फिल्म 'पायर' में पलायन के दर्द ने रुलाया: जानिए कौन हैं 'आमा-बूबू' का किरदार निभाने वाले पिथौरागढ़ के ये दो बुजुर्ग कलाकार

उत्तराखंड के पहाड़ों से युवाओं के पलायन और पीछे छूट गए बुजुर्ग माता-पिता के दर्द पर बनी फिल्म 'पायर' इन दिनों काफी चर्चा में है। जानिए इस फिल्म में आमा और बूबू का भावुक किरदार निभाने वाले गैर-पेशेवर कलाकारों पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी की असल जिंदगी की कहानी।

पहाड़ों का दर्द और बुजुर्गों का अकेलापन: दर्शकों को भावुक कर रही फिल्म 'पायर'

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन का दंश और अपने बच्चों के इंतजार में बूढ़ी होती आंखों का दर्द इन दिनों बड़े पर्दे पर हर किसी को भावुक कर रहा है। हाल के दिनों में दर्शकों के बीच चर्चा का केंद्र बनी फिल्म 'पायर' ने पहाड़ी जिंदगी के इसी कड़वे सच और बुजुर्गों के अकेलेपन को बेहद गहराई और सादगी से उकेरा है। फिल्म की कहानी एक ऐसे बुजुर्ग दंपती के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनका बेटा बेहतर भविष्य और रोजगार की तलाश में अपने गांव से दूर चला जाता है। समय बीतता जाता है, लेकिन बेटा वापस लौटकर घर नहीं आता। गांव के वीरान माहौल में अकेले रह गए आमा-बूबू हर दिन दरवाजे पर आंखें बिछाए अपने बेटे की राह देखते हैं।

उम्र के इस नाजुक पड़ाव पर इन बुजुर्गों को न केवल अपनों की दूरी और अकेलेपन की पीड़ा झेलनी पड़ती है, बल्कि वे पहाड़ों से खाली होते गांवों के पलायन के दर्द के भी गवाह बनते हैं। फिल्म में 'आमा' और 'बूबू' (कुमाऊंनी में दादी और दादा) का किरदार निभाने वाले कलाकारों के सहज और स्वाभाविक अभिनय ने लोगों के दिलों को सीधे छू लिया है। उनकी भावुक अदाकारी देखकर सिनेमाघरों में दर्शक अपने आंसू नहीं रोक पा रहे हैं।

कौन हैं फिल्म में 'आमा-बूबू' का किरदार निभाने वाले बुजुर्ग कलाकार?

फिल्म में बूबू की मुख्य भूमिका पदम सिंह कापड़ी ने निभाई है, जिनकी उम्र करीब 80 साल है। वहीं आमा का किरदार हीरा देवी ने जीवंत किया है, जिनकी उम्र लगभग 75 साल है। इस फिल्म की सबसे खास बात यह है कि दोनों ही कलाकार अभिनय की दुनिया से पूरी तरह अनजान हैं और उन्होंने अपने जीवन में कभी कोई पेशेवर एक्टिंग नहीं की है।

दोनों ही कलाकार उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की बेरीनाग तहसील के निवासी हैं। यदि उनकी असल जिंदगी की बात करें तो:

  • पदम सिंह कापड़ी: ये भारतीय सेना में हवलदार के पद पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं। सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद वे अपने गांव में ही खेतीबाड़ी का काम करते आ रहे हैं।
  • हीरा देवी: वे एक साधारण गृहिणी हैं, जो घर के कामकाज के साथ-साथ खेतीबाड़ी करती हैं और पशुपालन का काम संभालती हैं। इसके अलावा, उनकी पहाड़ी लोकगीतों में भी गहरी रुचि रही है।

जीवन के इस पड़ाव में एक और दुखद समानता यह है कि दोनों ही कलाकार अपने-अपने असली जीवनसाथी को कुछ साल पहले ही खो चुके हैं। उनका यही निजी दर्द और जीवन के वास्तविक अनुभव पर्दे पर उनकी अदाकारी में साफ नजर आते हैं।

पर्दे के पीछे की कहानी: असल जिंदगी में पति-पत्नी नहीं हैं दोनों कलाकार

फिल्म 'पायर' से जुड़ी सबसे दिलचस्प बात यह है कि पर्दे पर एक-दूसरे के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण दिखाने वाले पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी असल जिंदगी में पति-पत्नी नहीं हैं। हीरा देवी एक विधवा महिला हैं, जबकि पदम सिंह कापड़ी की पत्नी का भी कुछ वर्ष पहले स्वर्गवास हो चुका है।

शुरुआत में जब फिल्म की टीम ने हीरा देवी से इस भूमिका के लिए संपर्क किया, तो वे किसी अन्य पुरुष के साथ पर्दे पर पत्नी का किरदार निभाने को लेकर बिल्कुल सहज नहीं थीं। उनके लिए समाज और अपनी परंपराओं के बीच यह निर्णय लेना काफी कठिन था। हालांकि, बाद में उनके परिवार के सदस्यों और फिल्म की पूरी टीम ने उन्हें विस्तार से समझाया और हौसला बढ़ाया। परिवार के समर्थन के बाद ही हीरा देवी इस ऐतिहासिक भूमिका को निभाने के लिए तैयार हुईं। इसके बाद दोनों बुजुर्ग कलाकारों ने बिना किसी औपचारिक अभिनय प्रशिक्षण के अपनी स्वाभाविक भाव-भंगिमाओं और जीवन के वास्तविक अनुभवों से इन किरदारों में जान फूंक दी।

मुनस्यारी की ट्रेकिंग से मिली फिल्म 'पायर' की कहानी की प्रेरणा

फिल्म की शूटिंग पिथौरागढ़ जिले की बेरीनाग तहसील में स्थित पुराना थल गांव में संपन्न हुई है। लेकिन इस फिल्म की मूल कहानी का विचार निर्देशक विनोद कापड़ी के मन में वर्ष 2017 में आया था। उस समय विनोद कापड़ी मुनस्यारी के खूबसूरत इलाकों में ट्रेकिंग कर रहे थे। उसी ट्रेकिंग के दौरान उनकी मुलाकात एक ऐसे बुजुर्ग दंपती से हुई, जो गांव में लगभग पूरी तरह अकेले रह रहे थे।

उस बुजुर्ग दंपती के नाम तुलसी देवी और पदम सिंह थे। उनके बच्चे भी रोजी-रोटी की तलाश में गांव छोड़कर दूर शहरों में बस चुके थे। उन बुजुर्गों का अकेलापन, उनका एक-दूसरे के प्रति गहरा लगाव और अपनों का इंतजार निर्देशक के दिल को गहराई से छू गया। मुनस्यारी की उस वास्तविक घटना और आंखों देखे अनुभव ने ही अंततः फिल्म 'पायर' की पटकथा और कहानी का रूप लिया।

पहाड़ से पलायन और पीछे छूटते अपनों पर खड़े किए गंभीर सामाजिक सवाल

निर्देशक विनोद कापड़ी ने अपनी फिल्म में किसी बड़े या पेशेवर सितारों को लेने के बजाय उत्तराखंड के पहाड़ों के वास्तविक परिवेश में रहने वाले आम स्थानीय लोगों को अभिनय का मौका दिया। यही वजह है कि फिल्म में पहाड़ी जीवनशैली, वहां की स्थानीय भाषा, खान-पान, पहनावा और बुजुर्गों की वास्तविक भावनाएं बेहद स्वाभाविक और प्रामाणिक नजर आती हैं।

फिल्म 'पायर' केवल एक बुजुर्ग पति-पत्नी की व्यक्तिगत कहानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों से हो रहे निरंतर पलायन की उस भयावह तस्वीर को भी उजागर करती है, जो दशकों से चली आ रही है। यह फिल्म समाज और व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि बेहतर भविष्य और नौकरी की चाह में शहर जाने वाली युवा पीढ़ी के पीछे, अपने ही घरों में अकेले छूट गए बुजुर्ग माता-पिता की सुध आखिरकार कौन लेगा? आमा और बूबू के ये दो किरदार इसी कड़वी सामाजिक सच्चाई को दर्शकों के सामने बड़ी ही सादगी और मजबूती से रखते हैं। यही कारण है कि फिल्म का हर एक दृश्य लोगों को अपने खुद के जीवन और समाज से जुड़ा हुआ महसूस हो रहा है।

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