खेती-किसानी के साथ नई राह
छत्तीसगढ़ में पारंपरिक खेती के साथ अब किसान आधुनिक और वैकल्पिक पशुपालन की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। इसी क्रम में, ऑस्ट्रेलिया में पाया जाने वाला विशालकाय पक्षी इमू अब बालोद जिले के किसानों के लिए मुनाफे का नया जरिया बनता जा रहा है। बालोद के रहने वाले किसान सन्नी जायसवाल ने इमू पालन की शुरुआत की है, जो इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। इमू की शारीरिक बनावट, इसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता और इससे मिलने वाले विभिन्न व्यावसायिक उत्पादों के कारण किसान इसमें अच्छी संभावनाएं देख रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय और इमू की खूबियां
पशु चिकित्सा विभाग बालोद में वेटरनरी असिस्टेंट सर्जन के पद पर तैनात डॉ. अभिषेक मिश्रा का कहना है कि इमू पालन ग्रामीण क्षेत्र के लिए एक बेहतरीन वैकल्पिक व्यवसाय हो सकता है। डॉ. मिश्रा के अनुसार, इमू की सबसे बड़ी खूबी इसकी मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता है। सामान्य तौर पर पाली जाने वाली मुर्गियों की तुलना में इमू बीमार कम पड़ते हैं, जिससे नुकसान की आशंका काफी कम हो जाती है। इमू के खान-पान को लेकर भी ज्यादा तामझाम नहीं है। ये खेतों में घूमते हुए कीड़े-मकोड़े खा लेते हैं और पोषण की कमी पूरी करने के लिए इन्हें सामान्य दाना दिया जा सकता है। इन्हें पालने के लिए बहुत बड़े शेड की जरूरत नहीं होती, बल्कि केवल इनके घूमने-फिरने के लिए एक खुली जगह पर्याप्त होती है।
मुनाफे का गणित: मांस से लेकर तेल तक
इमू पालन को आर्थिक दृष्टि से काफी फायदेमंद माना जा रहा है। एक इमू से उसके वजन और शारीरिक उत्पादकता के आधार पर करीब 20 से 30 हजार रुपये तक की बिक्री आसानी से संभव है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ के बाजार में इमू का मांस करीब 800 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा है। इसका मांस रेड मीट की श्रेणी में आता है, जिसका स्वाद और बनावट अन्य पक्षियों से बिल्कुल अलग और विशिष्ट होती है। चूंकि प्रदेश में अभी इस पक्षी का उत्पादन सीमित है, इसलिए बाजार में इसके मांस की मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर है, जो किसानों को बेहतर मूल्य दिला सकता है।
अंडे और तेल से अतिरिक्त कमाई
इमू पालन केवल मांस बिक्री तक ही सीमित नहीं है। इस पक्षी के अंडे और शरीर से निकलने वाला तेल भी अच्छी कमाई का साधन हैं। एक इमू का अंडा आकार में काफी बड़ा होता है और उसका वजन लगभग 500 ग्राम तक होता है। एक इमू सालभर में औसतन 20 अंडे देता है, जो बाजार में बिककर अच्छी आमदनी प्रदान करते हैं। इसके अलावा, इमू के शरीर से प्राप्त होने वाले तेल का उपयोग दवाइयों और कॉस्मेटिक उत्पादों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। विशेष रूप से जोड़ों के दर्द से संबंधित उत्पादों में इमू के तेल को काफी गुणकारी माना जाता है।
जलवायु और भविष्य की संभावनाएं
छत्तीसगढ़ की भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियां इमू पालन के लिए अनुकूल मानी जा रही हैं। बालोद में सन्नी जायसवाल द्वारा किए जा रहे इस प्रयास को विशेषज्ञ एक सकारात्मक पहल के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि केवल पालन ही पर्याप्त नहीं है। यदि किसान इन उत्पादों की प्रोसेसिंग और व्यवस्थित मार्केटिंग पर ध्यान दें, तो मुनाफा कई गुना बढ़ सकता है। बाजार की मांग को समझते हुए सही प्रबंधन किया जाए, तो इमू पालन निश्चित रूप से किसानों के लिए आय का एक सशक्त माध्यम बन सकता है। आने वाले समय में अगर अन्य किसान भी इस दिशा में आगे आते हैं, तो यह पशुपालन के क्षेत्र में एक नई क्रांति साबित हो सकती है।
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