भारत में प्रयोगशालाओं के भीतर जानवरों पर किए जाने वाले प्रयोगों को लेकर तैयार किए गए नए ड्राफ्ट नियमों पर देश भर में बहस छिड़ गई है। पीपल फॉर एनिमल्स संस्था से जुड़ी वरिष्ठ पशु अधिकार कार्यकर्ता अंबिका शुक्ला ने इन प्रस्तावित दिशानिर्देशों को लेकर केंद्र सरकार और वैज्ञानिक समुदाय के सामने कई बुनियादी सवाल खड़े किए हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि प्रस्तावित नियम विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति लाने के बजाय देश को कई कदम पीछे धकेल सकते हैं। इससे न सिर्फ बेज़ुबान प्राणियों की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी, बल्कि वैज्ञानिक नतीजों की विश्वसनीयता और मानव स्वास्थ्य पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
अंबिका शुक्ला के अनुसार, प्रयोगशालाओं की चारदीवारी के भीतर जानवर जिस भयानक डर, पीड़ा, अकेलापन और मानसिक तनाव का सामना करते हैं, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि डर, दर्द, भूख और बेचैनी जैसी भावनाएं सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं हैं। जानवर भी हर उस दर्द को गहराई से महसूस करते हैं, जिसे इंसान महसूस कर सकता है, लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि वे अपनी तकलीफ को अपनी ज़बान में व्यक्त करने में असमर्थ हैं।
प्रयोगशालाओं में बेज़ुबान जानवरों पर होती दर्दनाक क्रूरता
लैब परीक्षणों के दौरान जानवरों पर होने वाले अत्याचारों का खुलासा करते हुए अंबिका शुक्ला ने कुछ रूह कंपा देने वाली मिसालें सामने रखीं। उन्होंने बीगल नस्ल के कुत्तों का जिक्र करते हुए बताया कि प्रयोगशालाओं में जब उन पर दर्दनाक प्रयोग किए जाते हैं, तो उनकी चीखों और दर्द भरी आवाज़ों को दबाने के लिए उनके वोकल कॉर्ड्स (स्वर तंत्रियां) तक काट दी जाती हैं। इस अमानवीय प्रक्रिया के कारण जो बीगल कुत्ते प्रयोगों से बचकर निकल भी जाते हैं, वे जीवन भर के लिए अपनी आवाज़ गंवा चुके होते हैं और चाहकर भी भौंक या रो नहीं सकते।
इसके अलावा, प्रसाधन सामग्रियों की जांच के नाम पर होने वाले प्रयोगों पर बात करते हुए उन्होंने खरगोशों की दयनीय स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि शैंपू जैसे उत्पादों का परीक्षण करने के लिए खरगोश के सिर को एक विशेष उपकरण में इस तरह कसकर बांध दिया जाता है कि उसकी आंखें खुली रहें। इसके बाद उनकी खुली आंखों में सीधे शैंपू की बूंदें डाली जाती हैं, जिससे जानवरों को गंभीर पीड़ा होती है। लिपस्टिक और अन्य सौंदर्य प्रसाधनों की गुणवत्ता जांचने के नाम पर भी जानवरों को इसी तरह के अत्यंत दर्दनाक परीक्षणों से गुजरना पड़ता है।
प्रस्तावित ड्राफ्ट नियमों की गंभीर खामियां
अंबिका शुक्ला ने सरकार द्वारा लाए गए नए ड्राफ्ट नियमों पर विस्तार से बात की और उन प्रमुख बदलावों को रेखांकित किया जो वैज्ञानिक शोध और पशु कल्याण दोनों के लिए बेहद चिंताजनक हैं।
- जानवरों की आपूर्ति का अनिश्चित स्रोत: पुराने नियमों के तहत प्रयोगशालाओं में केवल उन्हीं जानवरों पर परीक्षण करने की अनुमति थी, जिन्हें नियंत्रित परिस्थितियों में प्रयोगशालाओं में ही पाला जाता था। इससे उनकी सेहत और अन्य स्थितियों पर नज़र रखी जा सकती थी। हालांकि, नए प्रस्तावों में जानवरों को दूसरी जगहों से लाने की छूट दी गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि ये जानवर कहां से लाए जा सकते हैं। ऐसे में इस बात की भारी आशंका है कि बाजार, सड़कों या जंगलों से भी आवारा कुत्तों और बिल्लियों के साथ-साथ दूसरे जानवरों और वन्यजीवों को पकड़कर प्रयोगों के लिए लाया जा सकता है।
- स्वतंत्र निगरानी का खात्मा और हितों का टकराव: पहले प्रयोगों को मंजूरी देने और उनकी निगरानी करने में केंद्रीय स्तर की कमेटी की भूमिका थी। लेकिन नए प्रस्तावों में संस्थानों को अपने शोध को खुद मंजूरी देने की व्यवस्था का प्रावधान है। अंबिका शुक्ला ने इसे हितों के सीधे टकराव की स्थिति बताते हुए कहा कि कोई संस्थान अपने ही शोध को मंजूरी देने से इनकार क्यों करेगा? इससे स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था पूरी तरह कमजोर हो सकती है।
खुले में परीक्षण और पूर्व-सूचना निरीक्षण पर कड़ी आपत्ति
नए ड्राफ्ट में प्रयोगशालाओं की व्यवस्था और निरीक्षण प्रक्रिया में भी ढील देने का प्रस्ताव है, जिस पर अंबिका शुक्ला ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि प्रयोग खुले स्थानों पर किए जा सकेंगे तो मौसम, धूल, मिट्टी और दूसरी बाहरी परिस्थितियां प्रयोगों को सीधे प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में एक जैसे नतीजे दोबारा प्राप्त करना मुश्किल होगा, जबकि वैज्ञानिक शोध की विश्वसनीयता के लिए नियंत्रित परिस्थितियां बेहद जरूरी हैं। यदि प्रयोग में इस्तेमाल होने वाला जानवर और उसका वातावरण ही नियंत्रित नहीं होगा तो नतीजों पर भरोसा करना कठिन हो जाएगा।
इसी तरह, प्रयोगशाला के निरीक्षण से पहले सूचना देने के प्रस्ताव पर भी उन्होंने सवाल उठाया। शुक्ला के मुताबिक, पहले से जानकारी मिलने पर प्रयोगशालाओं को अपनी कमियों और अनियमिताओं को छिपाने या ठीक दिखाने का मौका मिल सकता है। ऐसे में निरीक्षण का वास्तविक उद्देश्य ही प्रभावित हो जाएगा और जांच बेअसर साबित होगी।
अंतरराष्ट्रीय साख और देश की वैज्ञानिक छवि पर खतरा
अंबिका शुक्ला ने आशंका जताई कि यदि नए नियमों से निगरानी और सुरक्षा मानक कमजोर होते हैं, तो विदेशी कंपनियां भारत की प्रयोगशालाओं का इस्तेमाल सस्ते परीक्षणों के लिए कर सकती हैं। इससे भारत की वैज्ञानिक शोध संबंधी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है और देश की छवि पर विपरीत असर पड़ेगा।
उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने कॉस्मेटिक्स के मामले में जानवरों पर परीक्षण रोकने के बाद भी अपने उत्पादों और ब्रांड्स के जरिए लगातार प्रगति की है। जब सख्त सुरक्षा मानकों के साथ भी उद्योग आगे बढ़ रहा था, तो ऐसे में पुराने सुरक्षा मानकों को कमजोर करने की जरूरत समझ से परे है।
'दयालुता से भरा शोध ही वास्तविक वैज्ञानिक अनुसंधान'
वार्ता के अंत में अंबिका शुक्ला ने कहा कि बेहतर वैज्ञानिक शोध और जानवरों के प्रति संवेदनशीलता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उनके मुताबिक, जानवरों को साफ-सुथरे वातावरण, पर्याप्त जगह और बेहतर देखभाल में रखने से शोध के नतीजे भी बेहतर हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत को मौजूदा अच्छे नियमों को कमजोर करने के बजाय आधुनिक तकनीकों और विकल्पों को अपनाना चाहिए:
- AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) पर आधारित आधुनिक शोध मॉडल
- स्टेम सेल (Stem Cell) आधारित उन्नत परीक्षण प्रक्रियाएं
- कंप्यूटर आधारित शोध मॉडल और डिजिटल सिमुलेशन तकनीकें
अंबिका शुक्ला ने आम नागरिकों से भी आगे आने की अपील की। उन्होंने कहा कि जानवरों की अपनी कोई आवाज नहीं होती, लेकिन हमारी आवाज है। इसलिए लोगों को आगे आकर इन प्रस्तावित ड्राफ्ट नियमों के खिलाफ अपनी आपत्तियां सरकार तक पहुंचानी चाहिए।
विशेष नोट: यदि आप प्रस्तावित नियमों पर अपने सुझाव या आपत्तियां दर्ज कराना चाहते हैं, तो आप उन्हें ईमेल के जरिए सीधे cpcsea-mef@gov.in पर भेज सकते हैं।
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