तहज़ीब हाफ़ी आज के दौर के उन शायरों में गिने जाते हैं, जिन्हें सुनने और पढ़ने वालों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। उनकी सादगी, जज़्बात की गहराई और बात कहने का निराला सलीक़ा उन्हें ख़ासतौर पर नौजवान पीढ़ी के बीच बेहद मक़बूल बनाता है। सोशल मीडिया से लेकर यूट्यूब और मुशायरों के मंच तक, हर जगह उनके चाहने वालों की कमी नहीं है।
उनकी शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी यही है कि वे रोज़मर्रा की आम बोलचाल वाली ज़बान में बड़ी से बड़ी और गहरी बात बहुत आसानी से कह जाते हैं। मोहब्बत, जुदाई, तन्हाई और ज़िंदगी के फ़लसफ़े का जो ख़ूबसूरत मेल उनके कलाम में नज़र आता है, वही उन्हें ख़ास बनाता है। आइए, पढ़ते हैं उनके कुछ मशहूर शेर।
तहज़ीब हाफ़ी के चुनिंदा शेर
पेड़ मुझे हसरत से देखा करते थेमैं जंगल में पानी लाया करता था
दास्तां हूं मैं इक तवील मगरतू जो सुन ले तो मुख़्तसर भी हूं
अपनी मस्ती में बहता दरिया हूंमैं किनारा भी हूं भंवर भी हूं
तुझ को पाने में मसअला ये हैतुझ को खोने के वसवसे रहेंगे
इक तिरा हिज्र दाइमी है मुझेवर्ना हर चीज़ आरज़ी है मुझे
आसमां और ज़मीं की वुसअत देखमैं इधर भी हूँ और उधर भी हूं
कोई कमरे में आग तापता होकोई बारिश में भीगता रह जाए
बता ऐ अब्र मुसावात क्यूं नहीं करताहमारे गांव में बरसात क्यूँ नहीं करता
इस लिए रौशनी में ठंडक हैकुछ चराग़ों को नम किया गया है
तमाम नाख़ुदा साहिल से दूर हो जाएंसमुंदरों से अकेले में बात करनी है
नींद ऐसी कि रात कम पड़ जाएख़्वाब ऐसा कि मुंह खुला रह जाए
ये एक बात समझने में रात हो गई हैमैं उस से जीत गया हूँ कि मात हो गई है
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