चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल के अंतराल के बाद उत्तर कोरिया की यात्रा पर पहुंचे हैं। साल 2019 के बाद यह उनकी पहली उत्तर कोरिया यात्रा है, और यही वजह है कि इसे कूटनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है। शी अब बहुत कम विदेश दौरे करते हैं, ऐसे में उनका खुद प्योंगयांग जाना अपने आप में कई बड़े संकेत देता है।
इस यात्रा के पीछे जिस सबसे बड़ी वजह को माना जा रहा है, वह है दोनों देशों का साझा 'सदाबहार दोस्त' रूस। साल 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद उत्तर कोरिया ने रूस को हथियार, गोला-बारूद और सैनिक मुहैया कराए। इसके बदले उत्तर कोरिया को रूस से अरबों डॉलर के साथ-साथ हथियारों की उन्नत तकनीक भी हासिल हुई। इससे पहले चीन ही उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा आर्थिक और रणनीतिक साझेदार रहा था, लेकिन युद्ध के बाद से यह स्थिति बदलती दिख रही है। अब रूस तेजी से उस भूमिका में आ रहा है, और चीन इन हालात में अपनी प्रासंगिकता दोबारा साबित करना चाहता है।
दौरा या उत्तर कोरिया को याद दिलाने की कोशिश?
शी जिनपिंग ने रोडोंग सिनमुन अखबार में लिखा कि दोनों देशों के बीच खून से बनी दोस्ती समय की कसौटी पर खरी उतरी है। वे पार्टी, सरकार और सेना के स्तर पर आपसी संपर्क को और बढ़ाने की बात कह रहे हैं। माना जा रहा है कि चीन उत्तर कोरिया को अधिक आर्थिक मदद देकर रूस के प्रभाव को कम करने की कोशिश कर सकता है। उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था पहले से ही चीन पर काफी हद तक निर्भर रही है और चीन इस निर्भरता को बनाए रखना चाहता है। यही कारण है कि अपने गिने-चुने विदेश दौरों में शी ने इस यात्रा को शामिल किया है।
रूस-उत्तर कोरिया की नजदीकी बनी चुनौती
चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि शी जिनपिंग की उत्तर कोरिया यात्रा दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत करने का अच्छा अवसर है। उन्होंने कहा कि यह यात्रा दोनों पक्षों के लिए समय के अनुरूप द्विपक्षीय रिश्तों को आगे ले जाने का मौका साबित होगी।
इस साल चीन और उत्तर कोरिया के बीच हुई मित्रता, सहयोग और आपसी सहायता संधि की 65वीं वर्षगांठ है। यह संधि चीन का किसी भी देश के साथ इकलौता औपचारिक रक्षा समझौता है। हालांकि उत्तर कोरिया ने जून 2024 में रूस के साथ भी एक समान सुरक्षा संधि पर हस्ताक्षर किए थे, जिससे चीन पर उसकी निर्भरता घट सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ते सुरक्षा संबंध चीन के लिए चिंता का विषय हो सकते हैं, क्योंकि इससे उसकी सीमा पर भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ सकता है।
चीन और रूस दोनों ने हाल के एक संयुक्त बयान में कहा था कि वे उत्तर कोरिया की सुरक्षा को कूटनीतिक अलगाव, आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य दबाव से बचाने के पक्ष में हैं। दोनों देश कोरियाई प्रायद्वीप के मसले को मिलकर सुलझाने का वादा भी कर चुके हैं। शी ने हाल ही में अपनी 2019 की यात्रा को याद करते हुए कहा था कि वे जहां भी गए, उन्हें चीन और उत्तर कोरिया के बीच परिवार जैसा घनिष्ठ रिश्ता महसूस हुआ।
परमाणु कार्यक्रम भी बड़ा मुद्दा
उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम इस यात्रा का एक अहम पहलू है, क्योंकि वह लगातार अपने परमाणु कार्यक्रम का विस्तार कर रहा है। हाल ही में किम जोंग उन ने अपने नए यूरेनियम एनरिचमेंट सेंटर का दौरा किया था। वहीं उनकी बहन किम यो जोंग ने अमेरिका की परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग को पुरानी और अव्यावहारिक बताते हुए साफ कर दिया था कि उत्तर कोरिया ऐसा कभी नहीं करेगा।
दूसरी ओर, चीन यह नहीं चाहता कि उत्तर कोरिया रूस से और अधिक उन्नत मिसाइल या परमाणु तकनीक हासिल करे। चूंकि उत्तर कोरिया अनियंत्रित रवैया रखता है, इसलिए उसकी बढ़ती ताकत कोरियाई प्रायद्वीप का संतुलन बिगाड़ सकती है, जो चीन के हित में भी नहीं है।
शक्ति संतुलन के लिहाज से भी अहम
क्षेत्रीय सुरक्षा के नजरिए से भी यह दौरा महत्वपूर्ण है। चीन, उत्तर कोरिया और रूस के बीच बढ़ती नजदीकी अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए चिंता का विषय है। हाल ही में बीजिंग में शी, किम और पुतिन की एक साथ आई तस्वीरें दुनिया भर में चर्चा का केंद्र बनी थीं। चीन इस त्रिकोण को मजबूत दिखाना चाहता है, लेकिन साथ ही उत्तर कोरिया को पूरी तरह रूस की ओर झुकने से भी रोकना चाहता है। उधर दक्षिण कोरिया उम्मीद कर रहा है कि शी जिनपिंग उत्तर कोरिया पर कुछ अंकुश रख सकेंगे।
कुल मिलाकर, शी जिनपिंग का यह दौरा चीन की तीन बड़ी चिंताओं को उजागर करता है—रूस के बढ़ते प्रभाव पर लगाम लगाना, उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर नजर रखना और पूर्वी एशिया में अपना रणनीतिक नियंत्रण बनाए रखना। यह यात्रा सिर्फ द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत करने की कोशिश भर नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच चीन की कूटनीति का भी प्रमाण है।
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