2027 में देश के 7 राज्यों में होगा चुनावी संग्राम
उत्तर प्रदेश समेत देश के कई महत्वपूर्ण राज्यों में 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी हलचल और राजनीतिक बयानबाजी अभी से तेज हो चुकी है। भारतीय राजनीति के लिहाज से साल 2027 बेहद अहम साबित होने वाला है, क्योंकि इस दौरान देश के कुल 7 राज्यों में नई सरकारों का चुनाव किया जाएगा। इन राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल समाप्त होने के समय के आधार पर चुनाव आयोग दो अलग-अलग चरणों यानी साल के शुरुआत और अंत में मतदान की प्रक्रिया पूरी कराएगा।
शुरुआती दौर: फरवरी और मार्च 2027 में 5 राज्यों में चुनाव
साल 2027 की शुरुआत में ही देश के 5 प्रमुख राज्यों की वर्तमान विधानसभाओं का कार्यकाल मार्च से मई 2027 के बीच समाप्त हो रहा है। इसी वजह से इन राज्यों में चुनाव आयोग द्वारा फरवरी और मार्च 2027 के दौरान मतदान कराने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है।
जिन राज्यों में साल के शुरुआती महीनों में वोट डाले जाएंगे, उनकी सूची और कुल सीटों का ब्योरा इस प्रकार है:
- उत्तर प्रदेश: देश के सबसे बड़े राजनीतिक सूबे उत्तर प्रदेश में कुल 403 विधानसभा सीटें हैं, जहां सत्ता की चाबी पाने के लिए सभी दलों में जोरदार मुकाबला देखने को मिलेगा।
- पंजाब: राज्य में कुल 117 विधानसभा सीटें मौजूद हैं।
- उत्तराखंड: पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में कुल 70 विधानसभा सीटें हैं।
- गोवा: तटीय राज्य गोवा में विधानसभा की कुल 40 सीटें शामिल हैं।
- मणिपुर: पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर में कुल 60 विधानसभा सीटें हैं।
साल के अंत में: गुजरात और हिमाचल प्रदेश में मतदान
साल 2027 के दूसरे हिस्से में देश के दो बड़े राज्यों की विधानसभा का कार्यकाल पूरा होगा। इस कारण यहां साल के अंतिम महीनों यानी नवंबर और दिसंबर 2027 में मतदान संपन्न कराया जाएगा:
- हिमाचल प्रदेश: इस राज्य में कुल 68 विधानसभा सीटें हैं, जहां नवंबर 2027 में चुनाव होने की संभावना है।
- गुजरात: पश्चिमी राज्य गुजरात में कुल 182 विधानसभा सीटें हैं, जहां दिसंबर 2027 में विधानसभा चुनाव कराए जाएंगे।
जुलाई 2027 में होगा राष्ट्रपति चुनाव
राज्यों के विधानसभा चुनावों के अलावा साल 2027 का वर्ष एक और बड़ी संवैधानिक प्रक्रिया का गवाह बनेगा। जुलाई 2027 में भारत के अगले राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए भी चुनाव आयोजित किया जाना तय है, जो देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के चयन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण घटनाक्रम होगा।
राज्यों का सियासी मिजाज और जमीनी समीकरण
चुनावी वर्ष 2027 को लेकर सभी राजनीतिक दलों ने जमीनी स्तर पर रणनीतियां बनानी शुरू कर दी हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चाएं गर्म हैं कि क्या सीधे आर्थिक मदद या योजनाओं के जरिए वोट हासिल करने का फॉर्मूला इन 7 राज्यों में कारगर रहेगा या नहीं। क्या राजनीति में अब सत्ता विरोधी लहर (एंटी इंकम्बेंसी) बेअसर हो चुकी है या फिर विपक्ष इसका फायदा उठाकर वापसी करने में कामयाब रहेगा, यह देखना काफी दिलचस्प होगा।
उत्तर प्रदेश में मुख्य मुकाबला योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के बीच माना जा रहा है। यहां अखिलेश यादव के पास अपने पारंपरिक जातिगत मतों का समर्थन है, तो दूसरी ओर योगी आदित्यनाथ के पास हिंदू मतों के साथ-साथ आधी आबादी यानी महिला मतदाताओं का बड़ा भरोसा दिखता है।
पंजाब की बात करें तो वहां नशा सबसे गंभीर मुद्दा बना हुआ है। इसी मुद्दे के बल पर आम आदमी पार्टी ने पिछले चुनाव में 92 सीटें हासिल की थीं। हालांकि, 5 साल के शासन के बाद अब इस मुद्दे पर जनता का क्या रुख रहता है और भारतीय जनता पार्टी कितनी मजबूती से उभरती है, यह देखना होगा। भाजपा के लिए बिना अकाली दल के चुनाव में उतरने या अकाली दल के साथ गठबंधन करने की दोनों स्थितियों में नतीजे बेहद मायने रखेंगे। इसके अलावा कांग्रेस और आम आदमी पार्टी कितनी सीटों पर अपनी पकड़ बनाए रख पाती हैं, इस पर भी सबकी निगाहें होंगी।
उत्तराखंड में सवाल उठ रहा है कि क्या मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी दोबारा सत्ता में वापसी करेंगे या फिर कांग्रेस के लिए कोई नया मौका बनेगा। गोवा में भी कांग्रेस के लिए संभावनाओं पर बहस जारी है। पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर का रुख देखें तो वहां कुकी, नागा और मैतेई समुदायों के साथ-साथ ईसाई मतदाताओं का ध्रुवीकरण चुनाव परिणामों को तय करेगा।
साल के अंत में होने वाले चुनावों की बात करें तो गुजरात में भाजपा का गढ़ बेहद मजबूत माना जा रहा है और वहां उसे हराने के लिए किसी बड़े चमत्कार की जरूरत मानी जा रही है। वहीं, हिमाचल प्रदेश के मौजूदा हालात में कांग्रेस के लिए सत्ता में दोबारा लौटने को भी चमत्कार ही माना जा रहा है। आने वाला समय ही तय करेगा कि इन 7 राज्यों के मतदाता किस पार्टी के पक्ष में अपना फैसला सुनाते हैं।
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