अमेरिकी चुनाव में भारत जैसा चुनावी दांव, सेम नेम वाले उम्मीदवारों से बढ़ा विवाद

अमेरिका के अलास्का सीनेट चुनाव में एक जैसे नाम वाले प्रत्याशियों के उतरने से राजनीति गरमा गई है, जिसे भारत की पुरानी चुनावी रणनीति का एक रूप माना जा रहा है।

अमेरिका में भी चुनावी जालसाजी का शोर

भारत में अक्सर चुनावों के दौरान एक अनोखी चुनावी तकनीक चर्चा में रहती है, जिसे डमी उम्मीदवार उतारना कहा जाता है। अब यही विवादास्पद तरीका अमेरिका के अलास्का सीनेट चुनाव में भी सुर्खियों में है। वहां रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डैन एस. सुलिवन के खिलाफ उनके नाम से मिलते-जुलते एक अन्य उम्मीदवार के मैदान में उतरने से हड़कंप मच गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे विपक्षी दल डेमोक्रेट्स की एक सोची-समझी साजिश करार दिया है। हालांकि, अमेरिकी चुनाव प्रणाली में इस तरह की चालों का प्रभाव बहुत कम आंका जाता है, फिर भी इसने एक बड़ी राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है।

भारत का पुराना चुनावी तिकड़म

भारत में पंचायत स्तर से लेकर लोकसभा चुनाव तक, राजनीतिक दल दशकों से डमी उम्मीदवारों का इस्तेमाल करते रहे हैं। इस रणनीति का मूल मकसद मतदाताओं के मन में भ्रम पैदा करना और मुख्य विपक्षी उम्मीदवार के वोट बैंक में सेंध लगाना होता है। एक ही नाम के कई उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर पार्टियां वोटरों को उलझाने का काम करती हैं। यह तिकड़म किसी एक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि समय-समय पर अलग-अलग विचारधाराओं वाले दल इसका सहारा लेते रहे हैं।

देश के दिग्गज राजनेता भी इस दंश को झेल चुके हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को साल 2019 के लोकसभा चुनाव में केरल की वायनाड सीट पर इसी तरह की चुनौती का सामना करना पड़ा था। उस समय उनके नाम से मिलते-जुलते तीन उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें दो के नाम में राहुल गांधी शामिल था, जबकि तीसरे प्रत्याशी का सरनेम गांधी था। वहीं, छत्तीसगढ़ के 2014 लोकसभा चुनाव में महासमुंद सीट पर भी ऐसी ही राजनीति देखने को मिली थी। तब कांग्रेस नेता अजीत जोगी ने कथित तौर पर बीजेपी के उम्मीदवार चंदूलाल साहू के नाम से मिलते-जुलते कई प्रत्याशियों को खड़ा करने की रणनीति अपनाई थी। उस सीट पर चंदूलाल नाम के सात उम्मीदवार और मिलते-जुलते नाम वाले तीन अन्य प्रत्याशी चुनावी मैदान में थे। हालांकि, अक्सर जनता की जागरूकता और चुनाव चिह्न की स्पष्ट पहचान के कारण ऐसे दांव पूरी तरह सफल नहीं हो पाते हैं।

अलास्का में क्यों मचा है घमासान

अलास्का में सीनेट की सीट के लिए मुकाबला अब काफी रोचक और विवादित हो गया है। मौजूदा रिपब्लिकन सीनेटर डैन एस. सुलिवन अपने छह साल के तीसरे कार्यकाल के लिए चुनावी दौड़ में हैं। उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी डेमोक्रेटिक पार्टी की मैरी पेल्टोला हैं। लेकिन चर्चा का असली केंद्र डैनियल जे. सुलिवन जूनियर बन गए हैं। वे पेशे से एक सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक हैं और उन्होंने मई में नामांकन दाखिल किया था। उनका नाम रिपब्लिकन सीनेटर के नाम से काफी मेल खाता है। रिपब्लिकन पार्टी का आरोप है कि डेमोक्रेट्स ने जानबूझकर यह चाल चली है ताकि वोट बंट जाएं। एक प्रमुख अमेरिकी समाचार पत्र की रिपोर्ट में भी यह दावा किया गया था कि मैरी पेल्टोला के अभियान से जुड़े लोग ऐसे ही प्रत्याशियों की तलाश कर रहे थे जो रिपब्लिकन वोटरों को भ्रमित कर सकें। हालांकि, पेल्टोला और डेमोक्रेटिक पार्टी ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।

जांच और कानूनी कार्रवाई

विवाद इतना बढ़ गया कि अलास्का के रिपब्लिकन गवर्नर माइक डनलीवी ने पूरे मामले की जांच के आदेश दे दिए। इसके बाद अमेरिकी न्याय विभाग ने भी इस मामले में आपराधिक जांच शुरू कर दी है। संघीय जांच ब्यूरो यानी एफबीआई ने डैनियल सुलिवन को चंदा देने वाले दानदाताओं से भी पूछताछ की है। चुनाव की तारीखों के इतना करीब होने के कारण यह मामला राजनीतिक स्तर पर काफी गंभीर मोड़ ले चुका है और दोनों दल एक-दूसरे पर हमलावर हैं।

क्या है रैंक्ड चॉइस वोटिंग का पेच

अलास्का के चुनाव की एक और बड़ी विशेषता वहां की मतदान प्रक्रिया है। यहां भारत की तरह केवल सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार ही विजेता नहीं होता। अलास्का में रैंक्ड चॉइस वोटिंग व्यवस्था लागू है। इसमें मतदाता उम्मीदवारों को उनकी प्राथमिकता के आधार पर वरीयता देते हैं। यानी वोटर को पहली, दूसरी और तीसरी पसंद दर्ज करनी होती है। यदि किसी प्रत्याशी को पहली प्राथमिकता के 50 प्रतिशत से अधिक वोट नहीं मिलते हैं, तो सबसे कम वोट पाने वाला उम्मीदवार बाहर कर दिया जाता है। बाहर हुए उम्मीदवार के मतदाताओं की अगली पसंद के आधार पर वोट अन्य प्रत्याशियों में ट्रांसफर कर दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक किसी एक उम्मीदवार को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हो जाता। यही कारण है कि वहां डमी उम्मीदवारों का प्रभाव अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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