जोधपुर की पहचान बन चुकी मावा कचौरी सिर्फ एक मिठाई भर नहीं है, बल्कि इसमें मारवाड़ की शाही परंपरा और रजवाड़ी ठाठ का स्वाद भी घुला हुआ है। यह व्यंजन आज भी अपने अनोखे जायके के लिए देशभर में सराहा जाता है।
राजसी रसोई का खास व्यंजन
एक समय था जब यह खास मिठाई केवल राजाओं, महाराजाओं और दरबार में आने वाले विशेष मेहमानों के लिए ही तैयार की जाती थी। उस दौर में इसे बेहद सम्मान के साथ परोसा जाता था और यह राजसी आतिथ्य का प्रतीक मानी जाती थी।
कैसे बनती है मावा कचौरी
इस कुरकुरी कचौरी को मावा, सूखे मेवे और इलायची के मिश्रण से भरा जाता है। तैयार होने के बाद इसे चाशनी में डुबोकर परोसा जाता है, जिससे इसका स्वाद और भी मीठा तथा लाजवाब हो जाता है। यही खासियत इसे बाकी मिठाइयों से अलग पहचान देती है।
राजमहल से आम लोगों तक
वक्त बीतने के साथ यह शाही मिठाई महलों की चहारदीवारी से निकलकर आम लोगों तक पहुंची और देखते ही देखते जोधपुर की पहचान बन गई। आज यह हर वर्ग के लोगों के बीच समान रूप से लोकप्रिय है।
पर्यटकों की पहली पसंद
देश और विदेश से जोधपुर आने वाले पर्यटक इस मिठाई का स्वाद चखे बिना वापस नहीं लौटते। त्योहारों के मौके पर तो इसकी मांग सबसे ज्यादा रहती है, जिससे शहर के बाजारों में इसकी खूब बिक्री होती है।
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