक अलग प्रस्ताव भी रखा। रूस चाहता था कि MINURSO को बिना किसी बड़े बदलाव या नई शर्तों के एक और वर्ष के लिए विस्तारित किया जाए। हालांकि, अमेरिका ने इस रूसी प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। इस प्रस्ताव को केवल 3 देशों का समर्थन मिला, जबकि 11 देश तटस्थ रहे। इस तरह सुरक्षा परिषद में दोनों ही प्रस्तावों के गिरने से एक अभूतपूर्व कूटनीतिक संकट पैदा हो गया और 31 अक्टूबर 2026 को मिशन का कार्यकाल औपचारिक रूप से समाप्त हो गया। 1 नवंबर से किसी भी वैध जनादेश के अभाव में यह शांति मिशन अब समाप्त हो चुका है।

मोरक्को का रुख और अगली प्राथमिकताएं

संयुक्त राष्ट्र मिशन के खत्म होने के बाद मोरक्को में हलचल तेज हो गई है। मोरक्को के राजा मोहम्मद VI ने 4 नवंबर को रबात स्थित शाही महल में एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई। राजा ने तीन स्पष्ट प्राथमिकताओं पर जोर दिया है: मोरक्को की क्षेत्रीय अखंडता की सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और पश्चिमी सहारा के स्थानीय निवासियों की सुरक्षा। मोरक्को सरकार ने गृह मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वे MINURSO के समन्वय कार्यालय के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर मिशन की वापसी और वहां मौजूद उपकरणों, वाहनों और अन्य संपत्तियों को हटाने की प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से पूरा करें। साथ ही, मोरक्को ने आश्वस्त किया है कि वह संघर्ष विराम का पालन करेगा और क्षेत्र में जारी विकास परियोजनाओं को प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ाएगा।

भविष्य की अनिश्चितताएं और चुनौतियां

35 वर्षों तक इस क्षेत्र में मौजूद रहे संयुक्त राष्ट्र मिशन की विदाई के बाद सुरक्षा और स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। अब वहां युद्धविराम की निगरानी करने वाली कोई अधिकृत अंतरराष्ट्रीय संस्था नहीं बची है। संयुक्त राष्ट्र ने सभी पक्षों से संयम बरतने का आग्रह किया है और स्पष्ट किया है कि मिशन का कार्यकाल समाप्त होने का अर्थ यह नहीं है कि वहां के लोगों का आत्मनिर्णय का अधिकार खत्म हो गया है। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि इस गतिरोध ने मोरक्को और पोलिसारियो फ्रंट के बीच तनाव को और गहरा कर दिया है। वैश्विक स्तर पर भी इस घटना ने फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका के प्रभाव को चुनौती दी है, जो अब संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से इस कूटनीतिक समाधान को लागू करने में असमर्थ दिखाई दे रहे हैं। आने वाले समय में पश्चिमी सहारा का भविष्य अब नए कूटनीतिक समीकरणों और संबंधित पक्षों के आपसी व्यवहार पर निर्भर करेगा।

https://hindi.news18.com/world/america-russia-veto-us-resolution-western-sahara-minurso-un-mission-10967361.html