दिवाली 2026: बाजार में क्यों छाई हैं हाथी, घोड़े और कलश के आकार की मिठाइयां, जानिए क्या है इनके पीछे का रहस्य

जालौर में दिवाली के मौके पर चीनी से बनी अनोखी आकृतियों वाली मिठाइयों का चलन काफी बढ़ गया है। लोग शुभता और परंपरा के नाम पर महल, हाथी और कलश के आकार वाले बताशे खरीद रहे हैं।

दिवाली की परंपरा और जालौर की अनोखी मिठाइयां

दिवाली का त्योहार आते ही पूरा देश रोशनी और मिठास में डूब जाता है। बाजारों में नई-नई मिठाइयों और उपहारों की रौनक देखने को मिलती है, लेकिन राजस्थान के जालौर में दिवाली मनाने का अंदाज थोड़ा हटकर है। यहाँ लोग केवल साधारण मिठाइयां ही नहीं खरीदते, बल्कि चीनी से बनी खास आकृतियों वाले बताशे और महल मालिया खरीदने की सदियों पुरानी परंपरा को निभा रहे हैं। ये मिठाइयां न केवल स्वाद में बेहतरीन होती हैं, बल्कि अपनी बनावट के कारण बच्चों से लेकर बड़ों तक के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।

महल मालिया का है विशेष महत्व

जालौर के बाजारों में इन दिनों महल मालिया की खूब चर्चा है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, ये बताशे महल के आकार में बनाए जाते हैं। दिवाली के शुभ अवसर पर होने वाली लक्ष्मी-गणेश पूजन के दौरान इनका विशेष रूप से उपयोग किया जाता है। व्यापारी अर्जुन माली के अनुसार, दिवाली के समय इन आकृतियों की मांग बाजार में सबसे अधिक रहती है। ये महल जैसे दिखने वाले बताशे पूजा की थाली की शोभा तो बढ़ाते ही हैं, साथ ही घर में समृद्धि का प्रतीक भी माने जाते हैं।

विभिन्न आकृतियों में उपलब्ध हैं ये खास मिठाइयां

जालौर में बताशों की बनावट सिर्फ महल तक ही सीमित नहीं है। यहाँ की स्थानीय परंपरा और लोगों की मांग के अनुसार, कारीगर चीनी को पिघलाकर और सांचों का उपयोग करके कई प्रकार की कलात्मक आकृतियां तैयार करते हैं। बाजार में आपको इस बार निम्नलिखित आकृतियां देखने को मिलेंगी:

  • हाथी के आकार वाले बताशे: ये सौभाग्य और शक्ति का प्रतीक माने जाते हैं।
  • कलश रूपी मिठाइयां: कलश को हिंदू धर्म में मंगलकारी माना गया है, इसलिए पूजन में इनका विशेष स्थान है।
  • दीपक की आकृति: दिवाली रोशनी का त्योहार है, इसलिए दीपक के आकार के बताशे भी काफी बिक रहे हैं।
  • बतख और अन्य आकृतियां: ये बच्चों के लिए आकर्षण का मुख्य कारण हैं।

परंपरा और मिठास का अटूट नाता

दिवाली की लक्ष्मी पूजा में बताशों का विशेष महत्व सदियों से रहा है। मान्यता है कि ईश्वर को अर्पित की जाने वाली मिठास घर में सुख, शांति और खुशहाली लाती है। जालौर के लोग इसे केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि अपनी परंपरा का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं। हालांकि बाजार में आज के समय में आधुनिक और महंगी मिठाइयों की कोई कमी नहीं है, लेकिन इसके बावजूद इन पारंपरिक चीनी की आकृतियों की मांग में कोई कमी नहीं आई है।

क्यों खास है जालौर का बाजार?

जालौर में दिवाली से पहले इन पारंपरिक मिठाइयों को खरीदने के लिए बाजारों में भीड़ उमड़ती है। बहुत से परिवारों के लिए ये बताशे लक्ष्मी पूजन की अनिवार्य सामग्री हैं। बिना इनके पूजा अधूरी मानी जाती है। अर्जुन माली बताते हैं कि वर्षों पुरानी इस परंपरा को आज भी नई पीढ़ी उसी उत्साह के साथ निभा रही है। इन मिठाइयों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये दिखने में जितनी आकर्षक हैं, उतनी ही शुद्धता से तैयार की जाती हैं। यही वजह है कि आज के दौर में भी जालौर के बाजारों में ये पारंपरिक बताशे अपनी पुरानी पहचान को बखूबी बनाए हुए हैं और दिवाली की मिठास में चार चांद लगा रहे हैं।

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