बिहार की 5 महिलाओं ने रसोई से निकलकर लोकगीतों से बनाई पहचान, देश भर के मंचों पर मिथिला की संस्कृति की गूंज

बिहार के मधुबनी की पांच महिलाओं की टोली चूल्हा-चौकी से निकलकर आज देशभर के बड़े मंचों पर अपनी लोककला की छाप छोड़ रही है। बिना औपचारिक शिक्षा के फूलो देवी के नेतृत्व में इस समूह ने मैथिली लोकगीतों को नया आयाम दिया है।

रसोई के काम से लेकर सांस्कृतिक मंचों तक की अनूठी कहानी

बिहार राज्य के मधुबनी जिले के राजनगर प्रखंड अंतर्गत बसे भट्टसिमर गांव की 5 महिलाओं ने अपनी प्रतिभा के बल पर लोकसंगीत की दुनिया में एक अलग मुकाम हासिल किया है। घरेलू कामकाज और चूल्हा-चौकी तक सीमित रहने वाली इन महिलाओं ने सामाजिक बंदिशों और तानों की परवाह किए बिना अपनी कला यात्रा आगे बढ़ाई। उन्होंने न केवल खुद गीत और धुन तैयार की, बल्कि मैथिली लोकगीतों की समृद्ध परंपरा को पूरे देश में लोकप्रिय भी बनाया है।

2008 में रखी गई थी इस लोक कला यात्रा की नींव

इस टोली की अगुवाई करने वाली फूलो देवी के अनुसार, इस कलात्मक सफर का आगाज़ साल 2008 में हुआ था। मिथिलांचल की प्रसिद्ध लोक नाट्य शैली जाट-जटीन से प्रेरित होकर उन्होंने इसकी शुरुआत की थी। शुरुआती दौर में इन महिलाओं के पास न तो कोई औपचारिक शिक्षा थी और न ही डिजिटल या सोशल मीडिया की कोई जानकारी थी। पहली बार उन्होंने अपने ही गांव के एक छोटे से मंच पर लोकगीत गाकर और पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत कर अपनी पहली प्रस्तुति दी थी। ग्रामीणों ने जब उनकी इस अद्भुत प्रस्तुति को सराहा, तो उन्हें विभिन्न आयोजनों और उत्सवों में गाने के लिए बुलावे मिलने लगे।

टोली की पांचों सदस्य और उनकी गीत लेखन की क्षमता

इस समर्पित संगीत समूह में कुल 5 महिलाएं शामिल हैं, जिनकी टोली जहां भी बैठ जाए या खड़ी हो जाए, वहीं लोकगीतों की महफिल जम जाती है। समूह में शामिल प्रमुख चेहरे हैं:

  • फूलो देवी (समूह की लीडर)
  • सोनी देवी
  • रीमा देवी
  • विभा देवी
  • सविता देवी

यह टोली खुद अपनी क्षेत्रीय भाषा में गीतों की रचना करती है और उनकी खास देसी धुन भी तैयार करती है। इनके द्वारा लिखे गए लोकगीतों को दो दर्जन से अधिक स्थानीय गायक अपनी आवाज दे चुके हैं, जिनमें से मिथिलांचल के लगभग 15-16 गायकों ने इनके लिखे गीतों को रिकॉर्ड कर अपनी आवाज़ दी है। इनके गीतों के मुख्य विषयों में मिथिलांचल की संस्कृति और लोक पर्व शामिल हैं:

  • छठ पर्व के पावन गीत
  • उपनयन और संस्कार गीत
  • मुंडन समारोह के गीत
  • शादी एवं विवाह के पारंपरिक गीत
  • झिझिया और जाट-जटीन लोकनाट्य गीत
  • अच्छिंजल और हास्य-व्यंग्य से भरपूर लोकगीत

बिहार से लेकर देश के कई राज्यों तक फैला कला का जादू

इस टोली की कला केवल मिथिलांचल तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने बिहार और भारत के विभिन्न राज्यों में जाकर अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों का दिल जीता है। बिहार के भीतर इन्होंने पटना, मुजफ्फरपुर, छपरा और मधुबनी के प्रमुख मंचों पर अपनी सांस्कृतिक छाप छोड़ी है। इसके अलावा, राज्य से बाहर भी कई जगहों पर उन्होंने शानदार प्रस्तुतियां दी हैं:

  • सिलचर
  • गुवाहाटी
  • महाराष्ट्र
  • असम
  • दिल्ली

इन सभी राष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुतियों के लिए उन्हें मान-सम्मान के साथ-साथ आर्थिक स्वावलंबन भी मिला है। अब इनके कार्यक्रमों की प्री-बुकिंग की जाती है और ये अपनी कलात्मक प्रस्तुति के लिए उचित पारिश्रमिक भी लेती हैं।

'दरोगा बाबू' से मिली अपार प्रसिद्धि और छठ गीतों का जादू

इस महिलाओं की टोली का एक बेहद लोकप्रिय और चर्चित गीत 'दरोगा बाबू' है, जो अपने मजाकिया अंदाज और हास्य-ठिठोली के कारण लोगों के बीच काफी वायरल हुआ है। यह गीत लोक जीवन की मस्ती और देसी मिठास को खूबसूरती से बयां करता है। इसके अतिरिक्त, लोक पर्व के अवसर पर इन्होंने छठ मैया के कई पावन गीत भी गाए हैं, जिनमें 'बांझिन के पुत्र देथीं' और 'केरवा के भार' जैसे गीत शामिल हैं। गीतों के साथ-साथ इनका अनूठा नृत्य भी दर्शकों को खूब भाता है।

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