फिल्मी दुनिया में एक बाल कलाकार का सफर
हिंदी सिनेमा जगत में कई ऐसे सितारे रहे हैं जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत बहुत छोटी उम्र में ही कर ली थी और देखते ही देखते वे अभिनय की दुनिया के बड़े नाम बन गए। इन्हीं प्रतिभाशाली कलाकारों में से एक नाम पद्मिनी कोल्हापुरे का है। उनका फिल्मी सफर एक बाल कलाकार के तौर पर शुरू हुआ और धीरे-धीरे उन्होंने अपनी दमदार अदायगी से दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बना ली। आज उन्हें न केवल एक बेहतरीन अभिनेत्री के रूप में जाना जाता है, बल्कि वे मशहूर अभिनेत्री श्रद्धा कपूर की मौसी के रूप में भी लोकप्रिय हैं।
संगीत और कला से जुड़ा परिवार
पद्मिनी कोल्हापुरे का जन्म 1 नवंबर 1965 को मुंबई में हुआ था। उनके घर का माहौल शुरू से ही कलात्मक रहा था। उनके पिता पंडित पंढरीनाथ कोल्हापुरे एक प्रतिष्ठित शास्त्रीय गायक थे, जबकि उनकी माता अनुपमा एक एयरलाइन में कार्यरत थीं। पद्मिनी की बड़ी बहन शिवांगी कोल्हापुरे भी मनोरंजन जगत का हिस्सा रहीं। शिवांगी की शादी अभिनेता शक्ति कपूर के साथ हुई और उनकी बेटी श्रद्धा कपूर आज हिंदी सिनेमा की एक बड़ी स्टार हैं। इस प्रकार, पद्मिनी का नाता सीधे तौर पर कपूर परिवार से जुड़ता है।
कोरस सिंगर से अभिनय तक का रास्ता
बहुत कम लोग जानते हैं कि फिल्मों में कदम रखने से पहले पद्मिनी अपनी बहन शिवांगी के साथ मिलकर फिल्मों में कोरस गाया करती थीं। उनका संगीत के प्रति झुकाव बचपन से ही था। उन्होंने 'यादों की बारात', 'किताब' और 'दुश्मन दोस्त' जैसी चर्चित फिल्मों के गानों में अपनी आवाज दी थी। उसी दौर में उनकी मुलाकात अपनी बुआ और दिग्गज गायिका आशा भोसले से हुई। पद्मिनी के पिता पंढरीनाथ, आशा भोसले और लता मंगेशकर के फर्स्ट कजिन थे। पद्मिनी उन्हें बेहद सम्मान के साथ 'आशा आत्या' कहकर बुलाती थीं।
देव आनंद से हुई पहली मुलाकात
एक बार एक साक्षात्कार में पद्मिनी ने साझा किया था कि उनके अभिनय करियर की शुरुआत के पीछे आशा भोसले का बड़ा हाथ था। आशा भोसले ने ही उनकी मुलाकात अभिनेता देव आनंद से करवाई थी। आशा भोसले ने देव आनंद से आग्रह किया था कि यदि उनके पास पद्मिनी के लिए कोई उपयुक्त भूमिका हो, तो उन्हें अवश्य मौका दें। इस मुलाकात के बाद उन्हें देव आनंद की फिल्म 'इश्क इश्क इश्क' में पहला ब्रेक मिला। उस समय वे काफी छोटी थीं और उन्हें यह अंदाजा भी नहीं था कि वे आगे चलकर बॉलीवुड की इतनी बड़ी अभिनेत्री बनेंगी।
बाल कलाकार से मुख्य भूमिका तक
पद्मिनी ने 'जिंदगी', 'ड्रीम गर्ल' और 'सत्यम शिवम सुंदरम' जैसी फिल्मों में एक बाल कलाकार के रूप में अपनी छाप छोड़ी। विशेष रूप से राज कपूर की फिल्म 'सत्यम शिवम सुंदरम' में छोटी 'रूपा' के किरदार ने उन्हें काफी लोकप्रियता दिलाई। राज कपूर उनकी प्रतिभा से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने बाद में उन्हें अपनी फिल्म 'प्रेम रोग' में मुख्य भूमिका दी। इस फिल्म में ऋषि कपूर के साथ उनकी जोड़ी को खूब सराहा गया। इसमें पद्मिनी ने 'मनोरमा' नाम की एक ऐसी विधवा का किरदार निभाया, जिसे तत्कालीन समाज के कठोर नियमों और भेदभाव का सामना करना पड़ता था।
महज 15 की उम्र में फिल्मफेयर पुरस्कार
पद्मिनी कोल्हापुरे की अभिनय क्षमता का लोहा पूरे उद्योग ने माना। साल 1980 में आई फिल्म 'इंसाफ का तराजू' में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का पुरस्कार मिला। उस समय उनकी आयु केवल 15 साल थी। उनकी सफलता का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। इसके बाद 1982 में फिल्म 'प्रेम रोग' के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट एक्ट्रेस के प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इतनी कम उम्र में दो बड़े फिल्मफेयर पुरस्कार जीतना उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।
निजी जीवन और बाद का करियर
पद्मिनी ने अपने करियर में 'आहिस्ता आहिस्ता', 'विधाता', 'वो सात दिन', 'प्यार झुकता नहीं', 'सौतन', 'स्वर्ग से सुंदर' और 'प्यार के काबिल' जैसी सफल फिल्मों में काम किया। उन्होंने हिंदी के अलावा मराठी सिनेमा में भी अपनी पहचान बनाई। कुछ समय के लिए उन्होंने फिल्मों से ब्रेक लिया, लेकिन फिर 'चिमनी पाखर', 'फटा पोस्टर निकला हीरो', 'पानीपत' और 'प्रवास' जैसी फिल्मों के साथ अभिनय की दुनिया में वापसी की। उनकी निजी जिंदगी की बात करें तो 1986 में उन्होंने फिल्म निर्माता प्रदीप शर्मा के साथ विवाह किया। उनका एक बेटा प्रियंक शर्मा है, जो फिल्म निर्माण और अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय है।
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